बोली और भाषा

boliboli

 बोली –

बोली किसी भाषा का एक ऐसा विशिष्ट रूप होता हैं, जो अपनी भाषा के एक निश्चित भू भाग में व्यवहृत होता है।

उच्चारण, व्याकरण या मुहावरों की दृष्टि से अपनी भाषा से आंशिक भिन्नता रखने के कारण बोली का स्वतंत्र रूप प्रकट होता है,

लेकिन यह अन्तर भाषा या उसकी अन्य बोलियों से इतना अधिक भी नहींं होता कि उसे अलग भाषा माना जा सके।

भाषा –

कोई बोली तभी तक बोली मानी जाती है, जब तक वह सामान्य जन की बोलचाल का माध्यम होने के साथ-साथ

अन्य सार्वजनिक कार्यों का माध्यम नहीं बनती। जब सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक या राजनीतिक कारणों से

कोई बोली अपने विस्तृत भू भाग के साहित्य एवम् शिक्षा जगत के साथ.-साथ शासन के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हो जाती है,

तो वह भाषा का दर्जा पाती है।

उपादेयता –

बोली जीवन का अंग होती है।

बोली परिवेश से अर्जित की जाती है।

बोली आत्मीयता की द्योतक होती है।

बोली व्यक्ति के समाजीकरण का माध्यम होती है।

बोली का प्रयोग अनौपचारिक सन्दर्भों में समाज का प्रत्येक व्यक्ति करता है।

बोली के माध्यम से विभिन्न वर्गों के लोग परस्पर विचार विनिमय कर लेते हैं।

बोली भाषासमाज को जोड़ती है ।

बोली से ही भाषा जन्म लेती है।

पेड़ लगाकर 

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हरा करो हर एक गाँव को पेड़ लगाकर
बढ़ जाने दो घनी छाँव को पेड़ लगाकर

सूने आसमान में बादल को न्यौता दो
रोको मिट्टी के कटाव को पेड़ लगाकर

धरती की छाती पर हुआ कुल्हाड़ी से जो
भरना होगा उसी घाव को पेड़ लगाकर

इस कुदरत के साथ बताते हो अरसे से
अब दिखलाओ उस लगाव को पेड़ लगाकर

बायोटेक्निकल

अपनी बोली

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दिन्य : बाय द वे, आपूंक जॉब कि भय ?

रम्य : बायोटेक्निकल इंजीनियर।

दिन्य : आँफिस कॉं भय ?

रम्य : सेल्फ इंप्लॉएड भयां हम। घरै मैं चंल्छ काम।

दिन्य : प्राेडक्ट कि भय ?

रम्य : न्यू जेनेरेशन ।

दिन्य : प्राेजेक्ट कि भय ?

रम्य : नानतिनाक ब्या हुन तक उनूंकि परवरिश।

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उत्तराखंड

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उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र अपने नैसर्गिक सौन्दर्य तथा भौगोलिक लावण्य के कारण अपने आप में विशिष्ट है.

अनेक पावन नदियों का यह उद्गम स्थल यक्ष-गन्धर्वों की लीलास्थली और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि के रूप में प्रख्यात है.

प्राचीन महाकाव्यों में यहाँ के अनेक स्थानों का वर्णन एक ओर इसके पौराणिक महत्त्व को प्रमाणित करता है,

तो दूसरी ओर अलग-अलग समय में यहाँ आकर रमने -बसने वालों का इतिहास इसके सांस्कृतिक परिवेश को आलोकित करता है.

किसी भी प्रदेश का सांस्कृतिक परिवेश उसे अन्य से भिन्न ही नहीं करता, विशिष्टता भी प्रदान करता है.

उत्तराखंड का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहाँ समय-समय पर अनेक जातियों का आगमन होता रहा है.

यही कारण है कि यहाँ की संस्कृति में समन्वय एवं सहिष्णुता के अद्भुत लक्षण विद्यमान हैं.

भौगोलिक दृष्टि से यह प्रदेश पौराणिक काल से ही दो भागों में विभक्त है –

पहला केदार खंड अर्थात गढ़वाल और दूसरा मानस खंड अर्थात कुमाऊँ.

मनोविनोद

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6 – पहेलियां :

पहेलियां मनोविनोद का सहज साधन मानी जाती हैं।
कुमाऊं में पहेलियां ‘आहण’ या ‘आण’ के नाम से जानी जाती हैं।
इन्हें भी कई वर्गों में रखा जाता है – भोज्य पदार्थ संबंधी,घरेलू वस्तु संबंधी,
जीव-जन्तु संबंधी, प्रकृति संबंधी, अंग-प्रत्यंग संबंधी, कृषि संबंधी आदि।

7 – बालगीत

कुमाउनी लोक साहित्य में बालगीतों का अपना अलग स्थान है।
संख्या की दृष्टि से अधिक न होते हुए भी ग्राम्य परिवेश में इनका प्रचलन बदस्तूर जारी है।
इनकी शब्दावली अर्थ की बजाय लय और तुक का अधिक अनुसरण करती है।
कुमाउनी में मुख्यत: दो प्रकार के बालगीत मिलते हैं – हिलोरी तथा खेल संबंधी।

8 – नवगीत

आजकल अलग-अलग म्यूजिक कंपनियों द्वारा बनाई जा रही कुमाउनी गीतों
की आँडियो कैसेट/सीडी/वीसीडी के लोक शैली में रचित गीत पर्याप्त प्रचलन में हैं।
इन्हें भी प्रेम संबंधी, विरह संबंधी, हास्य संबंधी, भक्ति संबंधी, बेरोजगारी संबंधी,,
फौज की नौकरी संबंधी आदि वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

कुमाउनी हिंदी

अपनी बोली

काली कुमाऊं की अपनी कुमैयाँ बोली में लिखने का यह इरादा आपको कैसा लगा ?
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kumauni

बोलचाल पर नहीं व्याकरण का पहरा
सीधी सादी बातों का मतलब गहरा

पहले ज्या होता होगा लेकिन अब तो
कहीं नहीं रह गई किशी की भी भैल्यू
पग पग पर जुगाड़ फिट करनी पड़ती है
तब जाकर के काम सपड़ता है दाज्यू

अंधा है जो आंख न देखे अर्जुन सी
कान नहीं सुनता जो कहलाता बहरा

उणपचास बब्बाल लग गए हैं पीछे
रोते हुए अजीब हंसाई आती है
टामा पिला दिया जाता है जहां तहां
खाने को चक्की पिसवाई जाती है

प्रचलित है जो हिंदी आज कुमाऊँ में
उसमें तैशा ही होने वाला ठहरा

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महत्व

कुमैयाँ

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सामाजिक सम्प्रेषण की दृष्टि से बोली को अधिक महत्व दिया जाता है,

क्योंकि किसी भी भाषासमाज में बोलने वाले लिखने वालों से ज्यादा होते हैंं।

किसी क्षेत्र विशेष की बोली ही कतिपय कारणों से सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करके भाषा रूप में स्वीकृत हो जाती है

अर्थात् बोली से ही भाषा का मानक रूप विकसित होता है।

राज भाषा –

किसी राज्य में सार्वजनिक तथा प्रशासनिक कार्यो के लिए प्रयुक्त विचार विनिमय का साधन राजभाषा कहलाता है ।

राज्य के समस्त शासनादेशों, अभिलेखों और पत्र – व्यवहार में उसी का प्रयोग किया जाता है ।

पराधीन राष्ट्र की राजभाषा उसकी राष्ट्रभाषा से भिन्न हो सकती है ।

भारत में मुगलों और अंग्रजोें के शासन काल मे क्रमशः फारसी और अंग्रेजी में राज काज होता रहा ।

राष्ट्रभाषा –

किसी राष्ट्र की परिनिष्ठित भाषाओं में से सार्वजनिक कार्यों के लिए व्यवहृत माध्यम को राष्ट्रभाषा कहा जाता है ।

यह राष्ट्र के विभिन्न भाषा भाषियों के विचार विनिमय…

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