लोकगीत

lokgit

‘लोक’ शब्द की परिधि में छोटी से छोटी बस्ती से लेकर बड़े से बड़े शहरों के वे लोग भी आते हैं,

जो किताबों से मिलने वाले शास्त्रीय ज्ञान से वंचित होने के बावजूद संवेदनशील तथा आस्थावान होते हैं.

इन लोगों के सुख-दुःख की अनुभूतियाँ ही लोकगीतों में प्रस्फुटित होती हैं

और मौखिक रूप से पुरानी पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को मिलने वाली यह विरासत

अपने भावपक्ष की सहजता के कारण जीवंत तथा मधुरता के कारण लोकप्रिय बनी रहती है.

कुमाउनी लोकगीतों को अलग-अलग जनपदों के गायकों या गिदारों द्वारा अलग- अलग

रूपों में गाते हुए सुनकर मुझे ऐसा लगा कि जिस प्रकार कबीर की रचनाओं को

उनके शिष्यों ने अपने-अपने इलाकों की भाषाओं का संस्पर्श प्रदान किया था,

उसी प्रकार कुमाऊँ के लोकगीतों अथवा संस्कार गीतों की शब्द संरचना व उच्चारण शैली भी

भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की बोलियों से प्रभावित हुई है.

स्वरूप

swarup
पशु-पक्षी संबंधी कथाएं

कुमाऊ की पशु-पक्षी संबंधी कथाएं पंचतंत्र की कथाओं के सदृश मानी जाती हैं,

क्योंकि इनमें स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ लोकशिक्षा का तत्व भी समाहित रहता है।

पशुओं की कथाओं में उनकी चतुराई अथवा मूर्खता से संबंधित कथाएं अधिक हैं।

पक्षियों से संबंधित कथाओं में कुमाऊं के लोकविश्वास भरे पड़े है।

भूत-प्रेत संबंधी कथाएं

इन कथाओं में लोकोत्तर शक्ति, अंधविश्वास, अतिरंजना, भय, वीरता आदि का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि अकाल मृत्यु के कारण कतिपय अतृप्त जीवात्माएं भूत-प्रेत या चुड़ैल बनकर

कभी किसी का अनिष्ट करती हैं, तो कभी किसी का भला भी करती हैं।

धर्म संबंधी कथाएं

इस वर्ग में धार्मिक आख्यानों , धार्मिक स्थानों , धार्मिक विभूतियों या लोकदेवताओं आदि से संबंधित कथाएं आती हैं।

इनके अंतर्गत जागेश्वर, बागेश्वर, बैजनाथ, चित्रशिला, नंदादेवी, गड़देवी, भीम, घटोत्कच आदि की कथाएं पर्याप्त प्रसिद्ध हैं।

इनमें कुछ कथाएं लोकगाथात्मक स्वरूप वाली भी हैं।

याद 

yaad

यो हा्व चलणै त कैकी याद ऊणै
उ बा्ति  जलणै त कैकी याद ऊंणै

यो ब्यालौ टैम ना्नि  है नानि  आहट
मकैं छलणै त कैकी याद ऊंणै

अन्या्र मैं घुण पसारि  बेर इन्तजारी
अब हा्त मलणै त कैकी याद ऊंणै

उज्या्ल लीबेर जरूरै आल सूरज
एक आ्स फलणै त कैकी याद ऊंणै

कुमाउनी 

 kumauni

भिन्नता – किसी पहाड. के इस तरफ और उस तरफ के ग्राम वासियों

या किसी नदी के इस पार और उस पार के निवासियों के बीच

सम्पर्क न हो पाने से भी बोलियों में अन्तर पनपता रहता है।

यदि अल्मोडा और पिथौरागढ. की तरह बीच में अनेक पहाड./नदियाँ हों,

तो दोनों स्थानों की बोलियों में पाई जानेवाली भिन्नता आश्चर्यजनक नहीं।

 

अंतर – 1900 ई० में रायबहादुर श्री गंगादत्त उप्रेती ने कुमाऊँ में प्रचलित

अधिकांश बोलियों के उदाहरणों की तुलना करके यह निष्कर्ष प्राप्त किया था

कि इन बोलियों में न केवल स्थानीय कारणों से वरन् जातीय तथा सामाजिक स्तरीय कारणों से भी अन्तर है।

जार्ज गियर्सन ने (भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण) में कुमाउनी के इतिहास तथा बोलियों पर सोदाहरण प्रकाश डाला है।

 

कुमाउनी – पूर्व में नेपाल, पश्चिचम में गढ.वाल, उत्तर में तिब्बत ओर दक्षिण में तराई भाबर

के उपजाऊ मैदानों के मध्य अवस्थित कुमाऊं के इतिहास को पलटने से ज्ञात होता है कि

इस भू भाग में किरात, मंगोल, खस , सूर्यवंशी कत्यूरी, चन्द्रवंशी चन्द, गोरखा ओर अंग्रेज आदि रहे।

इतिहास गवाह है कि राजनीतिक उथल- पुथल के कारण होने वाले

सांस्कृतिक एवं सामाजिक सम्पर्कों से भाषा भी प्रभावित होती हैं।

 

कां जान्नौहा

Konjanoha

आप्न खुट्ट मैं आफी
किलै बनकाटि हान्नौहा
छाडि़ छुडि़ बेर घरबार
यरौ तुम कां जान्नौहा

हंला कि खोरि फुटि
च्यूड़ भट्ट भुटि
दिन्नौहा कसि ढोक
लगैबेर अच्छत पिठ्यां

मासला भाण कुण
सिखला अवगुण
छाडि़ छुडि़ बेर इसकूल
खराब गिंज तान्नौहा

गोठ अड़ान्नो
बाच्छ खड़ान्नो
गोरू दिन्नौ एक तोप्पो्
तोप्पो् मंतर मौ जस हुंछ

एक्कै छिट्टै ले्
च्या से्त है जां
छाडि़ छुडि़ बेर एस तोप्पो्
बजारौ च्या खान्नौहा

नारिंगै दानी
आलु खुर्सानी
खूब हुनान फल फूल
अगर मिहनत करि संक्छा

हर बिभाग है
मदत मिलन्नै
छाडि़ छुडि़ बेर एसि ठौर
भाज्न अस्सल मान्नौहा

कुमाऊँ

kumaun

कुमाऊँ को प्रकृति सुन्दरी का क्रीड़ा प्रांगण कहा जाता है.

यहाँ का उच्च पर्वत शिखरों, हरी-भरी उपत्यकाओं, वनों-उपवनों, पादपों-लताओं,

निर्झरों-सरिताओं आदि के मध्य विविध प्रकार के सुमनों की गंध तथा अनेक भांति के

विहगों के कूजन से अनुप्राणित पर्यावरण किसका मन नहीं मोह लेता?

यहाँ की नैसर्गिक शोभा यहाँ के कर्मठ जीवन को सरलता प्रदान करती है

और यहाँ की प्राकृतिक सुषमा यहाँ के निवासियों के मन में सरसता का संचार करती है.

यही कारण है कि कुमाऊँ के मधुर लोकगीतों में अगर एक ओर श्रम से लथपथ जीवन का मार्मिक वर्णन है,

तो वहीँ दूसरी ओर प्रकृति से उल्लसित वातावरण का भी सम्यक चित्रण है,

जिस तरह संस्कृत साहित्य में प्रकृति के माध्यम से जन-गन-मन का सहज अंकन उपलब्ध होता है,

उसी तरह कुमाऊँ के लोकगीतों में भी प्रकृति मानव की चिर सहचरी के रूप में प्रतिष्ठित हुई है.