हास्य

miss

फस्क :

रम्य : क्वे ऐ रौछ्यो कि ?
दिन्य : मिस कौल ऐ रैछि।
रम्य : (कौल सैबै चेलि होलि) …. कसि छि ?
दिन्य : बांकि लंबि त नै छि।
रम्य : कि कौ त्वीले ?
दिन्य : मि कि कूंनूं … म्यर के कून तक त …
रम्य : के बात नै। अब आलि त च्या पेवे दिए।

ग़ज़ल

pedon

पेड़ाें की गजलें :

साँसों को महकातीं पेड़ाें की गजलें
सोए भाव जगातीं पेड़ाें की गजलें

कुदरत और आदमी के सम्बन्धों की
हर अहमियत बतातीं पेड़ाें की गजलें

जीव-जन्तुओं औ जंगल के रिश्ते का
हर  एहसास करातीं पेड़ाें की गजलें

कभी डराकर कभी डांटकर लोगों को
बहलातीं-समझातीं पेड़ाें की गजलें

लोकसाहित्य :

lok

लोकसाहित्य चिरजीवी होता है,

अत: सदियों तक जन मानस पर उसका प्रभाव परिलक्षित होता है।

मन के भावानुभावों से ओतप्राेत लोकगीतों का आकर्षण

और चारित्रिक विशेषताओं से ऊर्जस्वित लोकगाथाओं का रोमांच

अपनी मौलिकता के कारण दीर्घावधि तक

मौखिक परंपरा में जीवंत बना रहता है।

1 – लोकगीत

lok

लोकगीतों की दृष्टि से कुमाउनी लोकसाहित्य पर्याप्त समृद्ध है।

इनके अंतर्गत धार्मिक एवं मांगलिक कार्याें से संबद्ध संस्कार गीत, नृत्य प्रधान गीत,

अनुभूति प्रधान गीत, तर्क प्रधान गीत, संवाद प्रधान गीत, कृषि गीत, ॠतु गीत,

देवी-देवताओं के गीत तथा व्रत-त्योहारों के गीत आते हैं।

2 – कथागीत

कथागीत गेय होते हुए भी आख्यानपरक होने के कारण

लोकगीतों से भिन्न होते हैं। ये उनकी अपेक्षा लम्बे होते हैं

और इनमें किसी ऐतिहासिक, पौराणिक अथवा सामाजिक घटना का वर्णन होता है।

इनके भी कई प्रकार पाए जाते हैं; जैसे – संस्कार संबंधी, कृषि संबंधी, ॠतु संबंधी, शौर्य संबंधी आदि।

लोकभारती

bhasha

भाषा :

भारत का प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद में उपलब्ध होता है.
ऋग्वेद की भाषा ही आर्यों के धार्मिक अनुष्ठानों की भाषा थी.
इस भाषा को वैदिक संस्कृत कहा जाता है.
उच्चारण की दृष्टि से वैदिक संस्कृत की ध्वनियाँ बहुत क्लिष्ट थीं
और व्याकरण की दृष्टि से भी इसके रूप पर्याप्त संश्लिष्ट थे,
परन्तु समय बीतने के साथ साथ इसके उच्चारण और व्याकरण में
परिवर्तन के लक्षण दिखाई देने लगे.

अनार्यों तथा अन्य भाषा भाषियों के साथ पारस्परिक सहयोग
और व्यावहारिक सम्बन्ध स्थापित होने के परिणामस्वरूप
जब वैदिक संस्कृत की संरचना में शिथिलता आने लगी,
तब क्षेत्रीय प्रभावों के कारण इसके विविध रूप विकसित होने लगे.
परिवर्तन के इस क्रम में वैदिक संस्कृत के उपरान्त
लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत व अपभ्रंश से
आधुनिक भारतीय भाषाओं का उद्भव हुआ.

प्राणायाम :

pranayam

जब पेड़ दिल खोल के
प्राणायाम करते हैं
तब उनके कांटों में भी
नरम नरम
कोंपलें उग आती हैं

जो धीरे धीरे
खतरनाक नोकों को
मासूम टहनियों में
तब्दील करने का
जबरदस्त माद्दा रखती हैं

दर्द

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वे लोग
किसी कट चुके पेड़ की जगह पर
एक सूनापन या अभाव सा
महसूस करते हैं

जिन्होंने उसे
सावन में निहारा था
पतझड़ में बुहारा था
या उसकी छाया में बैठे थे
या डालों पर झूले थे

मगर जिन्होंने
उसे भोगा ही नही
वे उसके कट जाने
या टुकड़ाें में बंट जाने का
दर्द क्या जानें ?

मेरे बारे में

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डॉ0 हरिश्चन्द्र पाठक

1. शिक्षा : एम.ए. – हिन्दी (1967) डी.फिल्.-भाषाविज्ञान (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

2. अध्यापन : तीस वर्ष – राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय – उत्तरकाशी /ॠषिकेश /लोहाघाट /पिथौरागढ़ /हल्द्वानी (उत्तराखण्ड)

3. प्रशासन : तीन वर्ष – प्राचार्य – राजकीय महाविद्यालय,देवप्रयाग; टिहरी गढ़वाल – उत्तराखण्ड

4. साहित्य सृजन : गीत, गज़ल, कविता, कहानी, लेख आदि लगभग तीन सौ रचनाएं हिंदी पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित/आकाशवाणी से प्रसारित

5. पुस्तक लेखन : क – हिन्दी भाषा : इतिहास और संरचना / ख – हिन्दी भाषा : व्याकरण एवं निबन्ध / ग – ‘आदमी और पेड़’ – गज़ल संग्रह
घ – ‘जुबां पे छलका दर्द’ –   गज़ल संग्रह

6. लघुशोध : कुमाउनी तथा मनिहारी बोली का अध्ययन (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)

7. शोध पत्र : दस – विभिन्न राष्ट्रीय संगोष्ठी

8. शोध निर्देशन : पांच – कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल

9. सीनियर फैलोशिप : कुमाउं के लोकगीत (2007-2009) संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार

10. पता : डा0 हरिश्चन्द्र पाठक , सेवानिवृत्त प्राचार्य, मधुधाम, प्रेमनगर, लोहाघाट-262524 (उत्तराखण्ड)

विकास

विकास के नाम पर
आगे बढ़ते चले जाने की होड़ में
आदमी ने अगर काफी कुछ जोड़ा है
तो बहुत कुछ तोड़ा भी है।

इस जोड़-तोड़ में
आदमी और आदमी
के अलावा आदमी और पेड़ के
पुश्तैनी रिश्ते खराब हुए हैं।

रिश्तों में कोई उतना ही महत्व पाता है,
जितना वो काम आता है,
पर स्वार्थ के कारण हम उनके
हालात को अनदेखा करने लगते हैं।

आज पेड़ आदमी का एक ऐसा ही
रिश्तेदार बनकर रह गया है –
स्वार्थ से पीडि़त व स्नेह से वंचित।
उस बेजुबान की तकलीफ का …

दर्द जब-जब जुबाँ पे छलका है

यूँ लगा सिलसिला गजल का है
Aadmi_Aur_Ped

आदमी और पेड़ :

A&P

आदमी और पेड़ का
पुराने जमाने से संग साथ रहा है।
उस समय जब सभ्यता और संस्कृति
के अंकुर पल्लवित नहीं हो पाए थे,
प्रकृति का अपरंपार वैभव ही
मानव जीवन का आधार था।

हालांकि धीरे धीरे – मगर
पेड़ से जमीन, जंगल से बस्ती,
बस्ती से गांव, गांव से कस्बे,
कस्बे से शहर और शहर से महानगर
तक पहुंचे हुए तथा स्मार्टसिटी उन्मुख
मानव का प्रकृति प्रेम कभी कम नहीं हुआ।

मौजूदा हालात में भी बगीचों, पार्कों,
आंगनों, क्यारियों, गमलों, डिब्बों,
चित्रों और गीतों में प्रकृति
की छटा को समेट लेने का प्रयास
हमारे तह ए दिल में दुबके
उसी रिश्ते को प्रमाणित करता है।

ये ऊँचे ऊँचे देवदार

devdar

देवदार

वीरान पहाड़ाें की बहार
ये ऊँचे ऊँचे देवदार

फौजी जवान से खड़े हुए
ये कदम जमाकर अड़े हुए
इनकी टोपी है नोकदार
ये ऊँचे ऊँचे देवदार

ये शामों को रंगीन करें
जब इनमें से होकर गुजरें
सूरज की किरनें आर पार
ये ऊँचे ऊँचे देवदार