गीत: रोजगार – 2

rozgar 2गीत: रोजगार – 2

सुनो लीबेर सुनार
तारौ लीबेर सितार
पढ़ै लीबेर नौकरी
रुपैं लीबेर बजार

बिन गुरु बाट नहां
बिन ढेपु हाट
बिन मेहनत करि
कसिकैं हुं ठाट

ठाट क दगड़ यरौ
कार जरूरी
कारा लिजी जाण पड़ौं
बैंका दुआर

करोड़ लाख हजार
हैस्यत लीबेर उधार
पढ़ै लीबेर नौकरी
रुपैं लीबेर बजार

सैणिक खसम मरद
मरदौक रीन
जैक ख्वर रीन वीकि
हरै जांछि नीन

रीना क दगड़ यरौ
ब्याज जरूरी
ब्याजा लिजी चाण पणौ
नई ब्योपार

जां चा पड़ी रौ तुसार
पानी लीबेर कच्यार
पढ़ै लीबेर नौकरी
रुपैं लीबेर बजार

लोकभाषा: साहित्य भाषा:

sahityaलोकभाषा: साहित्य भाषा:

केन्द्र की या प्राचीन राजधानी के निकट की भाषा राजभाषा या साहित्य भाषा बनने का गौरव प्राप्त करती है। इसी परम्परा में मध्य देश की संस्कृत, ब्रजभाषा, अवधी, कौरवी ;खड़ी बोलीद्ध आदि ने साहित्य भाषा बनने का गौरव प्राप्त किया है। इसी कारण गियर्सन ने कुर्मांचली भाषा पर कार्य किया तो कुमैयाँ को मानकीकरण की दृष्टि से अधिक उपयुक्त मानते हुए खसपर्जिया को साहित्यक भाषा के रूप में स्वीकार किया। राजधानी के चम्पावत से अल्मोड़ा आ जाने पर राजा की खासप्रजा की भाषा सामान्य जन के लिए आदर्श हो गई। सुदूरवर्ती ग्रामीण अंचलों का भी किसी न किसी रूप में सम्पर्क बना ही रहा, पफलतः यह सबके लिए सुबोध थी। यही कारण था कि कुमैयाँ को सारी विशेषताओं के अनन्तर भी परिनिष्ठित साहित्य भाषा बनने का गौरव नहीं मिल पाया।

कुमैयाँ का स्वनिमिक एवं रूपिमिक अनुशीलन करने के उपरान्त ज्ञात होता है कि न केवल, उच्चारण की दृष्टि से वरन् संरचनात्मक दृष्टि से भी कुमैयाँ तथा कुमाउनी की अन्य बोलियोें के बीच ऐसी विभाजक रेखायें हैं, जो अत्यन्त सूक्ष्म होते हुए भी सदियों से उसकी विशिष्टता को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं। उसके ठेठ स्वरूप का माधुर्य उसे पूर्वी कुमाउनी उपभाषा ;की अन्य बोलियोंद्ध से भी पृथक् करता है। सम्प्रति कुमाऊँ मण्डल के नवसृजित जनपद चम्पावत के घरों के अलावा, यदि वक्ता और श्रोता में कोई परदेसी न हो तो सामान्यतः बाजारों में भी कुमैयाँ का धड़ल्ले के साथ उपयोग किया जाता है।

‘बोली’ किसी भाषा के ऐसे सीमित क्षेत्रीय रूप को कहते हैं, जो ध्वनि, रूप, वाक्य गठन, अर्थ, शब्द समूह तथा मुहावरे की दृष्टि से उस भाषा के परिनिष्ठित तथा अन्य क्षेत्रीय रूप से भिन्न होता है, किन्तु इतना भिन्न नहीं कि अन्य रूपों के बोलने वाले उसे समझ न सकें; साथ ही जिसके अपने क्षेत्र में कहीं भी बोलने वालों के उच्चारण, रूप-रचना, वाक्य गठन, अर्थ, शब्द समूह तथा मुहावरों आदि में कोई बहुत स्पष्ट और महत्वपूर्ण भिन्नता नहीं होती। क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 5

haru m 5लोकगाथा: हरू सैम 5

भभूत को गोलो लियो, सुनू की मेखला हो।
हिय हार माला पैरी, केदारी फरुवा हो।
सिर में साफी पैरी, दुमुखिया चिमटा हो।
धुनी का किनारे बैठी, अनठणि जोगी बण्यो हो।

चैबाटी की धूल पकड़ी, बोकसाड़ी विद्या हो।
भभूत को गोलो लियो, आग को रे शोलो हो।
बणी-ठणी जोगी बेष, बाट लागी गया हो।
तली हठी माल आयो, भिजिया रमूँछ हो।

बणबाषा को भात, उड़द की दाल हो।
भोग न लागनूँ दिगौ भुक्वे रई जाँछ हो।
तली हठी माल बटी, श्यामा खेगत मँज हो।
खैराणी भुजाणी बटी आयो धरमैं का घर हो।

ठुलखाला दशौली बटी बेरीनाग पुज्यो हो।
थल-बागनाथ बटी हुपुली नागणी हो।
धाणधुरा पुज्यो जोगी, अन बिदो जोगी हो।
धौली गंगा धाल तरी हुमा घुरा लाग्यो हो। क्रमशः

लोकगीत : जातीय लोकगाथाएं :

jaatiyलोकगीत : जातीय लोकगाथाएं :

ये गाथाएं कुमाऊं के ख्यातिप्राप्त वीरों से संबंधित हैं,
जिनमें झकरूवा रौत, पचू दोराल, रतनुवा फड़त्याल,
अजुवा बफौल, माधो सिंह रिखोला आदि के नाम विशेष
रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ के नाम इतिहास में
भी उपलब्ध होते हैं और कुछ के नाम केवल गाथाओं तक
ही सीमित हैं। इन गाथाओं में माधो सिंह रिखोला की गाथा
ज्यादा सुनी जाती है –

‘डूंगरा में पैका रूंनी माधोसिंग नामा
दूरौ का जोलिया छूं मी बतै दिया धामा
झपकन झौ छ मानी जावा मौ छ
ठुल तू हेरि लिए भुली, नान माधो मैं छूं

पिटि हाली ताम पितला ढालि हाली कांस
तरनि को हिटन तोडि़ छाले, उदिया को खांस
बचै दियौ लाज वीरौ आई रयूं पास
डोटी गढ़ जोलिया आयो, जाण छ नेपाल’

रोमांचक लोकगाथाएं

ये गाथाएं प्रेम और युद्ध की शाश्वत परंपरा से संबंधित हैं। इनमें रणु
रौत, सिसाउ लली, आदि कुंवरि, हरू हित, सुरजू कुंवर, हंस कुंवर,
दिगौली माना आदि की गाथाएं अधिक प्रसिद्ध हैं। रोमांचक प्रसंगों पर
आधारित होने के कारण ये ऐतिहासिक अथवा जातीय वीरगाथाओं से भिन्न
हैं, तथापि इनका गायन भड़ाै की ही भांति किया जाता है। दिगौली माना
के भड़ाै में रतनुवा युद्ध जीतकर पांजा रौतेली से विवाह करता है –

‘पैकान का च्याला छिया बड़ा बड़ा वीर
सुप जसा कान छिया डालो जसो पेट
निसौव जसा खाप छी रतग्यांली आंख
डबरयाली दीठ घगरयाली गिच छियो
बड़ाे जुद भीड़ करि बेर पांजा उठै ल्यायो
आंपणा संगा लै गो संगरामी कोट’

विशेष: स्वतंत्रता के पश्चात्:

svatantrataविशेष: स्वतंत्रता के पश्चात्:

देश की स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में नारी के उत्थान के लिए कई प्रकार के कार्यक्रम तय किए गए। उन्हें शिक्षित बनाने के लिए स्कूलों ओर विद्यालयों की स्थापना की गई। मगर विडंबना यह कि शिक्षित कन्याओं के लिए उनसे अधिक शिक्षित वरों की मांग बढ़ने लगी, तो फिर से परंपरागत दहेज की समस्या की प्रगति के नए अवसर पनपने लगे। इन अवसरों ने आधुनिकता की आड़ में भौतिक सुख – सुविधाओं के सामान के लेन देन का ऐसा व्यापार प्रारंभ किया, जो श्खिित नववधुओं के लिए प्राणलेवा साबित हुआ।

स्वतंत्र भारत में दहेज उन्मूलन की बात पर काफी जोर दिया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जमाने में सरकार द्वारा इस विषय में रुचि ली गई और कई दहेज विरोधी नियम भी बनाए गए। दहेज विषयक मामलों पर विचार करने के लिए पृथक् न्यायालयों की व्यवस्था की गई। अनेक नवगठित सामाजिक संगठनों और महिला मंचों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर इस समस्या को सुलझाने के प्रयास प्रारंभ किए, लेकिन इस बुरे रोग का सही उपचार न हो सका।

कारण यह है कि वर का पिता यदि दहेज न लेने को राजी भी हो जाए तो वर की माता राजी नहीं होती। वह अपने अड़ोस पड़ोस तथा सगे संबंधियों को दहेज न लेने का आदर्श प्रदर्शित करने की अपेक्षा अधिकाधिक दहेज दिखाने में अपनी ज्यादा शान समझती हैं। व्यावहारिक दृष्टि से इसे नवदंपति की नई गृहस्थी जमाने के लिए आवश्यक सामान का अथवा वर की पढ़ाई लिखाई पर हुए कुल व्यय का भुगतान भी माना जाने लगा।

आजकल विवाह दो परिवारों का संबंध सूचक न रहकर ताम झाम के प्रदर्शन का आयोजन मात्र बनकर रह गया है। इस प्रदर्शन का बोझ वर और कन्या पक्षों को समान रूप से उठाना पड़ता है। बढ़ती हुई मंहगाई के साथ यह बोझ असह्य होता चला जा रहा है। यद्यपि लोग इस प्रथा के साथ साथ बारात की औपचारिकता तथा सामाजिक रीतियों या जातिगत बंधनों से मुक्ति के लिए छटपटाने लगे हैं, तथापि सच्चे साहस के अभाव की वजह से वे इन प्रपंचों का खुलकर विरोध नहीं कर पाते हैं। यह मनःस्थिति समाज में नारी की स्थिति को और भी डांवाडोल बनाए हुए है। क्रमशः

सिनेमा: पैंसठ के बाद का प्रेम:

paisath ke baadसिनेमा: पैंसठ के बाद का प्रेम:

प्रेम प्रधान फिल्मों के अंतर्गत 1965 में यादें के अलावा गजल, रात और दिन, भीगी रात, गाइड, मेरे सनम, जब जब फूल खिले, नीला आकाश; 1966 में प्यार किए जा, दिल दिया दर्द लिया, एराउण्ड द वल्र्ड, तीसरी कसम, 1967 में पवि़त्र पापी, पड़ोसन, दीवाना, चिराग, सुहाना सफर, एन इवनिंग इन पेरिस, मिलन, ब्रह्मचारी; 1968 में मेरे हुजूर, झुक गया आसमां, हसीना मान जाएगी, शागिर्द, तुमसे अच्छा कौन है; 1969 में सपनों का सौदागर, आराधना, मन का मीत, अनमोल मोती, सावन भादौं; 1970 में शर्मीली, सच्चा झूठा, पहचान, शराफत, हमजोली, तलाश, मेरा नाम जोकर आदि फिल्में बनीं।

1971 में हम तुम और वो, आप आए बहार आई, मर्यादा, आन मिलो सजना, कटी पतंग, महमूब की मेंहदी; 1972 में रामपुर का लक्ष्मण, अमर प्रेम, बनफूल, तांगे वाला; 1973 में एक नजर, दाग, लोफर, चोर मचाए शोर, बाॅबी, सौदागर, दो फूल, नैना; 1974 में प्रेमनगर, प्रेमपर्वत, यादों की बारात, अमीर गरीब, प्रेमशास्त्र; 1975 में जूली, रफूचक्कर, रजनीगंधा, मिली; 1976 में कभी कभी, चितचोर, महबूबा, दो अनजाने; 1977 में चला मुरारी हीरो बनने, अमर अकबर एण्थोनी; 1978 में कस्में वादे, देवता, देस परदेस, सत्यं शिवम्, सुंदरम्; 1979 में बातों बातों में और नूरी तथा 1980 में कर्ज व आशा वगैरह फिल्मों ने बहुत लोकप्रियता हासिल की।

1981 में नसीब, याराना, 1982 में ये नजदीकियां, मासूम, दीदार ए यार, 1983 में अगर तुम न होते, शराबी, बेताब, एक दूजे के लिए, 1985 में राम तेरी गंगा मैली, हीरो, 1986 में हीरो हीरा लाल, अर्जुन पण्डित, मैं और तुम, दूध का कर्ज, 1987 में मि. इण्डिया, 1988 में सोहनी महिवाल, कयामत से कयामत तक, 1989 में मैंने प्यार किया, चांदनी, शोला और शबनम, इश्क इश्क इश्क एवम् 1990 में आशिकी व दामिनी आदि फिल्मों का काफी बोलबाला रहा।

1991 में फूल और कांटे, सड़क, साजन, 1992 में खुदा गवाह, माशूक, सनम बेवफा, 1993 में अनाड़ी, फिर तेरी कहानी याद आई, डर, चमेली की शादी, दिल आशना है, 1994 में हम आपके हैं कौन, हेलो ब्रदर, मेंहदी, हद कर दी आपने, कभी हां कभी ना, बादल, 1995 में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, आओ प्यार करें, अंदाज अपना अपना, राजा भइया, 1996 में राजा की आएगी बारात, अग्निसाक्षी, कुली नं. वन, हीरो नं. वन, 1997 में जीत, दरार, राजा हिंदुस्तानी, 1998 में करीब, डुप्लीकेट, कुछ कुछ होता है, दिल तो पागल है, 1999 में ताल, कहो ना प्यार है, राम जाने, हम दिल दे चुके सनम तथा 2000 में अफसाना प्यार का, मोहब्बतें, गज गामिनी, जानम समझा करो नामक फिल्में रिलीज हुईं। क्रमशः

गज़ल : कोई बात नहीं :

koi baatगज़ल : कोई बात नहीं :

तुम पे हालात के ़खतरे हैं कोई बात नहीं
जहाँ ने ज़ुल्म ही करे हैं कोई बात नहीं

जिनकी आँखो में चमकती थी हमेशा उल्फत
आज कुछ अश्क के ़कतरे हैं कोई बात नहीं

सबको मालूम है कि ज़िन्दगी की राहों में
दर्द के काँच से छितरे हैं कोई बात नहीं

आफतें आने पे आकाश के ़फरिश्ते भी
अर्श से ़फर्श पे उतरे हैं कोई बात नहीं

सभी की उम्र की किताब के नाज़ुक पन्ने
दीमक-ए-व़क्त ने कुतरे हैं कोई बात नहीं

अपनी तकली़फ बार-बार बयाँ मत करिए
हम भी इस दौर से गुजरे हैं कोई बात नहीं