पर्व: परिणति:

प्रतीक्षा 

पर्व: परिणति:

कहते हैं कि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। त्योहार की तैयारियों में बीत गया दिन। इंतजार करते करते षाम भी गुजर गई। दीपक से दीपक जल गए, लो आज अंधेरे ढल गए। घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा। यह अंधेरा तभी छंट पाएगा, जब प्रेम का दीप जलाने वाला आएगा।

उसकी राह में नजरें बिछाकर बैठी हुई प्रतीक्षा के लिए एक एक पल भारी है। उसके मन की लगन उसे और कुछ सोचने भी नहीं देती। सारा समाज उजालों से खेल रहा है और वह अपने दिल के दिये के प्रकाष में अपने प्रिय की बाट जोह रही है –

एक वो भी दिवाली थी
एक ये भी दिवाली है
फिल्म – नजराना

दीवाली की जो रात खुले हाथों से जो अपार आनंद लुटाती है, अमित प्रकाष बरसाती है, उसकी परिणति अगली सुबह के उजाले में झलकती है। छतों की मुंडेरों पर लुढ़के हुए दियों, छज्जों की रेलिंग पर गली हुई मोमबत्तियों, सडकों के किनारों पर छितरे हुए पटाखों के खोखों, गलियों के छोरों पर पड़े भस्मीभूत फुलझड़ियों के तारों, आंगनें के कोनों में बिखरे हुए खील बताषों में प्रतिबिंबित होती है।

ताष के बावन पत्ते
पंजे छक्के सत्ते
सब के सब हरजाई
मैं लुट गया राम दुहाई
फिल्म – तमन्ना

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गजल: अफसोस:

झूमाधुरी 

गजल: अफसोस:

उतारे जब बुरी यादों के छिलके
नजर आए पुराने जख्म दिल के

हकीकत हो गई मालूम सबको
तुम्हारे गांव के लोगों से मिल के

उन्हीं के सामने सब कुछ हुआ था
लिहाजा रह गए हैं होंठ सिल के

उन्हें अफसोस है पेड़ों को लेकर
नहीं हंस पा रहे वो आज खिल के

लोककथा: चल चल तुमड़ि बाटौं बाट:

लोककथा: चल चल तुमड़ि बाटौं बाट :

बाट में घुरीन घुरीनै तुमड़ लागी भै। वां षेर, भालु, बाग लै बुढ़ियौ क बाटों चई भै। पैली षेरेलै तुमड़ि घुरि बेर उण देखि। वील तुमड़ि थैं पुछ: ‘‘तुमड़ी, तुमड़ी, आजा का दिन एक बुढ़ि यौ बाटै उनेर छिं। कैं बाट पन उण देखी त्वील?’’ तुमड़िक भितैर भैटिया बुढ़ि बुलाणि: ’’चल चल तुमड़ि बाटों बाट, मैं कि जाणू तेरि बुढ़ियै कि बात।’’ षैरै लै तुमणि कैं जाण दि।

तुमड़ि घुरीन घुरीनै बाट लागि। मणि अघिन कै बाट में बाग भैटि भै। बागै लै लै तुमड़ि कैं रोकि बेर पुछ कि कैं वील एक बुढ़ि कैं लै बाट पन देखो त तुमड़ि में पन्सींणि बुढ़ि बुुलाणि: ‘‘चल चल तुमड़ि बाटों बाट, मैं कि जांणू तेरि बुड़ियै कि बात?’’

आखीर में भालु लै बुड़ियौक बाट देखी भै। तुमड़ि उण देखी त वील लै उसै पुछ। भितेर भैटि बुढ़ियैल लै उसे जवाब दि। भालु कैं अई रीस त वील तुमड़ि में तकि बेर लात मारि। तुमड़ि क फुटि बेर द्वि टुकुड़ भै और भितैर देखींणी बुड़ि। षेर और बाग लै ऐ पुज उथकैंई बुड़ियै कि खोज में। देखछिया त तुमड़ि का त द्वि टुकुड़ हई भै और और बुड़ि भैटि भै। क्रमशः 

अन्य :

भाषा: अन्य:
इसके अतिरिक्त देशी शब्दों के अन्तर्गत अन्य दो प्रकार
के शब्दों को रखा जा सकता हैः

  1. अज्ञात व्युत्पत्तिकः वे शब्द जो अज्ञात स्रोतों के
    माध्यम सेे कुमैयाँ के शब्द समूह में समाहित हो गए हैं, उन्हें
    अज्ञात व्युत्पत्तिक देशी शब्द कह सकते हैं – जैसेः

क्वीड़ – बातें , ग्या्ँज – बुद्धिहीन , चपक – थप्पड़ ,
चिप्ड़ – चिकना , टा्ड़ – दूर , टो्ट – छिद्र , ठे्कि –
काष्ठोपकरण , नक – बुरा , नड़क – डाँट , ना्लि –
माप-मात्रा , फाँच्चि – गठरी , फाल – कूद: ऊपर से नीचे
राफ – तेज आँच , सार – अभ्यास , सीप – ढंग आदि।

  1. ध्वनिव्युत्पत्तिकः वे शब्द जो ध्वनियों के अनुकरण पर बनकर
    कुमैयाँ के शब्द भण्डार में प्रतिष्ठित हुए हैं, उन्हें ध्वनिव्युत्पत्तिक देशी
    शब्द कह सकते हैं – जैसेः

कचकचाट – बकवास , खुसक्क – चुपचाप , गनमनाट –
गुनगुनाहट , घनमनाट – घंटाध्वनि ,घुर्राट – मोटर की आवाज
च्यार्र – कपड़ा फटने की आवाज , चुचाट – कलरव , छप्प –
पानी में गिरना , टिटाट – चिल्लाहट , ठक्क – ठोकने की ध्वनि
थ्याच्च – कुचलने की आवाज , नौराट – कराह , प्वा्त्त – गीली
वस्तु का गिरना द्व पुट्ट – जुआँ मारने की आवाज , भड़भड़ –
गिरना/हिलना , सुसाट- जल-प्रवाह की आवाज , हड़बड़ाहट –
हड़बड़ी आदि।

गौरा महेष्वर 6

 

gaura m 6

 

लोकगाथा: गौरा महेष्वर 6

पीला रंगन फूलिए डाली नीला रंगन पाके।
तेरा फल किरमोड़ि डाली ग्वाला लोग रे खाला।
बाटा में की हिसालु डाली भ्यर मैत जान्या बाटो काँ हो?
दैनुँ बाटो जालो डोटि का गढ़ बों बाटो त्यर मैत जालो।

गुप्फा रंगन फूलिए डाली त्वप्पा रंगन पाके।
तेना ग्वप्फा हिसालु डाली चेली-बेटि रे खाला।
धार में की सल्ला की डाली म्यर मैत जान्या बाटो काँ हो?
आपनें रूराट आपने फूफाट की जाणूँ त्यर मैत बाटो।

धिक्कार त्वे सल्ला की डाली एकै जन्मनि जन्मे।
हरिया वरन फूलिए डाली सूखा रंगन पाके।
तेरा फल सल्लाकि डाली सूकी धरति झड़ला।
गैलि गुघेरी द्यारि को रुख भ्यर मैतक जान्या बाटो काँ हो?

यो होलो तेरो मैतुड़ा देश तू मेरि लाड़िलि चेलि।
इतुक पुछना गँवरा दीदी मैतुड़ा पुजि गैंन।
ए भुख भदो त गँवरा मैत ऐछ-
जेठ ऊँरनी त उमियाँ बुकूँनी।

क्रमशः

होली :

holiलोकगीत : होली :

इनमें होली के अवसर पर गाई जाने वाली प्रेम या भक्ति
से सराबोर रचनाएं आती हैं। फाल्गुन मास की एकादशी को
चीर बंधन होता है। इस दिन मंदिर या फिर गांव के प्रधान
के घर के सामने बने चबूतरे में एक खंबा गाड़कर उसके ऊपर
कई रंग के कपड़े बांधे जाते हैं। इसे बहुत ही पवित्र माना जाता
है। इस चीर के आसपास ही होल्यार होली गीत गाते हैं –

को ए उ बांधनि चीर रघुनंदन राजा
को ए उ खेलनि फाग रघुनंदन राजा

गणपति बांधनि चीर रघुनंदन राजा
रिद्धि सिद्धि खेलनि फाग रघुनंदन राजा

ब्रह्मा विष्णु बांधनि चीर रघुनंदन राजा
सावित्री खेलनि फाग रघुनंदन राजा

रामिचंद बांधनि चीर रघुनंदन राजा
सीता खेलनि फाग रघुनंदन राजा

अंग्रेज शासन काल :

 

gumanipant

उत्तराखण्ड : अंग्रेज शासन काल :

प्राचीन भाषा नमूनों से अनुमान किया जा सकता है कि
अठारहवीं सदी के अंत तक आते-आते कुमाउनी स्पष्टतर
होती गई है – संस्कृतनिष्ठता के स्थान पर तद्भव षब्दों
की ओर झुकाव बढ़ा है और कहीं-कहीं अरबी-फारसी के
षब्द भी प्रयुक्त हुए हैं।

1815 ई0 में कुमाऊं अंग्रेजों के अधीन हो गया था। अंग्रेजी
षासन काल में कुमाउनी के विकास में कोई अवरोध नहीं आया,
क्योंकि अंग्रेज स्वयं यहां की भाषा में पत्राचार करते रहे। कहा
जाता है कि सन् 1837 में कुमाऊं में लोकभाषा को ही षासन
की भाषा के रूप में प्रयोग करने का आदेष हुआ, किंतु
पाठषालाओं के लिए कुमाउनी भाषा में लिखी पाठ्य पुस्तकों
के अभाव में उस आदेष को व्यवहार में न लाया जा सका।

कुमाउनी के विकास के इस दूसरे चरण में कुमाउनी में
साहित्य भी रचा गया। इसके उन्नीसवीं षताब्दी के साहित्यकारों
में गुमानी, कृप्ण पाण्डे, चिंतामणि जोषी, गंगा दत्त उप्रेती,
लीलाधर जोषी तथा बीसवीं षती पूवार्ध के रचनाकारों में षिव
दत्त सती, गौर्दा, ष्यामाचरण दत्त पंत, जीवन चंद्र जोषी,
चंद्र लाल वर्मा चैधरी आदि के नाम विषेष रूप से उल्लेखनीय हैं।