कुमाऊँ

kumaun

कुमाऊँ को प्रकृति सुन्दरी का क्रीड़ा प्रांगण कहा जाता है.

यहाँ का उच्च पर्वत शिखरों, हरी-भरी उपत्यकाओं, वनों-उपवनों, पादपों-लताओं,

निर्झरों-सरिताओं आदि के मध्य विविध प्रकार के सुमनों की गंध तथा अनेक भांति के

विहगों के कूजन से अनुप्राणित पर्यावरण किसका मन नहीं मोह लेता?

यहाँ की नैसर्गिक शोभा यहाँ के कर्मठ जीवन को सरलता प्रदान करती है

और यहाँ की प्राकृतिक सुषमा यहाँ के निवासियों के मन में सरसता का संचार करती है.

यही कारण है कि कुमाऊँ के मधुर लोकगीतों में अगर एक ओर श्रम से लथपथ जीवन का मार्मिक वर्णन है,

तो वहीँ दूसरी ओर प्रकृति से उल्लसित वातावरण का भी सम्यक चित्रण है,

जिस तरह संस्कृत साहित्य में प्रकृति के माध्यम से जन-गन-मन का सहज अंकन उपलब्ध होता है,

उसी तरह कुमाऊँ के लोकगीतों में भी प्रकृति मानव की चिर सहचरी के रूप में प्रतिष्ठित हुई है.

 

लोककथाएं

kokkatha

भारत को विश्व कथासाहित्य का उद्गम होने का गौरव प्राप्त है।

प्राचीन काल से ही लोक कथाओं की व्यापक भावभूमि पर पुष्पित-पल्लवित वैदिक संहिताएं,

ब्राह्मणग्रंथ, उपनिषद, पुराण, वृहत्कथामंजरी, कथासरित्सागर, पंचतंत्र, हितोपदेश,जातक कथाएं,

बेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी आदि भारतीय कथा साहित्य के अमर कोष माने जाते हैं।

अन्य भाषाओं की तरह कुमाउनी में भी प्रचुर कथा साहित्य उपलब्ध होता है।

इसमें शिल्प की अपेक्षा कथ्य को अधिक महत्व दिया गया है और कथ्य में

जन गण मन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, राग-विराग, आशा-निराशा,

आस्था-अनास्था का यथार्थ वर्णन किया गया है।

इस कथासाहित्य के दो प्रकार हैं – लोककथा एवं लोकगाथा।

अ – लोककथा

लोक की भाषा में मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही कहानी लोककथा कहलाती है।

लोककथा में किसी घटना, चरित्र, समस्या आदि का मनोरंजक वर्णन होता है।

कुमाऊं में अनेक प्रकार की लोककथाएं प्रचलित हैं,

जिनका लोकसाहित्य के अध्येताओं ने कई प्रकार से वर्गीकरण किया है

गुणगान

bhajan

हे म्यर इष्टौ ! हे भगवान ! अगम अगोचर दयानिधान !
तुम छौ पालक हम संतान, को करि सकौं तुमर गुणगान

तुमरि कृपा ले यो जीवन छ, तुमरि दया ले तन मन धन छ
तुम सब्बौं का भाग्य विधाता, मीखन लै दी शुभ वरदान

भक्तौं की रक्षा खन औंछा, पापी जन लै पार लगौंछा
तुम सब्बौं का संकट मोचन, प्रभु म्यर लै कर दी कल्यान

बोली और भाषा

boliboli

 बोली –

बोली किसी भाषा का एक ऐसा विशिष्ट रूप होता हैं, जो अपनी भाषा के एक निश्चित भू भाग में व्यवहृत होता है।

उच्चारण, व्याकरण या मुहावरों की दृष्टि से अपनी भाषा से आंशिक भिन्नता रखने के कारण बोली का स्वतंत्र रूप प्रकट होता है,

लेकिन यह अन्तर भाषा या उसकी अन्य बोलियों से इतना अधिक भी नहींं होता कि उसे अलग भाषा माना जा सके।

भाषा –

कोई बोली तभी तक बोली मानी जाती है, जब तक वह सामान्य जन की बोलचाल का माध्यम होने के साथ-साथ

अन्य सार्वजनिक कार्यों का माध्यम नहीं बनती। जब सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक या राजनीतिक कारणों से

कोई बोली अपने विस्तृत भू भाग के साहित्य एवम् शिक्षा जगत के साथ.-साथ शासन के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हो जाती है,

तो वह भाषा का दर्जा पाती है।

उपादेयता –

बोली जीवन का अंग होती है।

बोली परिवेश से अर्जित की जाती है।

बोली आत्मीयता की द्योतक होती है।

बोली व्यक्ति के समाजीकरण का माध्यम होती है।

बोली का प्रयोग अनौपचारिक सन्दर्भों में समाज का प्रत्येक व्यक्ति करता है।

बोली के माध्यम से विभिन्न वर्गों के लोग परस्पर विचार विनिमय कर लेते हैं।

बोली भाषासमाज को जोड़ती है ।

बोली से ही भाषा जन्म लेती है।

पेड़ लगाकर 

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हरा करो हर एक गाँव को पेड़ लगाकर
बढ़ जाने दो घनी छाँव को पेड़ लगाकर

सूने आसमान में बादल को न्यौता दो
रोको मिट्टी के कटाव को पेड़ लगाकर

धरती की छाती पर हुआ कुल्हाड़ी से जो
भरना होगा उसी घाव को पेड़ लगाकर

इस कुदरत के साथ बताते हो अरसे से
अब दिखलाओ उस लगाव को पेड़ लगाकर

बायोटेक्निकल

अपनी बोली

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दिन्य : बाय द वे, आपूंक जॉब कि भय ?

रम्य : बायोटेक्निकल इंजीनियर।

दिन्य : आँफिस कॉं भय ?

रम्य : सेल्फ इंप्लॉएड भयां हम। घरै मैं चंल्छ काम।

दिन्य : प्राेडक्ट कि भय ?

रम्य : न्यू जेनेरेशन ।

दिन्य : प्राेजेक्ट कि भय ?

रम्य : नानतिनाक ब्या हुन तक उनूंकि परवरिश।

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उत्तराखंड

uttarakhand

उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र अपने नैसर्गिक सौन्दर्य तथा भौगोलिक लावण्य के कारण अपने आप में विशिष्ट है.

अनेक पावन नदियों का यह उद्गम स्थल यक्ष-गन्धर्वों की लीलास्थली और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि के रूप में प्रख्यात है.

प्राचीन महाकाव्यों में यहाँ के अनेक स्थानों का वर्णन एक ओर इसके पौराणिक महत्त्व को प्रमाणित करता है,

तो दूसरी ओर अलग-अलग समय में यहाँ आकर रमने -बसने वालों का इतिहास इसके सांस्कृतिक परिवेश को आलोकित करता है.

किसी भी प्रदेश का सांस्कृतिक परिवेश उसे अन्य से भिन्न ही नहीं करता, विशिष्टता भी प्रदान करता है.

उत्तराखंड का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहाँ समय-समय पर अनेक जातियों का आगमन होता रहा है.

यही कारण है कि यहाँ की संस्कृति में समन्वय एवं सहिष्णुता के अद्भुत लक्षण विद्यमान हैं.

भौगोलिक दृष्टि से यह प्रदेश पौराणिक काल से ही दो भागों में विभक्त है –

पहला केदार खंड अर्थात गढ़वाल और दूसरा मानस खंड अर्थात कुमाऊँ.