गजल: किसलिए:

 

kisliyeगजल: किसलिए:

किसलिए प्यार में सताया गया
कोई कारन नहीं बताया गया

बज्म-ए-उलपफत में जब भी पाँव रखा
दिल का हर मामला दबाया गया

कोई गुनाह न होने पाए
इसलिए ज़्ाुल्म-ओ-सितम ढाया गया

बेवफाई न हो सकी हमसे
उनसे वादा नहीं निभाया गया

जाने अब नींद क्यों नहीं आती
ख़ुद को किस-किस तरह सुलाया गया

मेरी आँखों से अश्क का कतरा
गिर पड़ा या उसे गिराया गया

गजल: ही रहे:

hi raheगजल: ही रहे:

मुस्कराते भी रहे आह भी भरते ही रहे
तुम्हें भुलाते रहे याद भी करते ही रहे

तुम्हारे प्यार की ऊँचाइयों को छू-छू कर
हकीकतों की तलहटी में उतरते ही रहे

कभी गर्मी कभी बरसात कभी शीत लहर
लब-ए-अवाम की सुर्खी में उभरते ही रहे

किसने परवाह की मुरझाते हुए फूलों की
बहार में चमन के रंग निखरते ही रहे

किया पसन्द नहीं झूठ का कोई पहलू
फिर भी सच्चाइयों की शक्ल से डरते ही रहे

खुशी ने जब भी सँवारे तेरे गेसू-ए-खयाल
हवा-ए-गम से बार-बार बिखरते ही रहे

गजल: क्या कहें:

kya kahenगजल: क्या कहें:

वक्त कितना कीमती है क्या कहें
चार दिन की जि़्ान्दगी है क्या कहें

मौत होती है सुना तो है मगर
आज तक देखी नहीं है क्या कहें

सब घटाएँ हो गई हैं मनचली
अब कोई मौसम नहीं है क्या कहें

नालियाँ नहरें बनीं नदियाँ बनीं
कौन सी दरियादिली है क्या कहें

बढ़ गया शक का नज़रिया चारसू
सब्र की कापफी कमी है क्या कहें

खो दिया ईमान पैसे के लिए
आजकल का आदमी है क्या कहें

गजल: बना देती है:

bana deti - Copyगजल: बना देती है:

मौत लम्हों को ख़तरनाक बना देती है
भूख इंसान को चालाक बना देती है

दामन-ए-वक़्त में ग़म भी हैं और खुशियाँ भी
जि़्ान्दगी इनको इत्तफाक बना देती है

गर भड़क उट्ठे तो नफरत की एक चिनगारी
प्यार के जंगलों को ख़ाक बना देती है

दिल के आलम में जरा सी हवा-ए-रुसवाई
मौसम-ए-इश्व़्ाफ को नापाक बना देती है

हमको मालूम है कि सच की जरा सी हिम्मत
झूठ के जोश को बेबाक बना देती है

प्यार की राह में जब कोई भटक जाता है
जि़्ान्दगी उसको शर्मनाक बना देती है

गजल: चाँद उगते रहेे:

chaandगजल: चाँद उगते रहेे:

चाँद उगते रहे सूर्य ढलते रहे
और तारे अँधेरों में पलते रहे

झिलमिलाती हुयी वक्त की रेत पर
उम्र के ऊँट करवट बदलते रहे

आँसुओं के जमाख़ोर बाज़्ाार में
भाव नभ चूमने को मचलते रहे

जो भी मिलता रहा पेट में डालकर
अपनी आँतों के दानव को छलते रहे

तन में घर कर गईं जब से बीमारियाँ
मन में रिश्तों के मतलब पिघलते रहे

जि़्ान्दगी की कसम मौत के रहम से
जल्द मरने के आसार टलते रहे

गजल: खो गया:

 

kho gayaगजल: खो गया:

संध्या का गीत रात के साजों में खो गया
इंसान जि़्ान्दगी के तकाजों में खो गया

छोटा सा एक रोग छिपाने के फेर में
तन-मन तरह-तरह के इलाजों में खो गया

बारात में जो प्रेरणा देता था नाच की
अपने ही ख़यालों के जनाजों में खो गया

किस बेख़ुदी में ख़ुद को ख़ुदा मानता रहा
जो आजकल तमाम नमाजों में खो गया

जो गाँव की संस्कृति के बगीचे में खिला था
वह फूल भी शहर के रिवाजों में खो गया

जिस आचरण की बात कर रहा था नया दौर
वह वक़्त की कृपा से मिजाजों में खो गया

गजल: है ना:

hai naगजल: है ना:

दर्द दो रोज़ का वहम है ना
वक्त हर जख़्म का मल्हम है ना

साँस लेते हुए कभी न थके
जब से पैदा हुए हैं हम है ना

उनकी फुरकत की परेशानी में
खुशी देने लगे हैं गम है ना

कैसी यादों की घटा छाई है
आँख होने लगी है नम है ना

आदमी और जानवर में अब
फासले हो गए हैं कम है ना

जि़्ांदगी ने बहुत सताया पर
मौत करती रही रहम है ना