गजल: नै हुन:

nai hunगजल: नै हुन:

लड़ै कसि लगै हो गर वां
धर्म अर ईमान नै हुन
जित्न वाला लै हार्न वाला है
कम नुकसान नै हुन

हर एक लड़ाई जित्नि
जरूरी नै हुनि कभ्भैं लै
हर एक हार है शिक्षा लिन
मैं लै अपमान नै हुन

परनिंदा या परउपदेस
जमानै आदत छू
आप्नि बुराई सुनिबेर क्वे
चुप रौ आसान नै हुन

मूर्ख हुनान जो बात बात मैं
लड़ै झग्ड़ करनान
समझदार जो आप्नी चुगली
सुनिबेर हैरान नै हुन

लोकभाषा: बोलियां:

boliyaanलोकभाषा: बोलियां:

एक भाषा की कई बोलियाँ होती है। कारण, भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है और इस क्षेत्र के विस्तार के कारण विभिन्न उपक्षेत्रों में पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा मध्य उपक्षेत्रों में एक ही भाषा के बोलचाल के अनेक रूप हो जाते हैं, क्योंकि पूर्वी उपक्षेत्रों के व्यक्ति परिश्चम वालों से अधिक सम्पर्क नहीं कर पाते हैं तथा उत्तर क्षेत्र वाले भी दक्षिण क्षेत्र वालों से अधिक नहीं मिल पाते हैं जिससे वे एक ही भाषा की बोलियाँ होने पर भी परस्पर भिन्न – भिन्न होती हैं। परस्पर भिन्न – भिन्न होते हुए भी वे एक ही भाषा के अधीन रहती हैं।

प्रत्येक बोली अपनी प्रवृत्ति या गठन की विशेषावस्था वाले निजी परिवेश में पुष्पित पल्लवित होती है। यही कारण है कि अपभ्रंश काल के बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों के विविध परिवेशों में अलग-अलग बोलियों के अंकुर फूले-फले, जिन्होंने धीरे-धीरे भाषाओं का रूप ले लिया। कुमाउनी, हिन्दी भाषा की पहाड़ी उपभाषा की एक बोली मानी जाती रही है, पर अब साहित्य सृजन, बोलने वालों की संख्या एवं क्षेत्रीय विस्तार के कारण कुमाउनी ने भाषा का रूप ले लिया है। जिस तरह कुमाउनी हिन्दी की बोली के रूप में हिन्दी के साथ-साथ विकसित होती रही उसी तरह कुमाउनी की अन्य बोलियों के साथ-साथ बोली के रूप में कुमैयाँ भी समानान्तर रूप से विकसित होती रही है।

एक ही माता का दुग्धपान करने वाले सहोदर शावकों की भाँति कुमाउनी की बोलियों की विशेषतायें आकृतिमूलक साम्य के कारण विकासकाल में नजर नहीं आ पाई, पर जिस प्रकार बच्चों के बड़े होने पर उनके हाव-भाव अलग दिखाई पड़ने लगते हैं, उनकी रुचियों के भेद प्रकट होने लगते हैं, उसी प्रकार कालान्तर में कुमाउनी की पूर्वी तथा पश्चिमी उपभाषाओं तथा उनके उन्तर्गत आने वाली अलग-अलग बोलियाँ भी अपनी निजी विशेषताओं के कारण स्वतंत्र रूप में पहचानी जाने लगीं। इन बोलियों में कुमाऊँ की मूल राजधानी की बोली होने के बावजूद कुमैयाँ को वह महत्व नहीं मिल पाया, जिसकी वह हकदार थी। क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 4

haru m 4लोकगाथा: हरू सैम 4

बिरछा का नौ सैलले न बैठ्यै हो।
ज्यूनी मैं को चैलो हौलै मेर नित्तित्तर आलै हो।
सात राणी तेर घर छन।
अठूँ मैं पिंगलास बेवै लैजालै हो।

मर्यूँ मैं को चेलो हौले बिनराबनै रोले हो।“
आधाराति सपना पिंगला हरानि हो।
हरेहरुसैमज्य नींन भंग है गैछ हो।
रहनी रतूड़ा में मुरुली बजूँछ, आँङुली नचूँछ् हो।

मसाणी कैजू क्या बोली बोलाँछी हो-
सागरी को सैंम आज उदासी है गयो हो।
कित सौत नागणी राणी ले टहले न करी हो।
कित सीणी खाट आई पूज्या खटमल राकस हो।

”कौहो बाबा हरुसैंम, मन को बयान हो“।
मनकि बयान हरु बिंदराबन है बाटा लाग्यो हो।
बुकी को सुनू लियो, दुध-चाँदी बर्तन हो।
भगुवा कपड़ा लियो, हाथ को कंगन हो। क्रमशः

लोकगीत : वीरतापरक लोकगाथाएं :

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लोकगीत : वीरतापरक लोकगाथाएं :

कुमाऊँ के वीरों की व्यक्तिगत शौर्यगाथाएं वीरतापरक लोकगाथाओं की श्रेणी में आती हैं।
‘भड़ाै’ अथवा ‘कटकू’ के नाम से प्रसिद्ध इन वीर गाथाओं में यहां के भट – योद्धाओं
या सैनिकों के वीरतापूर्ण कृत्यों का गान किया जाता है। अपने राज्य की सुरक्षा अथवा
विस्तार के लिए संघर्ष करने वाले वीर राजाओं और उनकी ओर से शत्रु का मान मर्दन
करने वाले पैक या मल्ल संबंधी ये गाथाएं वास्तविक घटनाओं पर आधारित होने के कारण
महत्वपूर्ण हैं। इनके तीन प्रकार हैं -ऐतिहासिक, जातीय और रोमांचक।

ऐतिहासिक लोकगाथाएं

ये गाथाएं मुख्यत: कुमाऊं के कत्यूरी एवं चंद राजाओं से संबंधित हैं, जिन्हें लोकगायक
बड़े चाव से गाते हैं। कत्यूरी राजाओं की वंशावली शाम को आंगन में कालीन बिछाकर,
अस्त्र-शस्त्र सजाकर, पंचमुखी दीप जलाकर एक निश्चित प्रकिया के तहत प्रस्तुत की जाती
है। लोकगायक स्तुति पाठ करते हुए सबसे पहले कत्यूरी राज्य की सीमा का बखान करता
है। कत्यूरी राजाओं की वीरगाथाओं में राजा बिरमा की गाथा प्रसिद्ध है।

खई जोती गे द्यूड़ जागि गो
सिंहासन लगि गईं गुरू बैठि गईं
सौ मण नंगारै नौमति बाजि गै
नैपाली रणसिंग, छुर, खाड़ाे, खाणु-हथियार छजि गईं
रूपधारी तपधारी बेताल राजा दुलासा
राजा बिरमा की द्वियै आल बैठि गईं
बलाण मैं चालौ खनीं उठन मैं चालौ खनीं
चाल जा चमकनीं भूचाल जा हिलनीं
जोत राजा कत्यूरां कि ..

विशेष: बदलाव:

badlaavविशेष: बदलाव:

भारत में विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन तथा उनकी सत्ता की स्थापना के साथ साथ भारतीय नारी की स्थिति में बदलाव दिखाई देता है। विदेशियों के अत्याचारों व कुदृष्टि से बचने के लिए वह कभी तलवार लेकर समर में कूद पड़ी, कभी सिंधौरा लेकर जौहर की ज्वालाओं में समा गई; लेकिन हर नारी दुर्गावती या पद्मावती नहीं होती।

सामान्य नारी के लिए पदा प्रथा प्रारंभ हुई, बाल विवाह की परंपरा पड़ी ।इन परिपाटियों ने सामाजिक दृष्टि से भले ही नारी की सुरक्षा की हो, लेकिन शिक्षा से पूरी तरह वंचित कर दिया। अशिक्षित होने के कारण वह अपने पति की सहधर्मिणी या सहभागिनी नहीं बन सकी और कालांतर में उसकी स्थिति इतनी खराब हो गई कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण की लेखनीतक भाव विह्वल हो उठी –

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आंचल में है दूध और आंखों में पानी

ऐसी भावनाओं से अनुप्रेरित होकर आधुनिक युग में राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महान विचारकों तथा समाज सुधारकों भारतीय नारी की स्थिति सम्हालने का बीड़ा उठाया। सभी लोगों ने उनका समर्थन किया और नारी उत्थान के लिए किए जाने वाले प्रयास सफल होने लगे। इन सफलताओं के बावजूद सती प्रथा और दहेज प्रथा का अस्तित्व काफी हद तक बरकरार रहा। इनमें से सती प्रथा धीरे धीरे लुप्त होती चली गई, पर दहेज प्रथा का रूप अभी भी विकराल बना हुआ है।

यू ंतो यह प्रथा हमारे देश में वैदिक तथा पौराणिक काल से ही चली आ रही है, लेकिन यह कन्या के पिता द्वारा वर को भेंट स्वरूप प्रदान किया जाता था। सामंतवादी युग में राजा महाराजा अपनी प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए दहेज के रूप में हाथी घोड़ों और वस्त्राभूषणों के ढेर सहित दास दासियां भी देते रहे।
आधुनिक युग के प्रारंभ में तो यह परंपरा कन्यापक्ष की सामथ्र्य की सीमाओं में पोषित हुई, पर कालांतर में वरपक्ष की मांग के रूप में प्रकट होकर इसने सौदेबाजी की हद छू ली। इस पर गांधी जी ने कहा था कि – ‘हमें नीचे गिराने वाली दहेज प्रथा की निंदा करने वाला जोरदार लोकमत जागृत करना चाहिए और जो युवक इस तरह के पाप के पैसे से अपने हाथ गंदे करें, उन्हें समाज से बाहर निकाल देना चाहिए।’ क्रमशःः

सिनेमा : प्रेम प्रधान :

images (1)सिनेमा : प्रेम प्रधान :

जहां तक हिंदी की प्रेम प्रधान फिल्मों की परिपाटी का सवाल है, 1931 में लैला मजनू और शीरी फरहाद, 1932 में ससी पुन्नू और हीर रांझा, 1933 में सोहनी महिवाल और प्रेम का नशा, 1934 में प्रेम परीक्षा और अनोखा प्रेम, 1935 में देवदास और दर्द ए उल्फत, 1936 में संगदिल और स्ट्रीट सिंगर, 1937 में प्रेम कहानी और आशा, 1038 में बागवान और प्रेम बंधन, 1939 में दिल ही तो है और प्रेम सागर तथा 1940 में प्रेम नगर और सिविल मैरिज उल्लेखनीय रहीं।

1941 में परदेसी और मेरे साजन, 1942 में प्रीतम और नजराना, 1943 में दिल्लगी और मोहब्बत की जीत, 1944 में पहली नजर और ज्वार भाटा, 1945 में गजल और अनमोल घड़ी, 1946 में मेघदूत और साजन, 1947 में रोमियो जूलियट और दो दिल, 1948 में अनोखा प्यार और खिड़की, 1949 में अनोखी अदा और अंदाज तथा 1950 में बावरे नैन और जान पहचान आदि प्रेम प्रधान फिल्में बनीं।

1951 में अफसाना और मल्हार, 1952 में नौबहार और बैजू बावरा, 1953 में आह और दिल ए नादां, 1954 में आर पार और झनक झनक पायल बाजे, 1955 में मुनीम जी और मिस्टर एण्ड मिसेज 55, 1956 में चोरी चोरी और बसंत बहार, 1957 में गूंज उठी शहनाई और लव मैरिज, 1958 में चलती का नाम गाड़ी और फागुन, 1959 में अनाड़ी और दिल अपना और प्रीत पराई तथा 1960 में चौदहवीं का चांद और दिल भी तेरा हम भी तेरे आदि के नाम प्रमुख हैं।

1961 में जब प्यार किसी से होता है और नजराना, 1962 में प्रोफेसर और गीत गाया पत्थरों ने, 1963 में मेरे मेहबूब और फिर वही दिल लाया हूं, 1964 में आओ प्यार करें और हिमालय की गोद में के बाद ‘‘ एक नई प्रायोगिक फिल्म सुनील दत्त की ‘यादें’ फिल्म जगत में अपना विशेष महत्व रखती है। इस प्रकार की फिल्म पहले कभी भी नहीं बनी।अब तक तो फ्लैश बैक सिस्टम के माध्यम से पूर्व घटित घटना को पात्रों सहित दिखाया जाता था, जिसमें एक पात्र दूसरे पात्र से पीछै की बात कहता, तो उस बात को प्रकाश के वृत्त बनाकर साकार रूप दिया जाता था।’’

उक्त उद्धरण के लेखक श्री बी. एन. शर्मा जी ने अपनी पुस्तक ‘सवाक् भारतीय हिंदी फिल्म्स’ में लिखा है कि यादें ‘गीत विहीन एकपात्रीय फिल्म डेढ़ घण्टे की बनाई, जिसके पात्र सुनील दत्त स्वयं हैं। जिसको किसी घटना की पूर्व स्मृति होती है, वह घटना सामने नहीं आती, बल्कि सुनील दत्त के भावों के माध्यम से अबोध रूप से घटती है। जिसका दर्शकों को अप्रस्तुत पात्रों की अलग अलग आवाज से अनुभव होता है।’ क्रमशः

गीत : तुम :

tumगीत : तुम :

तुम्हारे रूप का दर्पण
बना आदर्श छबियों का
तुम्हारे प्यार का सागर
बना आश्चर्य कवियों का

तुम्हारे गीत सुनकर
कोयलों ने बोलना सीखा
तुम्हारी दृष्टि पाकर
मधुकरों ने डोलना सीखा

तुम्हारे केश छूकर ही
घुमड़ते हैं घने बादल
तुम्हारे नूपुरों को सुन
हुई हैं बिजलियां चंचल

तुम्हारी गुनगुनाहट से
नदी कलकल मचलती है
तुम्हारी धड़कनों से ही
हवा की गति बदलती है