गज़ल : कोई बात नहीं :

koi baatगज़ल : कोई बात नहीं :

तुम पे हालात के ़खतरे हैं कोई बात नहीं
जहाँ ने ज़ुल्म ही करे हैं कोई बात नहीं

जिनकी आँखो में चमकती थी हमेशा उल्फत
आज कुछ अश्क के ़कतरे हैं कोई बात नहीं

सबको मालूम है कि ज़िन्दगी की राहों में
दर्द के काँच से छितरे हैं कोई बात नहीं

आफतें आने पे आकाश के ़फरिश्ते भी
अर्श से ़फर्श पे उतरे हैं कोई बात नहीं

सभी की उम्र की किताब के नाज़ुक पन्ने
दीमक-ए-व़क्त ने कुतरे हैं कोई बात नहीं

अपनी तकली़फ बार-बार बयाँ मत करिए
हम भी इस दौर से गुजरे हैं कोई बात नहीं

गजल : मत करना :

mat karnaगजल : मत करना :

धड़कनें बेकरार मत करना
मेरी यादों से प्यार मत करना

दिल अगर जिद करे तो रो-रो कर
आँख नम बार बार मत करना

ज़िन्दगी की सियाह रातों में
ख़्वाब का एतबार मत करना

वो जो उल्फत में जान देते हैं
मुझको उनमें शुमार मत करना

मुझको मजबूरियों ने लूट लिया
अब मेरा इन्तज़ार मत करना

हरेक चीज़ की हद होती है
कभी उस हद को पार मत करना

गजल: किसलिए:

 

kisliyeगजल: किसलिए:

किसलिए प्यार में सताया गया
कोई कारन नहीं बताया गया

बज्म-ए-उलपफत में जब भी पाँव रखा
दिल का हर मामला दबाया गया

कोई गुनाह न होने पाए
इसलिए ज़्ाुल्म-ओ-सितम ढाया गया

बेवफाई न हो सकी हमसे
उनसे वादा नहीं निभाया गया

जाने अब नींद क्यों नहीं आती
ख़ुद को किस-किस तरह सुलाया गया

मेरी आँखों से अश्क का कतरा
गिर पड़ा या उसे गिराया गया

गजल: ही रहे:

hi raheगजल: ही रहे:

मुस्कराते भी रहे आह भी भरते ही रहे
तुम्हें भुलाते रहे याद भी करते ही रहे

तुम्हारे प्यार की ऊँचाइयों को छू-छू कर
हकीकतों की तलहटी में उतरते ही रहे

कभी गर्मी कभी बरसात कभी शीत लहर
लब-ए-अवाम की सुर्खी में उभरते ही रहे

किसने परवाह की मुरझाते हुए फूलों की
बहार में चमन के रंग निखरते ही रहे

किया पसन्द नहीं झूठ का कोई पहलू
फिर भी सच्चाइयों की शक्ल से डरते ही रहे

खुशी ने जब भी सँवारे तेरे गेसू-ए-खयाल
हवा-ए-गम से बार-बार बिखरते ही रहे

गजल: क्या कहें:

kya kahenगजल: क्या कहें:

वक्त कितना कीमती है क्या कहें
चार दिन की जि़्ान्दगी है क्या कहें

मौत होती है सुना तो है मगर
आज तक देखी नहीं है क्या कहें

सब घटाएँ हो गई हैं मनचली
अब कोई मौसम नहीं है क्या कहें

नालियाँ नहरें बनीं नदियाँ बनीं
कौन सी दरियादिली है क्या कहें

बढ़ गया शक का नज़रिया चारसू
सब्र की कापफी कमी है क्या कहें

खो दिया ईमान पैसे के लिए
आजकल का आदमी है क्या कहें

गजल: बना देती है:

bana deti - Copyगजल: बना देती है:

मौत लम्हों को ख़तरनाक बना देती है
भूख इंसान को चालाक बना देती है

दामन-ए-वक़्त में ग़म भी हैं और खुशियाँ भी
जि़्ान्दगी इनको इत्तफाक बना देती है

गर भड़क उट्ठे तो नफरत की एक चिनगारी
प्यार के जंगलों को ख़ाक बना देती है

दिल के आलम में जरा सी हवा-ए-रुसवाई
मौसम-ए-इश्व़्ाफ को नापाक बना देती है

हमको मालूम है कि सच की जरा सी हिम्मत
झूठ के जोश को बेबाक बना देती है

प्यार की राह में जब कोई भटक जाता है
जि़्ान्दगी उसको शर्मनाक बना देती है

गजल: चाँद उगते रहेे:

chaandगजल: चाँद उगते रहेे:

चाँद उगते रहे सूर्य ढलते रहे
और तारे अँधेरों में पलते रहे

झिलमिलाती हुयी वक्त की रेत पर
उम्र के ऊँट करवट बदलते रहे

आँसुओं के जमाख़ोर बाज़्ाार में
भाव नभ चूमने को मचलते रहे

जो भी मिलता रहा पेट में डालकर
अपनी आँतों के दानव को छलते रहे

तन में घर कर गईं जब से बीमारियाँ
मन में रिश्तों के मतलब पिघलते रहे

जि़्ान्दगी की कसम मौत के रहम से
जल्द मरने के आसार टलते रहे