गज़ल : आदमी :

अपनी ज़ुबाँ से जब भी मुकरता है आदमी
जीते हुए भी उस घड़ी मरता है आदमी

यह जानते हुए भी कि हर चीज़ है फानी
क्यों अपने उसूलों से उतरता है आदमी

उम्मीद के पहाड़ पर मिलती है जब शि़कस्त
गिरता है चटखता है बिखरता है आदमी

जाता है गुमाँ टूट और आता है ़खुदा याद
जिस व़क्त मुश्किलों से गुजरता है आदमी

कुछ इस तरह का हो गया लोगों का रवैया
पढ़ता है और नौकरी करता है आदमी

जंगल में जानवर लगा करते हैं ़खतरना़क
शहरों में आदमी से भी डरता है आदमी

लोकभाषा: परिवर्तन 2

  1. महाप्राणीकरणः
    अल्पप्राण ध्वनियों का महाप्राण उच्चारणः
    जुकाम झ जुखाम
    बन्दूक झ बन्ध्ूाक
    आप झ आफू
    कबाड़ी झ कभा्ड़ि
  2. अल्पप्राणीकरणः
    महाप्राण ध्वनियों का अल्पप्राण उच्चारणः
    तारीख झ तारिक
    बाघ झ बाग
    कंजूस झ कंचूस
    झूठ झ झुट
  3. अघोषीकरणः
    सघोष ध्वनियों का अघोष उच्चारणः
    रेजगारी झ रेचगारि
    पोस्टकार्ड झ पोस्टकाट
    अन्दाज झ अन्ताज
    गजब झ गजप {क्रमशः}

लोकगाथा: हरू सैम 10

haru m 10लोकगाथा: हरू सैम 10

भै जब दुर्सौत् गाड़ ओड़ो हालनूँ हो।
तिरिया को दुसायो हुँलो काँ मुख दूखँलो हो?
मैंने आब जानू होलो वी छेपुला कोट हो।
म्योरा भै दयाली सैंम बंदी पड़ीं र्यान हो।

खोलुँलो जब भै कि बन्दी हंसुलागढ़,
तब मूख देखूँलो हो।
थी बखत काईनारा ढलढल रुँछि हो।

बोलाँछी हरु, इजा! तु एकल्वे न जाए हो।
त्यर भाणिज गोरिबो धौली धुमाकोट हो।
घुड़साल बादीकि होली ऊ हँसुला घोड़ी हो।
करोली कट्याल होली, डोर्याली चाबुक हो।

धूरिमुड़ी धरीकि होली तैकी जीन जीत हो।
बोंनाला का ढुंङा होली भनार की चाबी हो।
जमू का रे द्वउाार लुवा की आगली हो।
कुबेर भनार लड़न कि आलो हो। क्रमशः