गज़ल: हसीन साज़:

kyaगज़ल: हसीन साज़:

सबसे हसीन साज़ अनासिर का साज़ है
सबसे नफीस गीत खुदा की नमाज़ है

तारों की तरह अर्श के बन्दे हैं करोड़ों
सूरज की तरह एक वो बन्दानवाज़ है

हर आदमी मशगूल है रोटी की फिकर में
रोजी का इंतजाम यहाँ का रिवाज़ है

रोटी ने खड़े कर दिए बाजार और शहर
ईमान के झण्डे तले पैसों का राज है

खाने की पहनने की औ रहने की जंग में
हर हाथ में तलवार है हर सर पे ताज है

दुनिया को है पसन्द बहुत इश़्क.ए.मजाजी
हम को तो अपने इश़्क.ए.ह़कीकी पे नाज़ है

गीत: लैला:

lailaगीत: लैला:

मुख है त के लै नै
कूनै रे लाटा !
बाट हिटना हिटना यो
ऐ गै लुघाट

कै गौं मैं कै मौ मैं रूंछै
मजनु जस पच्छा पच्छा
किलै उंछै ?

बोट हिसालू भौत रिसालू
नजिक जाला काण बुड़ाला
काण बुड़ाला नक को मान्छ
दूद दिनी गोरु लात लै हान्छ

यो ई छ रीत
योई छ बियोहार
एस्सी कैं चलनौ
यो सारो संसार

तू कै दुणी मैं रूंछै
मजनु जस पच्छा पच्छा
किलै उंछै ?

लोकभाषा: विकास:

vikasलोकभाषा: विकास:

इसके अतिरिक्त यह भी स्मरणीय है कि बोली केवल वाचिक नहीं होती, उसमें कायिक संकेत भी सम्प्रेषण का कार्य करते हैं, जिन्हें वक्ता और श्रोता के व्यवहार द्वारा समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी बड़े का किसी छोटे को हाथ से पास बुलाने का इशारा करते हुए औ /औ ल केवल आदेश की ही अभिव्यक्ति नहीं करता, वरन् वक्ता और श्रोता के पारस्परिक सम्बन्धों की व्यंजना भी करता है। उक्त कथन की ध्वनियों की अनुतान से वक्ता का मनोभाव पहचाना जा सकता है या सम्प्रेषण का प्रभाव भी परखा जा सकता है। यदि उक्त वक्ता श्रोता पिता-पुत्र हंै तो सम्पूर्ण कथन से अधिकार की, मित्र हैं तो विनय की तथा शत्रु हैं तो चुनौती तक की अभिव्यंजना हो सकती है।

स्वर एवं घात की दृष्टि से कुमैयाँ पर्याप्त समृद्ध बोली है। घात से तात्पर्य ध्वनि की अधिकता से है, जिसके अभाव में उच्चारण शिथिल हो जाता है, कभी स्वर ह्रस्व हो जाते हैं या स्वरान्त व्यंजनान्त हो जाता है ; जैसेः हिन्दी का भगवान कुमैयाँ का भग्बान।

उल्लेखनीय है कि प्रत्येक बोली की निजी स्वनिम एवं रूपिम प्रक्रिया होती है, जिसे वक्ता मातृभाषा के रूप में शैशव में ही अर्जित कर लेता है। यदि उसे दूसरी भाषा से शब्द ग्रहण करने पड़ते हैं तो वह उन्हें यत्किंचित् उच्चारण भेद के साथ अपनी मातृभाषा के रंग में रंग लेता है। इस प्रकार बोली के विकास क्रम में त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया भी सम्पन्न होती रहती है। नवीनता के प्रभाववश प्राचीनता का क्षरण, प्रगति के लिए अभिनव का वरण और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए प्रवृत्तियों का अनुसरण चलता रहता हैै। क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 8

haru m 8लोकगाथा: हरू सैम 8

सात राणी नागिनी अठूँ मसाणी कैजा उदासी है र्यान हो।
पोंठा बली हरु बिंदराबन पूज्यो हो। सात भोजिन छिन वली
ऊखली सार हो। पोंठावली हरु हो कलेवार माँगछ हो।
ऊँ सात भोजीन आब मजाकी कराला हो।

लैजा लैजा देवर कौला सुपी में का टुणाँ, भट भाङू भुटि हो।
महाबली हरु क्या बोली बोलाँछ-”घिनौड़ी को चार उखल्यारी
कल्यौमैले जनमें न खायो हो।“ ”खैजा खैजा देवर चुकिलो छसिया।“
”चुकिलो छसिया मैंले जनमें न खायो हो।“

”खीर-भोजन खान्या, ज्यूनि मैका च्यल हुना
आपण दादा की बंदि खोलि ल्यूना हो।“
तिरिया को दुछायूँ, छूतीं को डरायूँ
पौठा बली हरु लागी गयो बाटा हो। गै भैंसी खोलँछ।

पस्याली रमटा काँनी में धरँछ। गडेरुवा मंडी पिठ्यूँनि खितँछ।
गै-भैंसी खोलँछ। उबधुरी लगूँछ हो। चैबाटी चैरड़ी बैठक लगूँछ।
तै गैली, पातल हो। मूगछं-रनबादी बासुली हो।
हे बाँसुली ध्वका कूँछ – भलि भक्या बोलाए हो। क्रमशः

लोकसाहित्य: लोकोक्तियां:

lokoktiyan

लोकसाहित्य: लोकोक्तियां:

लोक साहित्य का प्रणयन वस्तुतः लोक जीवन द्वारा होता है, अतः इसमें लोक जीवन की ही अभिव्यक्ति होती है और यह लोक जीवन में ही संचरण करता है। जिस तरह लोकगीत जीवन की अनुभूतियों से जन्म लेते हैं, उसी तरह लोकोक्तियां भी जीवन के अनुभवों की दुहिताएं होती हैं।

संक्षिप्त, रोचक एवं सारगर्भित होने के कारण लोकोक्तियां आसानी से लोगों की जुबान पर चढ़ जाती हैं और प्रसंगानुसार प्रयोग में लाई जाती हैं। लोकगीतों की तरह लोकोक्तियों को भी नई पीढ़ियां पुरानी पीढ़ियों से भाषिक परंपरा के रूप में प्राप्त करती हैं और प्रयोग में लाकर आगे बढ़ा देती हैं। उक्ति होने के कारण लोकोक्ति का न तो आकार निष्चित है और न ही स्वरूप, तथापि इनका प्रयोग करते समय वक्ता किसी षब्द विषेष पर जोर अवष्य देता है।

स्वतःस्फूर्त होने के कारण लोकोक्ति के लिए वाक्य संरचना अथवा छन्दानुषासन के नियमों की कोई बाध्यता नहीं होती, फिर भी कथन को विषिष्ट बनाने के लिए यदा-कदा आषुकवि जैसी तुकबन्दी का प्रयोग भी परिलक्षित होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकोक्तियां गेय नहीं होतीं, पर तुकांत होने के कारण क्षणिकाओं के समान प्रतीत होती हैं, जिनके कुछ अति प्रचलित उदाहरण आगे प्रस्तुत किए जा रहे हैं –

विशेष: वोट की राजनीति:

 

vote kiविशेष: वोट की राजनीति:

सांप्रदायिकता का जहर कभी संघर्ष और कभी आंदोलन के रूप में असर दिखाता है तथा कभी राजनीतिक हलचल पैदा करके राष्ट्रीय विचारधारा में अशांति उत्पन्न करता है। लोकसभा अध्यक्ष अनन्तशयनम् आयंगर ने एक बार कहा था कि ‘प्रजातंत्र के उचित कार्य निष्पादन और राष्ट्रीय एकता के विकास और संगठन के लिए जरूरी है कि भारतीय जीवन में से सांप्रदायिकता का उन्मूलन किया जाए।’

जैसे और बहसें खास मुद्दे से हटकर नया मोड़ ले लेती हैं, वैसे ही साम्प्रदायिक उन्मूलन को लेकर जो विवाद प्रारंभ हुआ और जो प्रस्ताव रखे गए, उन्हें पारित करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने विशेष जोर नहीं दिया। मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहकर उुन्हें विशेष संरक्षण दिया गया, ताकि उनके वोट हाथ से न निकलने पाएं। केरल में मुस्लिम लीग और कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनने पर चैधरी चरण सिंह ने कहा था कि – ‘यह साम्प्रदायिकतावाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।’

तब से लेकर अब तक साम्प्रदायिकतावाद चिंतन मनन और वाद विवाद का विषय तो बना हुआ है, पर सांप्रदायिक दलों पर रोक लगाने का इरादा कामयाब नहीं हो पाया है। कभी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के नाम में से हिंदू शब्द हटाने का अभियान चलता है, तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मुस्लिम शब्द हटाने पर जोर दिया जाता है। इसके अलावा आरक्षण की नीति साम्प्रदायिकतावाद के मूल में पोषण का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जिसका लाभ अल्पसंख्यक वर्गों तक सीमित रहता है और हानियां बहुसंख्यक वर्गों के हिस्से में आती हैं।

अब भी सरकार आरक्षण की नीति को महत्व दे रही है, जिसके परिणामस्वरूप सारे देश में अशांति की लहर दौड़ गई है और युवावर्ग तरह तरह से अपना आक्रोश व्यक्त कर रहा है। जब बेरोजगारी की समस्या सभी के लिए समान है, तब किसी वर्ग विशेष के लिए अतिरिक्त सुविधा क्यों ? क्या इसके पीछे वोट की राजनीति और आरक्षण का मिला जुला प्रतिबिंब नहीं झलकता ? सम्प्रदायवाद द्वारा एक देश के नागरिकों को विभाजित कर अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने की यह राजनीतिक साजिश नही ंतो और क्या है ? क्रमशः

सिनेमा: साहस प्रधान:

saahasसिनेमा: साहस प्रधान:

जहां तक हिंदी में बनी साहस प्रधान फिल्मों की बात है 1933 में हातिम ताई , शाही लुटेरा, 1935 में मिस्र का खजाना, जिंगारू, सपेरा, 1936 में जंगल क्वीन, हूर ए समंदर, मिस फ्रण्टियर मेल, 1937 में सिंहलद्वीप की सुंदरी, तूफानी टार्जन, तूफानी खजाना, 1938 में टार्जन की बेटी, मिस्टर एक्स, 1939 में जंगल किंग, जिंबो का बेटा, काल कुण्डला, 1940 में हातिम ताई की बेटी आदि बहुत पसंद की गईं।

1941 में जंगल की लड़की, तारपीडो, 1942 में जंगल प्रिंसेज, 1945 में सन आॅफ हातिम ताई, 1946 में नेडी राॅबिनहुड, जंगल की पुकार, भेदी खजाना, कंगारू, सिंदबाद द सेलर, 1947 में हातिम ताई, समुंदर की मलिका, 1948 में जंगल गाॅडेस और 1950 में जंगल मैन आदि फिल्मों का निर्माण हुआ।

1951 में खजाना, सिम्बा, 1952 में जिम्बो, जंगल जवाहर, वनराज, 1953 में गोरिल्ला, 1954 में अफ्रीका, 1955 में आदमखोर, खौफनाक जंगल, सखी हातिम, शिकार, 1956 में जंगल क्वीन, समुद्री डाकू, 1957 में जहाजी लुटेरा, समुंदर, मिस्टर एक्स, 1958 में जंगल प्रिंसेज, शान ए हातिम, जिम्बो, 1959 में जिम्बो की बेटी, जंगल किंग तथा 1960 में डाॅक्टर शैतान, सुपरमैन, रिटर्न आॅफ सुपरमैन, जिम्बो शहर में आदि फिल्में बनीं।

1961 में एलीफेण्ट क्वीन, 1962 में काला समंदर, तूफानी टार्जन, किंगकांग, 1963 में रुस्तम सोहराब, जंगल ब्वाय, फौलाद, राकेट टार्जन, शिकारी, जिंगारू, टार्जन और जादूगर, 1964 में टार्जन और जलपरी, टार्जन एण्ड डिलाइला, मारबल मैन, आंधी और तूफान, सैमसन, रुस्तम ए रोम, जग्गा, दारा सिंह, आया तूफान, हरक्युलिस, मिस्टर एक्स इन बाॅम्बे, 1965 में सन आॅफ हातिम ताई, टार्जन एण्ड सर्कस, एडवेंचर्स आॅफ राॅबिनहुड, खूनी खजाना, सात समंदर पार, टार्जन एण्ड किंगकांग, बाॅक्सर, खाकान, राका, शेरदिल, संग्राम, टार्जन कम्स टू डेल्ही नामक फिल्मों ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की।

1966 में इंसाफ, जवां मर्द, खून का खून, नौजवान, रुस्तम ए हिंद, दादा, ठाकुर जरनैल सिंह, रुस्तम कौन, टार्जन की मेहबूबा, जिम्बो का बेटा, 1969 में टार्जन इन फेयरी लैण्ड, आदि फिल्में बनीं तो 1972 में पहली डरावनी फिल्म – दो गज जमीन के नीचे, 1973 में विक्टोरिया नंबर 203, डाॅ0 एक्स, जुगनू, 1978 में इंस्पेक्टर ईगल, 1980 में द ग्रेट गेंबलर, द बर्निंग ट्रेन, सुरक्षा, 1990 में शिवा, 1991 में दरार, 1993 में बाजीगर, 1994 में इंटरनेशनल खिलाड़ी, 1997 में हिम्मत आदि फिल्मों का बोलबाला रहा।

नई सदी में 2001 में लगान व दिल चाहता है, 2002 में कंपनी, 2003 में गंगाजल व हंगामा, 2994 में स्वदेस व खाकी, 2005 में मंगल पाण्ड व ब्लैक, 2006 में रंग दे बसंती, 2007 में शूटआफउट एट लोखण्डवाला व चक दे इ्रडिया, 2008 में आमिर व अ वेड्नस डे, 2009 में थ्री ईडियट्स, 2010 में पीपली व राजनीति, 2011 में गैंग्स आॅफ वासेपुर, 2012 में पान सिंह तोमर,जैसी फिल्मों का सिलसिला लगातार जारी है। क्रमशः