गजल: जो:

 

joगजल: जो:

कौन हैं ग़म के अंधेरे को
मिटा देते हैं जो
धड़कनों में मकसदों की लौ
लगा देते हैं जो

ज़िंदगी में कीमती हैं
सिर्फ वो लम्हे जनाब
नेक औ उम्दा ख़यालों को
जगा देते हैं जो

चार दिन के बाद
पछताते हैं अपने हाल पर
काट करके पेड़
खुद को ही दगा देते हैं जो

जो सज़ा देते हैं
उनसे भी बड़े हैं लोग वो
आदमी को प्यार से
समझा बुझा देते हैं जो

गजल: सिलसिले:

 

silsileगजल: सिलसिले:

जिंदगी के सिलसिले
कुछ इस तरह के हो गए
मुस्कराना चाहते थे
पर अचानक रो गए

गांव के जंगल में चाहा था
खुशी के गुल खिलें
वक्त के जो दौर आए
ग़म के कांटे बो गए

आदमी के खूबसूरत
दिल की तस्वीरों के रंग
रोजमर्रा की जरूरत के
तकाजे धो गए

वाकई रंगीन है
दिलकश जवानी का सफ़र
पर सभी बूढे़ हुए
इस रास्ते से जो गए

गजल: कब हुआ है:

 

kab huaगजल: कब हुआ है:

दर्द ए दिल दर्जा ए आला
कब हुआ है
आदमी का ग़म निराला
कब हुआ है

कट रहे हैं
मुद्दतों से पेड़ पौधे
जंगलों में चाबी ताला
कब हुआ है

सो रहे जो तानकर
आलस की चादर
उनके आंगन में उजाला
कब हुआ है

जिंदगी में
लाख हेराफेरियां हैं
मौत में गड़बड़घोटाला
कब हुआ है

गजल: रहे हैं:

rahe hain

गजल: रहे हैं:

उस पार रहे हैं
कभी इस पार रहे हैं
उम्मीद के तालाब में
झक मार रहे हैं

ना जीत रहे हैं
न कभी हार रहे हैं
बदले हुए हालात को
पुचकार रहे हैं

दुतकार रहे हैं
उन्हें धिक्कार रहे हैं
पेड़ों के मामले में
जो गद्दार रहे हैं

बेकार रहे हैं
भले लाचार रहे हैं
फिर भी खुशी के आने के
आसार रहे हैं

गजल: पेड़ की कीमत:

ped ki kimat

गजल: पेड़ की कीमत:

गुलाम जिंदगी आजाद जो हो जाती है
ज़्र्रे ज़र्रे में नई बात नज़र आती है

नए माहौल नए जोश नए मौसम में
बहार खुशबुओं की बंसरी बजाती है

मगर जो पेड़ की कीमत नहीं समझते हैं
उनकी हर भूल उन्हें बेवजह रुलाती है

दबोचता है अंधेरा वो रोशनी अक्सर
जो शाम होते ही रंगों में बिखर जाती है

मगर जो पेड़ की कीमत नहीं समझते हैं
उनकी हर भूल उन्हें बेवजह रुलाती है

गजल: आदमी:

गजल: आदमी:

अपनी जुबां से जब भी मुकरता है आदमी
जीते हुए भी उस घड़ी मरता है आदमी

यह जानते हुए भी कि हर चीज है फ़ानी
अपने ही उसूलों से उतरता है आदमी

पेड़ों की जगह बन गए सीमेंट के जंगल
मतलब के लिए क्या नहीं करता है आदमी

जंगल में जानवर लगा करते हैं खतरनाक
शहरों में आदमी से भी डरता है आदमी

गजल: लगता है:

गजल: लगता है:

कहीं भी जाइए ग़म आसपास लगता है
कोई भी आदमी अक्सर उदास लगता है

काट के पेड़ इमारत की नुमाइष करना
षुरू षुरू में तो वैभव विलास लगता है

फिर नई और कई बीमारियां उगती हैं तो
हुजूम दर्द का हर वक्त पास लगता है

जाने क्या बात है जाने क्या वजह है यारो
खुल के रोना भी कभी अट्टहास लगता है

गजल: शायद:


गजल: शायद:

जान बेदाम हो गई शायद
खासियत आम हो गई शायद

दिल के रोने पे हंसी आती है
चोट आराम हो गई शायद

आज फिर दर्द ने करवट ली है
गांव में षाम हो गई शायद

चंद पेड़ों के साथ जंगल में
सांस नीलाम हो गई शायद


गजल: जो :

गजल: जो :

कौन हैं गम के अंध्रेरे को भगा देते हैं जो
धड़कनों में मकसदों की लौ लगा देते हैं जो

जि़न्दगी में कीमती हैं सिर्फ वो लम्हे जनाब
नेक औ उम्दा खयालों को जगा देते हैं जो

चार दिन के बाद पछताते हैं अपने हाल पर
बोल कर के झूठ अपनों को दगा देते हैं जो

जो सजा देते हैं उनसे भी बड़े हैं लोग वो

आदमी को प्यार से समझा-बुझा देते हैं जो

गजल: डर:

गजल: डर:

जिंदगी में बड़ी उदासी है
दर्द ताजा है चोट बासी है

आहटें धड़कनें बढ़ाती है
क्या बताएं वजह जरा सी है

शाम की झील के किनारे पर
तीरगी रोशनी की प्यासी है

जंगलों को है आदमी का डर
उसकी हर आरजू सियासी है