लोकगाथा: हरू सैम 9

haru m 9 (2)लोकगाथा: हरू सैम 9

एक ट्याल छोड़िछ जब गैछ इनर का द्वार हो।
इनरासन होकिल तैकि जिया काईनारा हो।
इतरानी का कान पड़यो बाँसूली शबद हो।
बैस बैंनी परीन ऐंन आँछरी खेचरी हो।
भूचन हरुस जब बाटा लागी छिया,

वी बखत काईनारा स इसो आयो ग्यान हो।
कभै-कभै मेरो हरु बाँसूली बजूँछ्यो हो।
स्वनीका सपन आई इजू काईनारा हौ।
पीपली चैंरड़ी बाला हरीचन नींनौड़ी ऐ रैठ हो।

सपन में देखी तैले इजू काईनारा हो।
हरुस समूँछि जब गोदी में धरँछि।
पाँणी ले नऊँछी नौनि ले पोछँछि हो।
खीर भोजन दिछि हरु नीनै न टूटनि हो।

तू कैसे दुसाछे इजा, एकला जंगल हो?
ल्वीले क्यलेख बजैछ इजा उदासी बाँसुली हो?
थी बखत हरु बोलया दुश्मन दुर्सोनूँ इजा सिर काटी लिनूँ।
सोरे जै दुर्सोनूँ फोड़ी बाँट लिनूँ। क्रमशः

लोकसाहित्य: सामाजिक लोकोक्तियां:

samajikलोकसाहित्य: सामाजिक लोकोक्तियां:

सामाजिक: सामाजिक लोकोक्तियों के कई प्रकार हैं; जैसे –

जाति संबंधी:

बामण च्यलक उजणन ऐ रस्यार बण
जिमदारक च्यलक उजणन ऐ घस्यार बण

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जिमदार हुणि विचार नै
भैंस हुणि कच्यार नै

नारी संबंधी:

सैणि हुणि चूनै कि सौत
चोर हुणि खखारै भौत

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मुरुलि बजूंछै मैं त्यार नि औनी
बिणाई बजूंछी मैं त्यार नि औनी

धर्म संबंधी:

जो द्यल तन हुणि
ऊ द्यल कफन हुणि

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बिन गुरु बाट नै
बिना कोड़ी हाट नै

आचार संबंधी:

स्वा्र हुणि मरि गो नि कौन
आ्ग हुणि निमै गो नि कौन

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च्यल सुदरौं बबा का हात
च्येलि सुदरैं मै का हात

व्यक्तित्व संबंधी:

जां जां रघू पौण
वां नि रौ कुटी कौण

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सिरू सिर धार
बिरू बिर धार
टुकन्या बिचै धार

भोजन संबंधी:

गूड़ खै गुलैनी नै
लूण खै लुणैनी नै

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खा्ण हूं नि भै गेठी
कमर बांधि पेटी

नीति संबंधी:

राज करण आपुण देस
भीख मांगण परदेस

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मैंसक उजणन ऐ ग्वाल बण
लुवक उजणन ऐ फाल बण

विशेष: धर्म निरपेक्ष:

dharm-1विशेष: धर्म निरपेक्ष:

प्रजातांत्रिक प्रणाली में एक ही राजनीतिक दल का लंबे अरसे तक सत्ता में बने रहना अगा कुछ मामलों में सौभाग्यपूर्ण लगता है, तो कुछ संदर्भों में दुर्भाग्यपूर्ण भी अनुभव होता है। लंबे अरसे तक सत्ता में रहने वाले किसी राजनीतिक दल के हित और सरकार के हित एकाकार होने लगते ह, तो सरकार ऐसे निर्णय लेने लगती है जो उसके अपने परंपरागत मतदाताओं के पक्ष में होते हैं।

धार्मिक स्थलों की पवित्रता के नाम पर एक वर्ग के पूजागृह में पुलिस के प्रवेश को निषिद्ध करना, देश की अखण्डता के नाम पर कियी भाषा विशेष को आवश्यकता से अधिक महत्व देना, श्रीराममंदिर के स्थान पर बाबरी मस्जिद बनाने के मसले को राजनीतिक बनाना सरकार द्वारा अपनाई गई उस तुष्टीकरण की नीति के प्रमाण हैं, जो वोट की राजनीति को देश की राजनीति से अधिक महत्व देती हैं।

यही कारण है कि धर्म निरपेक्ष भारत में धर्मों के आधार पर कई आचार संहिताएं चल रही हैं। किसी धर्म के मानने वाले अपनी वेशभूषा में अस्त्र शस्त्र भी धारण कर सकते हैं, किसी धर्म के मानने वाले एक से अधिक विवाह कर सकते हैं, किसी धर्म के मानने वाले अपनी शिक्षण संस्थाओं को अपनी नीतियों के हिसाब से चला सकते हैं। इन परिस्थितियों में एक देश में समस्त नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होने वाली संहिता का प्रश्न ही नहीं उठता।

समानता के अभाव में एकता की कल्पना करना बेबुनियाद है। अनेकता का सिद्धान्त सांप्रदायिकता को बढ़ावा देता है और सांप्रदायिकतावाद सरकार को परोक्ष रूप से लाभदायक प्रतीत होता है। नतीजतन कई निर्णय भारत के समस्त नागरिकों और सम्पूर्ण राष्ट्र को ध्यान में पखकर नहीं लिए जाते, जिनके परिणाम वर्षों से भयंकर समस्याओं के रूप में हमारे सामने मुंह बाए खड़े हैं ओर इनका प्रभाव दिन प्रतिदिन अधिक विकराल होता चला जा रहा है।

कुल मिलाकर इस सांप्रदायिकतावाद ने हमारे देश की एकता और उन्नति पर बहुत बुरा असर डाला है। सांप्रदायिकतावाद का विष भारतीयता के लिए काफी घातक सिद्ध हो रहा है। यदा कदा यही विष भारतीयों को अजनबी, नागरिकों को सांप्रदायिक और मनुष्य को पशु बना देता है। क्रमशः

सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – एक:

rahasya 1सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – एक:

हिंदी की रहस्य और रोमांच से भरी सवाक् फिल्मों के अंतर्गत 1931 में अबुल हसन, 1932 में भूतिया महल व अलीबाबा चालीस चोर, 1933 में आब ए हयात व मायाजाल, 1934 मेंगुल सनोवर व तिलस्मी हीरा, 1935 में जादुई डण्डा व जादुई घोड़ा, 1938 में भेदी त्रिशूल, 1939 में सन आॅफ अलादीन व गुल ए बकावली, 1940 में अनार बाला व जादुई कंगन आदि अनेक फिल्में उल्लेखनीय हैं, जिन्हें काफी लोकप्रियता प्राप्त हुई।

1941 में जादुई बंधन, 1943 में भागता भूत, 1944 में जादुई किस्मत, 1945 में अलादीन, 1946 में अलीबाबा, अरेबियन नाइट्स, हूर ए बगदाद, मैजिक कैप व बगदाद का चोर, 1947 में बुलबुल ए ईरान, गुल ए बकावली, अंगूर बाला व जादुई रतन, 1948 में गैबी तलवार, जादुई चित्र, जादुई बंसरी व जादुई शहनाई, 1949 में अलादीन की बेटी, जादुई सिंदूर, भेदी बंगला, महल, तिलस्मी खंजर, माया महल आदि रहस्य-रोमांच से परिपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ।

1951 में नगीना, 1952 में बगदाद जलपरी, नीलम परी व पाताल भैरवी, 1953 में अलिफ लैला व गुल सनोवर, 1954 में लालपरी, मीनार व हूर ए अरब, 1955 में बगदाद का चोर व तातार का चोर, सन आॅफ अलीबाबा व चिराग ए चीन 1956 में अरब का सौदागर, बसरे की हूर, बगदाद का जादू व गुल ए बकावली, 1957 में माया नगरी व परिस्तान, 1958 में अलादीन का चिराग, पाताल पुरी, स्वर्ण सुंदरी, मधुमती व माया बाजार आदि फिल्में बनीं।

उक्त रहस्य रोमांच प्रधान फिल्मों के संदर्भ में श्री बी. एन. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘सवाक् भारतीय हिंदी फिल्म्स’ में लिखा है कि ‘‘ ऐसी फिल्में जो बनती आई हैं, उनमें वही घिसी पिटी शैली है – उड़ती दरी का दिखाया जाना, सिम सिम कहकर दरवाजों का खुलना, चिराग के घिसते ही विशालकाय जिन्न का प्रकट होना और कहना हू हा हा हा, मेरे आका! आदि। इससे कुछ परिष्कृत और सहज ग्राह्य रूप धार्मिक फिल्मों में दिखाया जाता है, जो फोटोग्राफी के चमत्कार का ही विकसित प्रमाण है।’’

‘‘जादुई और धार्मिक फिल्मों की फोटोग्राफी में थोड़ा सा अंतर प्रतीत होता है। जादुई फिल्मों में चमत्कार के साथ डरावनी आवाज तथा भयानक सैट दिल दहलाने वाले होतं हैं। धार्मिक फिल्मों में भगवान की असीम कृपा का चमत्कार बताया जाता है; जैसे – जल्दी जल्दी सब्जी का कटना, पकवानों का तैयार हो जाना, समुद्र में से भगवान का धरातल पर आना, आकाश मार्ग से भगवान का तथा देवी देवताओं का धरती पर प्रकट होना और संगीत की टिक टक टिक, खन खन खन ध्वनियों के साथ बारीक परंतु प्रिय आवाज का जो सामंजस्य दिया जाता है, वह निःसंदेह प्रशंसनीय ही कहा जाएगा। इसे ट्रिक फोटोग्राफी कहा गया है।’’ क्रमशः

गज़ल: हसीन साज़:

kyaगज़ल: हसीन साज़:

सबसे हसीन साज़ अनासिर का साज़ है
सबसे नफीस गीत खुदा की नमाज़ है

तारों की तरह अर्श के बन्दे हैं करोड़ों
सूरज की तरह एक वो बन्दानवाज़ है

हर आदमी मशगूल है रोटी की फिकर में
रोजी का इंतजाम यहाँ का रिवाज़ है

रोटी ने खड़े कर दिए बाजार और शहर
ईमान के झण्डे तले पैसों का राज है

खाने की पहनने की औ रहने की जंग में
हर हाथ में तलवार है हर सर पे ताज है

दुनिया को है पसन्द बहुत इश़्क.ए.मजाजी
हम को तो अपने इश़्क.ए.ह़कीकी पे नाज़ है

गीत: लैला:

lailaगीत: लैला:

मुख है त के लै नै
कूनै रे लाटा !
बाट हिटना हिटना यो
ऐ गै लुघाट

कै गौं मैं कै मौ मैं रूंछै
मजनु जस पच्छा पच्छा
किलै उंछै ?

बोट हिसालू भौत रिसालू
नजिक जाला काण बुड़ाला
काण बुड़ाला नक को मान्छ
दूद दिनी गोरु लात लै हान्छ

यो ई छ रीत
योई छ बियोहार
एस्सी कैं चलनौ
यो सारो संसार

तू कै दुणी मैं रूंछै
मजनु जस पच्छा पच्छा
किलै उंछै ?

लोकभाषा: विकास:

vikasलोकभाषा: विकास:

इसके अतिरिक्त यह भी स्मरणीय है कि बोली केवल वाचिक नहीं होती, उसमें कायिक संकेत भी सम्प्रेषण का कार्य करते हैं, जिन्हें वक्ता और श्रोता के व्यवहार द्वारा समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी बड़े का किसी छोटे को हाथ से पास बुलाने का इशारा करते हुए औ /औ ल केवल आदेश की ही अभिव्यक्ति नहीं करता, वरन् वक्ता और श्रोता के पारस्परिक सम्बन्धों की व्यंजना भी करता है। उक्त कथन की ध्वनियों की अनुतान से वक्ता का मनोभाव पहचाना जा सकता है या सम्प्रेषण का प्रभाव भी परखा जा सकता है। यदि उक्त वक्ता श्रोता पिता-पुत्र हंै तो सम्पूर्ण कथन से अधिकार की, मित्र हैं तो विनय की तथा शत्रु हैं तो चुनौती तक की अभिव्यंजना हो सकती है।

स्वर एवं घात की दृष्टि से कुमैयाँ पर्याप्त समृद्ध बोली है। घात से तात्पर्य ध्वनि की अधिकता से है, जिसके अभाव में उच्चारण शिथिल हो जाता है, कभी स्वर ह्रस्व हो जाते हैं या स्वरान्त व्यंजनान्त हो जाता है ; जैसेः हिन्दी का भगवान कुमैयाँ का भग्बान।

उल्लेखनीय है कि प्रत्येक बोली की निजी स्वनिम एवं रूपिम प्रक्रिया होती है, जिसे वक्ता मातृभाषा के रूप में शैशव में ही अर्जित कर लेता है। यदि उसे दूसरी भाषा से शब्द ग्रहण करने पड़ते हैं तो वह उन्हें यत्किंचित् उच्चारण भेद के साथ अपनी मातृभाषा के रंग में रंग लेता है। इस प्रकार बोली के विकास क्रम में त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया भी सम्पन्न होती रहती है। नवीनता के प्रभाववश प्राचीनता का क्षरण, प्रगति के लिए अभिनव का वरण और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए प्रवृत्तियों का अनुसरण चलता रहता हैै। क्रमशः