भजन: ओ मैया:

o maiyaभजन: ओ मैया:

हे दुख हरन्या मंगल करन्या
भाग्य विधाता छै तू माता

मातेश्वरि सब्बै जाग हैरै
तेरी जय जयकार ओ मैया
वन्दन कर स्वीकार

सब्बौ को शुभचिंतन करन्या
भक्त जनौं का संकट हरन्या

म्यर ख्वर मैं हाथ राख दे मैया
एत्ती कर उपकार ओ मैया
कर म्यर लै उद्धार

भौसागर छ दुखौ को सागर
जब हैगो यो सत्य उजागर

तू ई छै मेरि ताकत मैया
तू ई छै पतवार ओ मैया
कर दे नैया पार

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 12

lakshya a 12लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 12

हिंदी रूपांतर

(तू) गौरवास्पद वंश का होगा,
तो शरीर में स्फुरित होगा।
देवता! (तू) गौरवास्पद वंश का होगा

तो अवतरण होगा।
देवता! तेरे लिए (ही)
मैंने मुरली बजाई (है)।

मुरली के शब्दों के साथ,
उध्र्वलोक में आ जा।
देवता (तू) ऊध्र्वलोक में आ जाएगा

(तो तेरी) भक्ति करेंगे।
पाँच पाण्डवों के भारत सुनायेंगे।
(तुम) हरिद्वार में, भागीरथी में नहा कर आना।

आते-आते देवता ने अवतार ले लिया।
देवता ने अवतार लिया, नरक से
(उसका) उद्धार हो गया।

सिनेमा: सवाक् सामाजिक 01

savaak 01सिनेमा: सवाक् सामाजिक 01

जहां तक समाज प्रधान फिल्मों का प्रश्न है 1932 में माधुरी, सुबह का तारा; 1933 में दोरंगी दुनिया, 1934 में शहर का जादू, धर्मात्मा; 1935 में काॅलेज गर्ल, जीवन नाटक, धूप छांव; 1936 में छाया, विलेज गर्ल, सुनहरा संसार; 1937 में इज्जत, बेगुनाह, दौलत, दुखियारी, माॅडर्न लेडी; 1938 में समाज पतन, ब्रह्मचारी, भाभी, दूल्हा, जेलर; 1939 में दुश्मन, खानदान, ब्राण्डी की बोतल; 1940 में दिवाली, जिंदगी, भरोसा, संस्कार, कन्यादान, कैदी, बंधन और हार-जीत नामक फिल्मों का बोलबाला रहा।

इसके बाद 1941 में राधिका, शारदा, कुवांरा बाप, डाॅक्टर; 1943 में पापी, फैरूान, कानून, काशीनाथ, भलाई, पगली, नादान; 1944 में पत्थरों का सौदागर, तकदीर, वापस, ललकार, लाल हवेली, लेडी डाॅक्टर, माय सिस्टर; 1945 में डाॅक्टर संन्यासी, जिद, ज्वार भाटा, छलिया, दोस्त, फूल; 1946 में शालीमार, शतरंज, कीमत, दोस्ती, अपराधी, धरती के लाल; 1947 में अंधों की दुनिया, दुनिया एक सराय, एक्स्ट्रा गर्ल, मिट्टी, शराबी, शाहकार, शहनाई, रिवाज; 1948 में एक्ट्रेस, अदालत, अंधों का सहारा, बंजारे, लखपति, हीरा, सोने की चिड़िया, लालच; 1959 में मंदिर, जोकर, पारस, शायर, नेकी और बदी, हंसते आंसू; 1950 में दहेज, बावरा, निर्दोष, संग्राम, वफादार, सिगार, नीली भंवर और मशाल आदि समाज प्रधान फिल्में बनीं।

1951 में बहार, बाजी, बुजदिल, नगीना, मदहोश, आशा, हलचल, हंगामा, मिस्टर संपत; 1952 में जलजला, संगदिल, रत्नदीप, आसमान, आशियाना, दो राह, दाग, आंधियां; 1953 में मालकिन, औरत, तीन बत्ती चार रास्ता, नास्तिक, नया सफर, शिकस्त, आकाश, बावला, लड़की; 1954 में अधिकार, लकीरें, मस्ताना, नौकरी, समाज,बराती, नागिन, सबसे बड़ा रुपैया, सौ का नोट; 1955 में पापी, घर घर में दीवाली, मिलाप, नाता, अमानत, बन्दिश, बाप रे बाप, चार पैसे, दुनिया गोल है आदि काफी लोकप्रिय हुईं।

1956 में जिंदगी, एक ही रास्ता, बसंत पंचमी, फण्टूश, आस्तिक, जल्लाद, आवाज, देवता, हम सब चोर हैं; 1957 में पेइंग गेस्ट, कठपुतली, पैसा, आदमी, देख कबीरा रोया, आधी रोटी, अभिमान, सोने की चिड़िया; 1958 में नास्तिक, समुंदर, मिस्टर कार्टून एम. ए., अदालत, चंदन, खजांची, काला पानी, परवरिश, आखरी दांव; 1959 में फासला, बैंक मैनेजर, धूल का फूल, सट्टा बाजार, चालीस दिन, आंगन, दीप जलता रहे, मधु तथा 1960 में बनीं काला आदमी, कानून, बेवकूफ, अपना हाथ जगन्नाथ, घूंघट, शादी, परख आदि फिल्में प्रमुख थीं। क्रमशः

लोकभाषा: द्वयर्थक शब्द 2

dvayarthak 2लोकभाषा: द्वयर्थक शब्द 2

नंग : नग्न / नाखून
पड़ : सोना / पढ़ना
पुज : पूजा / पहुँच
बार : दिवस / बारह/ दफा
बीस : विष / बिसि (टवेंटी)
बोट : पेड़ / मत (वोट)
भाग : भाग्य / हिस्सा
भेट : उपहार / मिलन
भौ : शिशु / हुआ (भूतकालिक क्रिया)
मस्त : मदोन्मत / प्रचुर
माल : सम्पदा / तराई-भाबर (मैदानी भाग)
मौ : शहद / परिवार
राज : राज्य / मिस्त्राी / रहस्य
रुख : वृक्ष / रूखा
साँस : सन्ध्या / श्वास
हार : पंक्ति / पराजय/ माला

प्रत्येक जीवन्त बोली अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में सम्पर्कशील
भाषाओं के तत्वों को ग्रहण ही नहीं करती, आत्मसात् भी करती
चलती है। सुरम्य प्रकृति और कठोर जीवन की खट्टी-मीठी अनुभूतियों
से अनुप्राणित कुमैयाँ शब्द सम्पदा की दृष्टि से एक समृद्ध बोली है।

इस बोली ने अनेक स्रोतों से आगत शब्दों को अपने स्वनिमों एवं
रूपिमों के अनुकूल इस प्रकार पचा लिया है, कि वे पराए नहीं
लगते। कहा भी गया है कि इस जगत में कोई ऐसी मानवीय
संकल्पना नहीं जो शब्द के बिना संभव हो। हमारी समस्त अनुभूतियाँ
एवं तज्जन्य ज्ञान केवल भाषिक माध्यमों से ही व्यक्त होता है।

विशेष: राष्ट्रीय एकता:

rashtriy ektaविशेष: राष्ट्रीय एकता:

भारत एक विशाल राष्ट्र है, जिसमें विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग एक साथ रहते हैं। उनके खान-पान, आचार-व्यवहार तथा वेश-भूषा में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है, जो सिर्फ बाहरी है। वास्तविकता यह है कि हमारे देश में दिखाई देने वाली अनेकताओं के अंदर एकता की एम शाश्वत धारा चिरकाल सक प्रवहमान है, जो तथाकथित विभिन्नताओं को अभिन्न बनाए हुए है। देश के चार भागों में विद्यमान चार धाम; प्राचीन वाड्.मय के महान ग्रंथ; राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर की सम्यक् मान्यता और गंगा, यमुना, कावेरी या ब्रह्मपुत्र नदियों की समान पवित्रता आदि ऐसी कई बातें हैं, जो संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधती हैं।

शास्त्रीय दृष्टि से किसी राष्ट्र के तीन अनिवार्य तत्व माने जाते हैं – जन, भूमि और संस्कृति। इन तीनों की एकता की भावना से ही राष्ट्रीय एकता की भावना समृद्ध होती है, जो राष्ट्रीय पर्वाें, सामाजिक त्योहारों व पारिवारिक संस्कारों में एक ही रूप में परिलक्षित होती है। एकता का यही रूप प्रत्येक राष्ट्रवासी के मन में इस धारणा का पोषण करता है कि भले ही हम भिन्न भिन्न प्रकार की वेशभूषा धारण करते हों, भले ही हमारे मजहब अलग अलग हों, लेकिन हम सब एक ही भारतमाता की संतान हैं और उसकी रक्षा के लिए अपना तन-मन-धन न्योछावर कर सकते हैं। इस भावना को मुखरित करने के लिए परस्पर जुड़ने का सबल माध्यम है भाषा।

प्राचीन काल में अश्वमेध यज्ञ और दिग्विजय अभियान, सम्राट और साम्राज्य जैसे शब्द इस तथ्य के प्रमाण हैं कि यह विशाल राष्ट्र भारतीय राष्ट्रीय एकता के लिए काफी पहले से प्रयासशील रहा है। आर्याें और अनार्यों की एकता से लेकर हिंदुओं और मुस्लिमों की एकता तक के प्रयासों में भी राष्ट्रीय एकता की भावना ही सक्रिय है। हिंदुओं की होली में मुसलमानों का शरीक होना और मुसलमानों की हिंदुओं का सम्मिलित होना भी इसी दिशा में उठाए जाने वाले उदार कदम रहे हैं। कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर के अनुसार -‘‘भारत की चिरकाल से यही चेष्टा देखी जाती है कि वह अनेकता में एकता स्थापित करना चाहता है, वह बहुत के बीच किसी एक को उपलब्ध करना चाहता है।’’ क्रमशः

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 8

 

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 8lakshya a 8

हिंदी रूपांतर

न जाने किस राजा का बाण
लक्ष्य पर लगेगा।
या तो मैंने
आँख की कानी होना होगा।
या मैंने,
पैरों की लंगड़ी होना होगा।

लली द्रोपदी
ढुल-ढुल रोने लगी।
सयानी स्त्रियाँ
समझाने लगीं।
बेटी! लली द्रोपदी सुनो-

लड़की को
दूसरे के घर ही जाना है।
चलो बहिन,
अब चलते हैं यज्ञशाल में।
लली द्रोपदी चलने लगी।

राजकुमार देखते रहे।
चकोर जिस प्रकार
चाँदनी को देखते हैं,
वैसे ही
देखते रहे राजकुमार। क्रमशः

सिनेमा: स्वातंत्र्योत्तर:

svatantyottarसिनेमा: स्वातंत्र्योत्तर:

आजादी मिलने के बाद 1948 में बनी आजादी की राह पर, आजाद हिंदुस्तान, देशसेवा,
जयहिंद, शहीद, हम भी इंसान हैं, गुलामी; 1949 में बनी अपना देश, मातृभूमि, लाहौर,
गरीबी, परिवर्तन, उद्धार, जीत, अन्याय; 1950 में बनी गेटवे आॅफ इंडिया, अफसर,
मशाल, हिंदुस्तान हमारा है, पहला आदमी, कश्मीर हमारा है तथा समाधि नामक फिल्मों
को राजनीतिक वर्ग के अंतर्गत रखा जा सकता है। समाधि के विषय में श्री महेंद्र मित्तल जी
ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय चलचित्र’ में लिखा है कि यह ‘‘नेताजी की आजाद हिंद फौज
के कार्यों से संबंधित एक काल्पनिक कथा पर आधारित एक प्रणय कथा चित्र मात्र था, किंतु
इसका पटकथा शिल्प सुंदर था। देशभक्ति की भावना का चित्रण इसमें सुंदर था।’’

स्वतंत्र भारत में निर्मित राजनीतिक फिल्मों में कश्मीर, आंदोलन, हम लोग, आवारा, दीदार –
1951; आनंदमठ, अन्नदाता, राही – 1952; गोलकुंडा का कैदी, नया रास्ता – 1953; वतन,
मुन्ना, बूट पाॅलिश, जागृति – 1954; हमारा वतन, इंकलाब, दो आंखें बारह हाथ – 1956;
अब दिल्ली दूर नहीं, परदेसी, मदर इंडिया, दो रोटी, नया दौर, मुसाफिर, हम पंछी एक
डाल के – 1957; नया पैसा, साधना, फरिश्ता, कल क्या होगा, तलाक, फिर सुबह होगी –
1958; हमारा घर, इंसान जाग उठा, कल हमारा है, हीरा मोती – 1959; शान ए हिंद,
रिक्शा वाला, एक के बाद एक, जिस देश में गंगा बहती है – 1960 प्रमुख मानी जाती हैं।
इन फिल्मों में से कई में समाजवाद के तत्व भी परिलक्षित होते हैं।

श्री बी. एन. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘सवाक् भारतीय हिंदी फिल्म्स’ में लिखा है कि ‘‘ अब
दिल्ली दूर नहीं – में भी समाज में व्याप्त धोखाधड़ी, झूठे इल्जाम का चित्रण है, परंतु साथ ही
यह भी बताया गया है कि जब बेगुनाह की कोई नहीं सुनता तो उसके लिए दिल्ली के दरवाजे
खुले रहते हैं, बस पहुंचने वाले की देर है, न्याय अवश्य मिलता है। फिल्म में बताया गया है कि
तत्कालीन प्रधानमंत्री बच्चों के चाचा नेहरू मासूम बच्चों और उनके माता पिता की पुकार को अवश्य
सुनते थे और उन्हें न्याय मिलता था। यही भारतीय राजनीति का गौरव कहा गया है।’’ क्रमशः