क – भिणकनुं और पौंइ बल्द

 

 

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एक था भिणकनुवा नाम का पक्षी और एक था पौंइ नामक बैल। भिणकनुवा पक्षी
ने घास-फूस इकट्ठा कर एक झाड़ी में अपना घोंसला बनाया और उसमें अण्डे दिये।
एक दिन चरते-चरते पौंइ बैल भी उस ओर ही आ निकला। पौंइ बैल का खुर झाड़ी
पर पड़ा और भिणकनुवा पक्षी के अण्डे फूट गए। जब भिणकनुवा अपने घोंसले में लौटा
तो उसने देखा कि अण्डे फूटे पड़े हैं। पास में ही पौंइ बैल चर रहा था। भिणकनुवा पक्षी
ने पौंइ बैल के पास आकर कहा : ‘पौंइ बैल, पौंइ बैल, तूने मेरे अण्डे क्योंकर फोड़
डाले?’ पौंइ बैल बोला। ‘मैंने जान-बूझ कर तो अण्डे तोड़े नहीं। ग्वाले ने मुझे घास नहीं
दी। मैं चरने के लिए निकला तो मेरे पांव के नीचे आ जाने से तेरे अण्डे फूट गए।’

भिणकनुवा ने सोचा कि यदि पौंइ बैल प्रतिदिन ऐसे ही चरने के लिए आता रहा तो कहीं
दूसरी बार के अण्डे भी न फोड़ डाले। उसने पौंइ बैल से पूछा: ‘अच्छा, यदि ग्वाला तुझे
नित्य-प्रति घास देता रहे तब तो तू मेरे अण्डे न फोड़ेगा?’ पौंइ बैल बोला: ‘यदि ग्वाला
मुझे घास देता रहे तो मैं चरने ही क्यों आने लगू¡ भला।’ भिणकनुवा ने ग्वाले के पास
जाकर पूछा: ‘ओ ग्वाले, तूने पौंइ बैल को घास क्यों नहीं दी। तूने उसे घास न दी तो
वह चरने के लिए निकला और उसने मेरे अण्डे फोड़ डाले।’ ग्वाला बोला : ‘मैं पौंइ बैल
के लिए कहाँ से लाता घास? बन में घास हरी हुई ही नहीं।’