प्रकार

prakar

नीतिपरक कथाएं

कुमाऊं की नीतिपरक कथाएं विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से अपने श्रोताओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं।
इनमें अत्यंत रोचक विधि से सामाजिक मान्यताओं का वर्णन किया जाता है।
उपदेशात्मक होने के कारण ये अंततः आदर्श जीवन के लिए कोई न कोई संदेश अवश्य प्रदान करती हैं।

प्रकृतिपरक कथाएं

ये कथाएं कुमाऊं के पंचाचूली, त्रिशूल आदि पर्वतों ; काली, गोरी आदि नदियों ;
चीड़, देवदार आदि पेड़ों ; बुरांश, प्यौली आदि फूलों के अतिरिक्त अनेक पौधों, लताओं, झीलों, झरनों आदि
विविध प्राकृतिक उपादानों से संबंधित हैं। भाव प्रधान होने के कारण ये आसानी से दिल को छू लेती हैं।

व्रतपरक कथाएं

विश्वास से अनुप्राणति व्रत संबंधी कथाएं प्रायः अलग.अलग धार्मिक अनुष्ठानों,सामाजिक मान्यताओं,
देवी-देवताओं के माहात्म्य, त्योहारों के महत्व, पतिव्रता धर्म, सौभाग्य प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पारिवारिक सौहार्द्र, धन.समृद्धि की कामना, भक्ति की भावना, मन की आस्था, कर्मफल सिद्धांत आदि से संबंधित होती हैं।

नीन

neen

अब त रात मैं द्वी बखत पुलिस लगून्नै गस्त
हूटर वा्लि आवाज सुनि पब्लिक हैरै मस्त

पब्लिक हैरै मस्त फिकर अब के लै नाहन
जन सेवा मैं दौड़न्नौ सरकारी वाहन

म्यर पड़ाेस मैं रून्य सीनियर सिटिजन कूनीं
तीन बाज्य टुटि गै त गुरू फिर नीन नैं ऊनीं

कालान्तर

kalantar

जब एक भाषा परिवार के व्यक्ति (पर्वत, नदी, वन आदि भौगोलिक कारणों से) अलग अलग रहने लगते हैं

और लम्बे अरसे तक उनका परस्पर मिलन नहीं हो पाता है, तो उनकी भाषा में अन्तर आने लगता हैं,

जो कालान्तर में विशिष्ट हो जाता है। उच्चारण तथा संरचना की दृष्टि से कुमाउनी के अन्तर्गत

इतनी अधिक बोलियों के अस्तित्व में आने का एक कारण यह भी माना जाता है कि

भौगोलिक दृष्टि से कुमाऊँ का अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी और ऊबड. खाबड. है।

भाषिक संरचना तथा उच्चारण की दृष्टि से कुमाऊँ में अनेक बोलियाँ अस्तित्व में हैं।

भौगोलिक दृष्टि से भी पर्वतीय और उबड़ खाबड़ क्षेत्र में जैसे-जैसे दूरी बढ़ती जाती है,

बोलियों का अन्तर भी स्पष्ट होने लगता है। उदाहरण के लिए अल्मोड़ा की खसपर्जिया

और पिथौरागढ़ की सोर्याली का अन्तर देखा जा सकता है।

कुमाउनी भाषा क्षेत्र को प्रमुखत: दो भागो में विभाजित किया जाता है – पूर्वी और पश्चिमी ।

यह भी माना जाता है कि कुमाऊँ के पूर्वी क्षेत्र में पैशाची अपभ्रंश बोलने वाले

तथा पश्चिमी क्षेत्र में शौरसेनी अपभ्रंश बोलने वाले आकर बसे थे ।

यही कारण है कि पूर्वी कुमाऊं की बोलियों में पैशाची तथा पश्चिमी कुमाऊं की बोलियों पर

शौरसेनी का प्रभाव परिलक्षित होता है। इन दोनों उपभाषाओं के अन्तर्गत दस बोलियां मानी जाती हैं ।

पेड़

ped hain
आदमी की पुरानी खुशी पेड़ हैं
सच कहा जाए तो ज़िंदगी पेड़ हैं

यह दिलों का दिमागों का अहसास है
अनथकी सांस की ताजगी पेड़ हैं

जंगलों में बगीचों में या गाँव में
कुदरती हुस्न की सादगी पेड़ हैं

जो ख़ुदाई की ख़िदमत में मशगूल है
मुद्दतों से वही बन्दगी पेड़ हैं

गुरु

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गुरू ठा्ड़ छन गोबिंद संग कैक खुटा धरूं सीस
बलिहारी गुरूदेव की जिनल बतायो ईस

तीरथ जैबेर एक फल संत मिलन फल चार
संत गुरू मिलि भौत फल कूंछ कबीर बिचार

लोकगीत

lokgit

‘लोक’ शब्द की परिधि में छोटी से छोटी बस्ती से लेकर बड़े से बड़े शहरों के वे लोग भी आते हैं,

जो किताबों से मिलने वाले शास्त्रीय ज्ञान से वंचित होने के बावजूद संवेदनशील तथा आस्थावान होते हैं.

इन लोगों के सुख-दुःख की अनुभूतियाँ ही लोकगीतों में प्रस्फुटित होती हैं

और मौखिक रूप से पुरानी पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को मिलने वाली यह विरासत

अपने भावपक्ष की सहजता के कारण जीवंत तथा मधुरता के कारण लोकप्रिय बनी रहती है.

कुमाउनी लोकगीतों को अलग-अलग जनपदों के गायकों या गिदारों द्वारा अलग- अलग

रूपों में गाते हुए सुनकर मुझे ऐसा लगा कि जिस प्रकार कबीर की रचनाओं को

उनके शिष्यों ने अपने-अपने इलाकों की भाषाओं का संस्पर्श प्रदान किया था,

उसी प्रकार कुमाऊँ के लोकगीतों अथवा संस्कार गीतों की शब्द संरचना व उच्चारण शैली भी

भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की बोलियों से प्रभावित हुई है.

स्वरूप

swarup
पशु-पक्षी संबंधी कथाएं

कुमाऊ की पशु-पक्षी संबंधी कथाएं पंचतंत्र की कथाओं के सदृश मानी जाती हैं,

क्योंकि इनमें स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ लोकशिक्षा का तत्व भी समाहित रहता है।

पशुओं की कथाओं में उनकी चतुराई अथवा मूर्खता से संबंधित कथाएं अधिक हैं।

पक्षियों से संबंधित कथाओं में कुमाऊं के लोकविश्वास भरे पड़े है।

भूत-प्रेत संबंधी कथाएं

इन कथाओं में लोकोत्तर शक्ति, अंधविश्वास, अतिरंजना, भय, वीरता आदि का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि अकाल मृत्यु के कारण कतिपय अतृप्त जीवात्माएं भूत-प्रेत या चुड़ैल बनकर

कभी किसी का अनिष्ट करती हैं, तो कभी किसी का भला भी करती हैं।

धर्म संबंधी कथाएं

इस वर्ग में धार्मिक आख्यानों , धार्मिक स्थानों , धार्मिक विभूतियों या लोकदेवताओं आदि से संबंधित कथाएं आती हैं।

इनके अंतर्गत जागेश्वर, बागेश्वर, बैजनाथ, चित्रशिला, नंदादेवी, गड़देवी, भीम, घटोत्कच आदि की कथाएं पर्याप्त प्रसिद्ध हैं।

इनमें कुछ कथाएं लोकगाथात्मक स्वरूप वाली भी हैं।