लोकगीत : राम व शिव :

ramलोकगीत : राम व शिव :

राम संबंधी –

कुमाऊं में राम संबंधी लोक गाथाएं भी उपलब्ध होती हैं। सीता बनवास
आदि से संबंधित गाथाएं मुख्य हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम होने के कारण लोक
गाथाओं में राम का चरित्र कृष्ण की अपेक्षा कम विस्तार पा सका है।
सीता बनवास संबंधी गाथा के अनुसार –

‘रात खुली परभात भयो जमनाछाल में
सीता माता मायेडि़ को रे नींन टुटि छ
सीता रे माता कन बिपद बड़ी ऐ गो
वार पार चैंछ जमनाछाल मांजा
लछमन नी देखा सीता बेहोश हई गैछा
अरे धना रे धना, नरैन बेहोश हई गैछा’

शिव संबंधी –

कुमाउनी समाज पर शैव एवं शाक्त मतों का विशिष्ट प्रभाव होने के कारण
यहां शिव संबंधी लोकगाथाएं भी मिलती हैं। इन गाथाओं में दक्ष प्रजापति का
यज्ञ विध्वंस, कामदेव भस्म, भस्मासुर, बाणासुर आदि से संबंधित प्रकरण
प्रधान हैं। शिव पार्वती का वर-वधू के रूप में अधिक वर्णन हुआ है –

‘नीलकण्ठा मांजी ओ गुरु महादेवा
सृष्टि अधार गंग नीलकण्ठा देवा
नीलकण्ठा मांजी ओ गौरा पारवती
गुरु महादेव कै बैना बोलाला-
सुण मेरी गौराजा कानूं की भारत
मैं त जानूं गौराजा यो घुमण दुनियां
भैटी रये गौराजा तू नीलकण्ठ मांजा’

विशेष: विज्ञान और धर्म:

vigyan & dharmविशेष: विज्ञान और धर्म:

विज्ञान और धर्म जिज्ञासा रूपी पेड़ की ऐसी दो शाखाएं हैं, जिनमें सत्य का फल लगता है। विज्ञान की अत्यधिक उन्नति ने मानव जीवन को सुख सुविधाओं से भर दिया है। इन सुविधाओं ने मानव को परितुष्ट करने की बजाय असंतोषी बना दिया है। यह असंतोष उसं अधर्म की ओर उन्मुख करने लगा है, अतः परिस्थिति के संतुलन के लिए आज धर्म की आवश्यकता भी महसूस होने लगी है।

शायद इसी आवश्यकता की ओर इशारा करते हुए विश्व के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था कि ‘ धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है।’ इसी बात को सर फ्रांसिस बेकन ने इन प्रकार कहा है कि ‘मानवीय ज्ञान की अपरिपक्वावस्था में धर्म और विज्ञान के बीच 36 के 3 व 6 का संबंध दिखाई देता है, परंतु वास्तव में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।’

हिंदी के प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य कामायनी की कथा उस मानव की कथा है, जो बुद्धि के समीप पहुंच कर अंततः संतप्त होता है और श्रद्धा के पास आकर अखण्ड आनंद का अनुभव प्राप्त करता है। बुद्धि के प्रयत्नों से प्राप्त होने वाले सांसारिक सुख हृदय के प्रयासों से अनुभव होने वाले आनंद से बढ़कर नहीं होते।

जीवन में उनकी आवश्यकता है, लेकिन केवल उन्हीं की आवश्यकता नहीं है। उनके अतिरिक्त भी जीवन का कोई उद्देश्य होता है। इसलिए विज्ञान और धर्म दोनों ही मानव के लिए आवश्यक हैं, पर विज्ञान तभी तक उपयोगी है; जब तक वह विनाश की ओर उन्मुख नहीं होता। इसी प्रकार धर्म भी तभी तक लाभप्रद है जब तक कि वह पाखण्डों या आडंबरों से दूूूूूूूूूूूूर रहता है।

इसमंे कोई संदेह नहीं कि मानव ने विज्ञान के बूते पर निरंतर प्रगति की है ओर वह भौतिक दृष्टि से पर्याप्त संपन्न हो चुका है, लेकिन उसका यह विकास एकांगी ही माना जाता है। विज्ञान ने मानव को जो शक्तियां प्रदान की हैं, उन्हें विध्वंसात्मक प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। यदि समय रहते इस सोच को नहीं बदला गया, तो विज्ञान मानव जाति के लिए एक अभिशाप बनकर रह जाएगा। क्रमशः

सिनेमा: सवाक् सामाजिक 03

savaak 3सिनेमा: सवाक् सामाजिक 03

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में 1981 में लावारिस, मेरी आवाज सुनो, आधार शिला; 1982 में नमक हलाल, अर्थ, कथा, खारिज,सतह सक उठता हुआ आदमी; 1983 में मण्डी, खण्डहर, होली; 1984 में जाने भी दो यारो, हम रहे न हम, कहां तक आसमान है, मशाल, मोहन जोशी हाजिर हो, अंधी गली, अर्धसत्य; 1985 में शर्त, गुलामी, त्रिकाल, परिणति, आघात, न्यू डेल्ही टाइम्स; 1986 में नाम, ईमान धरम, बवण्डर, मैसी साहब, एक पल; 1987 में आग ही आग, तरंग, पेस्टनजी, प्रतिघात; 1988 में खुदगर्ज, सलाम बाॅम्बे, उन्नी, एक दिन अचानक, खयाल गाथा; 1990 में अवतार, दिशा, दृष्टि, कस्बा, लेकिन व नजर काबिल ए तारीफ रहीं।

1991 में अमृत, बुलंदी, टकसाल, गुप्त, दिलवाले, ईडियट; 1992 में चैराहा, चमत्कार, सूरज का सातवां घोड़ा; 1993 में विजय पथ, मिस विटीज चिल्ड्रन, जयगंगा; 1994 में पुष्पा, नाजायज, दलाल, तर्पन; 1995 में द मेकिंग आॅफ महात्मा; 1996 में गैर, चल मेरे भाई, तू चोर मैं सिपाही, चांद ग्रहण, चांदनी बार, घटक, संदोशन; 1997 में सर, मृत्युदण्ड, कुदरत, बेदर्दी, डांस आॅफ द विण्ड, शैडोज इन द डार्क; 1998 में सत्यमेव जयते, भाई, तवायफ; 1999 में जानी दुश्मन; 2000 में कब्जा, संघर्ष आदि फिल्मों का निर्माण हुआ।

नई सदी में 2001 में दिल चाहता है, खेल, रुद्राक्ष, सलाखें, दाग, रांग नंबर, मोक्ष, चमेली, बाॅलीवुड काॅलिंग; 2002 में अग्निचक्र, आवारा पागल दीवाना, जाल, युग पुरुष, कगार, गंगाजल, जुबैदा, मानसून वैडिंग; 2003 में कर्ज, मुंबई मेटिनी, मार्केट, मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं, डरना मना है, मिस्टर एण्ड मिसेज एैयर, मैं प्रेम की दीवानी हू, मुंबई से आया मेरा दोस्त, भूत, कोई मिल गया, अरमान, दम, अब तक छप्पन, मुन्नाभाई एमबीबीएस; 2004 में स्वदेश, लकीर, मीनाक्षी, मकबूल, मातृभूमि, जूली, न तुम जानो न हम, ऐलान, तौबा तौबा, सत्य बोल, बाजार ए हुस्न, खामोशी और 2005 में ब्लैक आदि फिल्में बनीं।

2006 में ओंकारा, खोसला का घोसला, रंग दे बसंती, डोर, लगे रहो मुन्ना भाई; 2007 में तारे जमीं पर, जब वी मेट; 2008 में ओए लकी ! लकी ओए, फिराक, गुलाल, अ वेडनसडे; 2009 में देव डी और थ्री ईडियट्स; 2010 में लव सेक्स और धोखा, शोर इन द सिटी, उड़ान, पीपली लाइव, गुजारिश; 2011 में जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, रेडी, बाॅडी गार्ड, शागिर्द, फोर्स; 2012 में कहानी, पान सिंह तोमर, विकी डोनर, रूाहीद, गैंग्स आॅफ वासेपुर; 2013 में बाॅस, चेन्नई एक्सप्रेस, स्पेशल 26, जौली एलएलबी; 2014 में सिंघम रिटन्र्स, किक, इंटरटेनमेण्ट, हीरोपंती, पी के; 2015 में अलीगढ़, तितली, मसान, दम लगाके हाईशा, दृश्यम्; 2016 में पिंक और दंगल, सुल्तान, शिवाय, अकीरा; 2017 में मुक्तिभवन, रईस, ट्यूब लाइट, टाइगर जिंदा है; 2018 में स्त्री, पद्मावती, पैडमैन, रेस 3, सिंबा तथा 2019 में आर्टिकल 15, वार, कबीर सिंह, केसरी आदि फिल्में उल्लेखनीय हैं। क्रमशः

गजल: किसलिए:

 

kisliyeगजल: किसलिए:

किसलिए प्यार में सताया गया
कोई कारन नहीं बताया गया

बज्म-ए-उलपफत में जब भी पाँव रखा
दिल का हर मामला दबाया गया

कोई गुनाह न होने पाए
इसलिए ज़्ाुल्म-ओ-सितम ढाया गया

बेवफाई न हो सकी हमसे
उनसे वादा नहीं निभाया गया

जाने अब नींद क्यों नहीं आती
ख़ुद को किस-किस तरह सुलाया गया

मेरी आँखों से अश्क का कतरा
गिर पड़ा या उसे गिराया गया

भजन: ओ मैया:

o maiyaभजन: ओ मैया:

हे दुख हरन्या मंगल करन्या
भाग्य विधाता छै तू माता

मातेश्वरि सब्बै जाग हैरै
तेरी जय जयकार ओ मैया
वन्दन कर स्वीकार

सब्बौ को शुभचिंतन करन्या
भक्त जनौं का संकट हरन्या

म्यर ख्वर मैं हाथ राख दे मैया
एत्ती कर उपकार ओ मैया
कर म्यर लै उद्धार

भौसागर छ दुखौ को सागर
जब हैगो यो सत्य उजागर

तू ई छै मेरि ताकत मैया
तू ई छै पतवार ओ मैया
कर दे नैया पार

लोकभाषा: ईरानी और दरद शाखा

 

iraaniलोकभाषा: 1. ईरानी शाखा

ईरानी शाखा के अन्तर्गत अवेस्ता, वर्गिस्ता, पश्तो, देवारी, बलूची, ओसेटिक,
कुर्दी, पहलवी तथा आध्ुनिक फारसी भाषाएँ आती हैं, जिनमें से अवेस्ता तथा
फारसी प्रमुख हैं। ईरानी भाषा के प्राचीन साहित्य में से पारसियों का धर्मग्रन्थ
‘अवेस्ता’ उपलब्ध होता है, जिसकी भाषा )ग्वेद की भाषा से कापफी मिलती
जुलती है। संस्कृत, अवेस्ता और पफारसी के शब्दों में भी पर्याप्त साम्य दृष्टिगोचर
होता है, जैसे-

फारसी संस्कृत अवेस्ता
अदम अहम् अजेम्
चहार चत्वारः चथ्वारो
दादः अन्द ददाति ददेन्ति
पिदर पितृ पितर
मादर मातृ मातर
यदी यदि येजी

2. दरद शाखा

दरद शाखा के अन्तर्गत तीन वर्ग माने गए हैं। पहला पश्चिमी वर्ग, जिसकी भाषा
काफ़िर कहलाती है, पर इसमें कोई साहित्य उपलब्ध् नहीं होता। दूसरा केन्द्रीय वर्ग,
जिसकी भाषा खोवारी कही जाती हैऋ जिसका चित्राली रूप अध्कि प्रचलित है।
तीसरा उत्तरपूर्वी वर्ग, जिसकी भाषाएँ शीना, कश्मीरी और कोहिस्तानी हैं। इनमें से
शीना प्राचीन दरद का विकसित रूप है। कश्मीरी कश्मीर प्रदेश की प्रचलित भाषा है
और कोहिस्तानी छोटी-छोटी बोलियों का समवेत नामकरण। क्रमशः

लोकगाथा: धार्मिक:

dharmik (2)लोकगाथा: धार्मिक:

लोक प्रचलित विश्वासों से अभिप्रेरित ‘जागर’ कुमाऊं
में धार्मिक लोकगाथा के नाम से जाने जाते हैं। तंत्र
मंत्र एवं देवावतरण से संबंधित इन गाथाओं के गायक
जगरिया कहलाते हैं।

जगरिया अभीष्ट की प्राप्ति के लिए अपने गायन से
किसी देवी या देवता को जगा ने का विधिवत् प्रयास
करते हैं। नृत्य इन गाथाओं का अविच्छिन्न अंग है।

नाचने वाला व्यक्ति ‘डंगरिया’ कहलंतं है। वह स्त्री
या पुरुष कोई भीहो सकता है। थाली, डमरू, ढोल,
नगाड़ा वाद्यों के बीच देवता को उद्बुद्ध करने पर
एक विशिष्ट वातावरण उत्पन्न होता है।

जिसका प्रभाव पड़ने के कारण ‘डंगरिया’ उठ कर
नाचने लगता है। वह हुंकार करके जोर जोर से घूमने
लगता है। इसे देवता विशेष का ‘अवतरण’ कहते हैं।

तब वहां एकत्र लोग इष्ट आगमन से प्रसन्न होकर उसे
आस्था के साथ नमन करके उससे प्रश्न पूछने लगते हैं।
उत्तर पाते हैं। समस्याएं बताते हैं। समाधान पाते हैं।