भजन : जै हो :

भजन : जै हो :

मात भवानी तेरि जै हो
जग कल्यानी तेरि जै हो
त्वीले भजाई हर एक बुराई
चतुर सयानी तेरि जै हो
मात भवानी तेरि जै हो

उच्च सिखर मैं रौंछै मैया
कष्ट हरण हूं औंछै मैया
दीन दुखी की आस पुरि कर्न्य
हे महादानी तेरि जै हो
मात भवानी तेरि जै हो

द्याप्त लगै करनान तेरि पूजा
बिपदा मैं क्वे नै हुन दूजा
हर संकट मैं औंछि हमेसा
याद सुहानी तेरि जै हो
मात भवानी तेरि जै हो

अंस हमूं मैं तेरो परमेस्वरि
बंस हमारे तेरो मातेस्वरि
सब्बौ की ईजा की ईजा
ठुलि महारानी तेरि जै हो
मात भवानी तेरि जै हो

jai ho

लोकभाषा : कुमैयां :

kumaiyaaanलोकभाषा : कुमैयां :

चम्पावत की बोली ‘कुमैयां’ के साथ वहाँ के व्यक्ति और समाज को समझने के लिए जो इतिहास उपलब्ध है, उसके अनुसार कुमाऊँ की राजधानी के पक्ष में जो सभ्यता पनपी, उसमें एक ओर भारतीय परम्पराओं का सौन्दर्य प्रकाशमान था और दूसरी ओर पर्वतीय विशेषताओं का आकर्षण विद्यमान था। आज भी इस क्षेत्र में कहीं कत्यूरी शासनकाल की सांस्कृतिक विरासत की अनेक प्रकार से जगह-जगह छोड़ी गई छाप दिखाई देती है तो कहीं चन्द शासनकाल की विकासोन्मुख सभ्यता के अवशिष्ट किन्तु गहन चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार कुमैयाँ पर एक ओर आग्नेय दरद- खस का प्रभाव प्रतीत होता है तो दूसरी ओर उसमें अर्ध मागधी का पुट भी नजर आता है, तथापि रूपात्मक गठन की दृष्टि से वह शौरसैनी अपभं्रश के अधिक निकट है।

यह तो इतिहास सम्मत है कि चन्दकालीन कुमाऊँ की मूल राजधानी चम्पावत ही थी। अतः उनके प्राचीनतम अभिलेख कुमैयाँ बोली में ही पाये जाते हैं। कालान्तर में राजधनी के अल्मोड़ा स्थानान्तरित होने के बाद उस तरफ के इलाके कुमाऊँ राज्य में सम्मिलित होते रहे और उन इलाकों की बोलियाँ भी कुमाउनी में शामिल होती रहीं। इन सब अलग-अलग बोलियों के बोलने वालों के बीच पर्वतीय परिस्थितियों में यातायात की तत्कालीन असुविधाओं के कारण पारस्परिक सम्पर्क भी कम ही हो पाया।

पारस्परिक सम्पर्क की सुलभता और अध्किता भाषा के निर्माण में सहायक होती है और सम्पर्क की दुर्लभता और अल्पता से बोलियों का भेद बढ़ता है। इस सम्पर्क के साधक और बाधक अनेक कारण हैं। जहाँ साधक कारण है, वहाँ स्थानीय बोलियाँ जमीं रहती हैं। यह कारण इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि कुमाऊँ के मूल निवासियों की बोलचाल के माध्यम को हिन्दी की पहाड़ी उपभाषा की एक बोली के रूप में कुमाउनी अवश्य कहा जाता रहा, पर कुमाऊँ के ऊँचे-नीचे पर्वतों तथा छोटी बड़ी नदियों की प्राकृतिक सीमाओं से सुनिश्चित अलग-अलग घाटियों में रहने वालों की बोलियाँ अपने-अपने परिवेशों में अलग-अलग विकसित होती रहीं। क्रमशः

लोकगाथा : हरू सैम 3

haru m 3लोकगाथा : हरू सैम 3

गाई धन देला सैंमज्यू
कलड़िया ठाट हो।
बैगिया लछिमि दी देला
दी देला चारै पदारथ हो।

सुपना में देखी सैमज्यू ले
छिपूला को कोट हो।
पिछुला का कोट होलि
राणि पिंगला हो।

बार भाई छिपुलों की होली
एक राणी पिंगला हो।
पिंगला देखी सैमज्यू जाणी
कै रुबा को कातो हो।

जाणी पुन्यू की चाननी,
बैसाखी सूरिज हो।
आधी रात मजा पिंगला
क्या बोली बोलाँछी हो-

”जै दिन बटी पिंगला का आयूँ
की दिन बती सदाबर्त छना हो।
सदावर्त अस्नान करँछु हो।
देखनक नों देवतै न देख्यो हो। क्रमशः

लोकगीत : धार्मिक लोकगाथाएं :

dharmikलोकगीत : धार्मिक लोकगाथाएं :

कुमाऊं की लोक आस्थाओं पर आधारित गाथाएं धार्मिक लोकगाथाओं की कोटि
में आती हैं। जागर के नाम से प्रसिद्ध इन गाथाओं के विशिष्ट गायक जगरिया
कहलाते हैं। इनका गायन अभीष्ट की प्राप्ति के लिए देवता का आह्वान करता है।
देवता या देवी का अवतरण होने पर डंगरिया द्वारा ढोल-नगाड़ाें की थापों पर
झूमते-नाचते हुए जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर दिए जाते हैं। ये गाथाएं देवी देवता
एवं सहायक शक्ति विषयक दो भागों में विभक्त हैं –

देवी देवता विषयक

इन गाथाओं में ग्वल्ल, भोलानाथ, गंगनाथ, कालसिन, नंदादेवी, गरदेवी आदि अनेक
देवी-देवताओं के जागर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनमें उनके जीवनवृत्त का माहात्म्य
गाकर स्थानीय लोकगायक उनसे की जाने वाली मनौतियों का भी विस्तार सहित वर्णन करते
हैं। उदाहरण के लिए गंगनाथ के जागर की प्रारंभिक पंक्तियां दृष्टव्य हैं –

‘ओ हो हो ए रे गांगू !
डोटी को रौतान छिये, छै पलिया दीवान छिये
बबू भवैचना को कुंअर छिये, माता प्यूंला को लला छिये
बबू केसरी चना छन, आमा भानमती
गांगू कि उदेख बैराग लागौ त्वीकैं!’

सहायक शक्ति विषयक

लोकदेवताओं के साथ उनकी सहायक शक्तियों के जागर भी प्रचलित हैं। लोक विश्वास
है कि ये शक्तियां देवी देवताओं के गण हैं, अत: इनका आह्वान करना भी जरूरी है।
देवियों के साथ परियां तथा आंचरियां आहूत की जाती हैं और भोलानाथ के साथ ऐड़ी व
कलुवा वीर के आमंत्रण की मान्यता है –

‘कलुआ वीरा, केली घाट को जनमण
अरे वीरा सात हाथ खड्ड डालै
के चालो रचि दियां सात हाथा
खड्ड हाली डालौ धरमसिला पाथरा
कै चाली टोड़लै वीरा, त्यारा हाथ में
हथघड़ी छन गाव में घचेरी
खुटन में नेवर माथी धरमसिला पाथरा’

विशेष : भारतीय नारी :

bhartiyविशेष : भारतीय नारी :

मानव सृष्टि के सनातन रथ के दो पहिए हैं – एक नर और दूसरा नारी।
इनमें से किसी एक के भी अभाव में मानव जीवन आगे नहीं बढ़ सकता।
नर को परुषता का और नारी को मृदुलता का प्रतीक माना जाता है।
शिवशंकर के अर्धनारीश्वर में कठोरता और कोमलता के समन्वय के साथ
साथ यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं,
बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। संभवतः इसीलिए भक्ति और साहित्य में देवी
देवताओं युगल रूप में उपासना प्रारंभ हुई होगी; जैसे शिव पार्वती, विष्णु
कमला, राम सीता, राधा कृष्ण आदि।

नर और नारी के युगल स्वरूप की पूर्णता को ध्यान में रखते हुए हमारे देश
में प्राचीन काल से ही नारी को र्प्याप्त सम्मान दिया जाता रहा है। ‘यत्र नार्यस्तु
पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जैसी उक्तियां हमारे पुरातन सभ्यता के अनुभव सम्पन्न
जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति हैं। मां के रूप में आदर, बहन के रूप में स्नेह, पत्नी
के रूप में प्रेम और पुत्री के रूप में वत्सलता की अधिकारी नारी वास्तव में कई
प्रकार से अपनी सामाजिक भूमिका अदा करती है। वह ब्रह्मा की तरह सृजनकारी
है, तो विष्णु की तरह पालनहार भी। आवश्यकता पड़ने पर वह शिव की तरह
प्रलयंकारी भी हो जाती है।

नारी की स्थिति के संदर्भ में यह ज्ञात होता है कि वैदिक काल में वह जीवन के
प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष की सहभागिनी रही। उसके बिना धार्मिक अनुष्ठान अपूर्ण माने
जाते थे और वह आध्यात्मिक विषयों पर शास्त्रार्थ भी कर लेती थी। रामायण –
महाभारत काल में भी नारी का स्थान महत्वपूर्ण बना रहा। सीता और अनुसूया, कुंती
और गांधरी, सावित्री और दमयंती की कथाएं आज तक यथावत् प्रेरक बनी हुई हैं।
सम्राट अशोक ने अपनी पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए दूर दूर
तक भेजा था। मण्डन मिश्र की धर्मपत्नी भारती ने जगतगुरु शंकराचार्य के साथ
अविस्मरणीय शास्त्रार्थ किया था। नारी की इस स्थिति कां परिवर्तनशील समय ने एक
सा नहीं रहने दिया। क्रमशःः

सिनेमा : साठ के बाद :

saath ke baadसिनेमा : साठ के बाद :

परिवार प्रधान फिल्मों की परिपाटी में 1961 में भाभी की चूड़ियां, मेम दीदी तथा मॉडर्न गर्ल, 1962 में मेंहदी लगी मेरे हाथ, शादी तथा मैं चुप रहूंगी, 1963 में बहूरानी, घर बसा के देखो तथा सेहरा, 1964 में पूजा के फूल, मैं भी लड़की हूं तथा शगुन, 1965 में बहू बेटी, वक्त तथा खानदान, 1966 में देवर, ममता तथा दादी मां, 1967 में दस लाख, हरे कांच की चूड़ियां तथा एक फूल दो माली, 1968 में नीलकमल, दो कलियां तथा तीन बहूरानियां, 1969 में बड़ी दीदी, होली तथा वारिस, 1970 में मां का आंचल, ममता तथा गोपी आदि फिल्मों के नाम उल्लेखनीय हैं।

1971 में पूरब और पश्चिम, लाखों में एक और मैं सुंदर हूं, 1072 में पराया धन, पिया का घर और भाई हो तो ऐसा, 1973 में धुंध, 1974 में कोरा कागज, और आपकी कसम, 1975 में छोटी सी बात और चुपके चुपके, 1976 में वैराग, 1977 में परवरिश, घरौंदा और अपना खून, 1978 में पति पत्नी और वो, मैं तुलसी तेरे आंगन की, दुलहन वही जो पिया मन भाए और अंखियों के झरोखे से, 1979 में नौकर, अमर दीप और आंगन की कली, 1980 में थोड़ी सी बेवफाई, सौ दिन सास के, खूबसूरत और सुहाग आदि फिल्में पर्याप्त लोकप्रिय हुई।

1982 में प्रेम रोग व निकाह, 1983 में भावना व आदमी और औरत, 1986 में नसीब अपना अपना, 1988 में घर घर की कहानी व श्रद्धांजलि, 1992 में बेटा, 1994 में आज की औरत, 1995 में चालबाज, 1996 में बीवी नंबर वन व होगी प्यार की जीत, 1997 में विरासत व इनकाउण्टर, 1998 में चाची 420, 1999 में रामअवतार व जिस देश में गंगा रहता है, 2000 में सूर्यवंशी, जमाई राजा, किशन कन्हैया व खामोशी, 2001 में कभी खुशी कभी गम, 2002 में मेरे यार की शादी है व मुझसे दोस्ती करोगे और 2004 में बागवां आदि फिल्में बनीं।

26. 12. 2004 के राष्ट्रीय सहारा अखबार के – सण्डे उमंग – पृष्ठ 4 में चंद्रकांत शिन्दे ने लिखा कि‘नंगेपन से भरी फिल्मों के माहौल में ‘बागवां’ ने एक खुशनुमा माहौल का निर्माण किया। बूढ़े नायक नायिका की यह फिल्म दर्शकों को रुलाने और सोचने पर मजबूर कर गई। अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी फिल्म के नायक नायिका थे। बच्चे बड़े होने पर किस तरह माता पिता को दुत्कारते हैं, उसकी बहुत ही अच्छी कहानी रवि चोपड़ा ने पर्दे पर उतारी थी। फिल्म की सफलता ने साबित कर दिया कि दर्शक सिर्फ नंगापन ही नहीं, बल्कि अच्छी और स्तरीय फिल्मों को भी स्वीकार करते हैं।’ क्रमशः

गजल : मत करना :

mat karnaगजल : मत करना :

धड़कनें बेकरार मत करना
मेरी यादों से प्यार मत करना

दिल अगर जिद करे तो रो-रो कर
आँख नम बार बार मत करना

ज़िन्दगी की सियाह रातों में
ख़्वाब का एतबार मत करना

वो जो उल्फत में जान देते हैं
मुझको उनमें शुमार मत करना

मुझको मजबूरियों ने लूट लिया
अब मेरा इन्तज़ार मत करना

हरेक चीज़ की हद होती है
कभी उस हद को पार मत करना