सिनेमा: सवाक् सामाजिक 02

savaak 02सिनेमा: सवाक् सामाजिक 02

सामाजिक फिल्मों की श्रृंखला में 1961 में करोड़पति, हरियाली और रास्ता, घराना, गोदान, हम दोनों, अमर ज्योति, बेगाना; 1962 में आग और पानी, बिरादरी, राखी, ग्यारह हजार लड़कियां, आज और कल, सूरत और सीरत, बात एक रात की; 1963 में गुमराह, नर्तकी, उम्मीद, गहरा दाग, अरमान भरा दिल, जिंदगी और हम, राजा और रंक; 1964 में दूर गगन की छांव में, बेनजीर, हिमालय की गोद में, धरती कहे पुकार के, सुहागरात, सांझ और सवेरा, दोस्ती; 1965 में हमारा घर, आकाश दीप, उंचे लोग, ब्रह्मचारी, जौहर महमूद इन गोआ, चांदी की दीवार व काजल जुड़ीं।

फिर 1967 में राम और श्याम, राहगीर, दुल्हन एक रात की, तकदीर, लोफर; 1968 में किस्मत, संघर्ष, वासना, आदमी, सरस्वतीचन्द्र; 1969 में इंतकाम, तलाश, आशीर्वाद, नन्हा फरिश्ता, खामोशी, चंदा और बिजली, भुवन शोम; 1970 में सात फेरे, दोराहा, दगाबाज, नया रास्ता, हिम्मत, दस्तक, उसकी रोटी, सारा आकाश, आषाढ़ का एक दिन, एक अधूरी कहानी, बदनाम बस्ती आदि फिल्में उल्लेखनीय रहीं।

इनके अलावा 1971 में बुड्ढा मिल गया, पारस, सास भी कभी बहू थी, पतंगा, रखवाला, तेरे मेरे सपने, कल आज और कल, परवाना, गुड्डी, अमर अकबर एंथोनी, संसार, मेला, ऐलान, कारवां, फरिश्ते, बदनाम, बहुरूपिया, आबरू, आग और दाग; 1972 में सीता और गीता, जरूरत, कंगन, मुनीमजी, अनुराग, अच्छा बुरा, रिवाज, बाॅम्बे टू गोआ, घरौंदा, अपना देश, बुनियाद, चोर मचाए शोर, छुपा रुस्तम; 1973 में मेरे गरीब नवाज, जंगल में मंगल, जोशीला, जैसे को तैसा, झील के उस पार, दामन और आग, ज्वार भाटा, कीमत, प्राण जाए पर वचन न जाए, नैना, हंसते जख्म, अभिमान, अनामिका, नमक हराम; 1974 में ठोकर, संकल्प, फासला, असलियत, विदाई, त्रिमूर्ति, रोटी कपड़ा और मकान, अंकुर; 1975 में सजा, साधू, पाॅकेटमार, जीवनरेखा, और निशांत को दर्शकों द्वारा खूब पसंद किया गया।

तदुपरांत 1976 में हेराफेरी, सज्जोरानी, गंगा की सौगंध, अदालत, मंथन, मृगया; 1977 में ईमान धर्म, धूप छांव, उपर वाला जाने, खमन पसीना, जिंदगी, दिल और पत्थर, भूमिका, आलाप; 1978 में टूटे खिलौने, अपनापन, कर्मयोगी, आहुति, आखरी मुजरा, देवता, दादा, अमरशक्ति; 1979 में जानी दुश्मन, कसमें वादे, स्पर्श, दुविधा, अरविंद देसाई की अजीब दास्तान; 1980 में मांग भरो सजना, जुदाई, जुर्माना, दोस्ताना, राम बलराम, लोक परलोक, स्वयंवर, भोपाल एक्सप्रेस, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, चक्र, कलियुग, भवानी भाई, रेडरोज, आक्रोश इत्यादि फिल्में बनीं। क्रमशः

सिनेमा: अवाक् सामाजिक:

avaak samajikसिनेमा: अवाक् सामाजिक:

समाज सुधार नवजागरण का एक भविष्योन्मुखी पक्ष था, अतः कुछ ऐसी
फिल्मों का भी निर्माण हुआ, जो सुधार केंद्रित थीं। इन्हें ‘टाॅपिकल्स’
कहा जाता था; जैसे 1921 में धीरेंद्र गांगुली ने ‘इंग्लैंड रिटर्न’नामक
फिल्म बनाई, जिसमें यूरोपीय आधुनिकता को अस्वीकार करते हुए उन
भारतीयों पर व्यंग्य कसा गया है, जो पश्चिम की चकाचैंध में भारतीयता
को भुला रहे थे।

इसके अतिरिक्त निर्मित अन्य अवाक् फिल्मों में पिता की कमाई – 1922,
कीमती आंसू, बम्बई की सेठानी, ननद भौजाई, सहधर्मिणी, एजूकेटेड वाइफ
– 1923; समाज की भूल, एक अबला – 1924; आशा , बीसवीं सदी –
1925; टाइपिस्ट गर्ल, टेलीफोन गर्ल – 1926; गुण सुंदरी, बाल हत्या –
1927; अन्नपूर्णा, अपराधी अबला, औरत का दिल, औरत का प्यार – 1928;
विश्व मोहिनी, भिखारन, औरतों से सावधान, कुलदीपक, पति पत्नी, मेरी मांॅ –
1929; औरत का बदला, एक आदर्श औरत, सिनेमा गर्ल, सुहागरात – 1930
को सामाजिक फिल्मों की कोटि में रखा जा सकता है।

1921 से 1930 के मध्य निर्मित प्रेम विषयक फिल्मों में लोकगाथाओं पर आधारित
हीर रांझा, लैला मजनू, सस्सीपुन्नू, शीरीफरहाद, सोहनी महिवाल के अतिरिक्त राधा
रानी, इंदिरा, दुलारी, दिवानी दिलवर, प्रेम परीक्षा, प्रेम पुजारी, दिलरुबा, चितचोर,
पागल प्रेमी, चांद का टुकड़ा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जिस प्रकार प्रेम विषयक
फिल्में दो प्रकार की हैं – लोक कथाश्रित एवं कल्पनाश्रित; उसी प्रकार सामाजिक
फिल्मों के भी दो भेद किए जा सकते हैं – समाज प्रधान एवं परिवार प्रधान। इस
प्रकार 1930 के बाद निर्मित सवाक् सामाजिक फिल्मों को विधिवत् वर्गीकृत किया जा
सकता है। क्रमशः

सिनेमा: अन्य राजनीतिक:

any raajnitikसिनेमा: अन्य राजनीतिक:

1991 में शेर ए हिंदुस्तान, प्रहार; 1992 में रोजा, हे राम, काला बाजार;
1993 में इज्जत, क्रांतिवीर, जख्म; 1994 में खुद्दार; 1995 में बाम्बे,
इंकलाब, करन अर्जुन, आर्मी, कारतूस; 1996 में मुद्दा, अग्निपथ, विनाशक,
हथियार, औजार, ट्रेन टू पाकिस्तान, माचिस, गुलाम ए मुस्तफा; 1997 में
अंगरक्षक; 1998 में लोफर, चाइना गेट, मिलिट्री राज, सोल्जर, दुश्मन,
पुकार, जंगल, एक ही रास्ता; 1999 में सरफरोश, अंश, हू तू तू, कोहराम,
हिंदुस्तान की कसम, शहीद ए मोहब्बत; 2000 में रिफ्यूजी, तिरंगा, वार एण्ड
लव, सत्या, हम, कहर, जीत, फर्ज, हम हैं बेमिसाल नामक फिल्में बनीं।

नई सदी में 2001 में वास्तव, जंग और अमन, अक्स, मिशन कश्मीर, गदर;
2002 में नायक, मां तुझे सलाम, शूल, दिलजले, बाॅम्बे पोलिस, फिजा, लहू
के दो रंग, द लीजेण्ड आॅफ भगत सिंह, 16 दिसंबर; 2003 में सत्ता,
अग्निपंख, एल. ओ. सी., कलकत्ता मेल, पिंजर; 2004 में युवा, स्वदेश,
सरहद पार, अब तुम्हारे हवाले वतन साथ्यिो, धूप, जमीन, सुभाष चंद्र बोस,
लक्ष्य, हासिल, क्रांति, खाकी तथा दीवार नामक राजनीतिक फिल्मों का बोलबाला
रहा।

चंद्रकांत शिंदे के शब्दों में ‘‘कच्चे धागे – जैसी सफल फिल्म देने वाले युवा निर्देशक
मिलन लथूरिया ने ‘दीवार’ जैसी एक अलग विषय की फिल्म बनाने का साहस किया,
जिसे बाॅक्स आॅफिस सफलता भी हासिल हुई। पाकिस्तान की जेल में कई सालों से
बंद भारतीय फौजियों की इस कहानी में अमिताभ बच्चन ने अपनी अदाकारी से चार
चांद लगा दिए थे। संजय दत्त ने भी इसमें एक अलग तरह का किरदार निभाकर
अपना वजूद जता दिया था। अमिताभ के बेटे के रूप में अक्षय खन्ना ने भी अच्छा
काम करके दिखाया था।’’

इसके बाद 2010 में राजनीति, पीपली लाइव; 2012 में एम. एल. ए., 2013 में
सत्याग्रह, बंदूक, मद्रास कैफे 2014 में यंगिस्तान, देख तमाशा देख, कटियाबाज,
जेड प्लस, गरम हवा; 2015 में जय जवान जय किसान, 2016 में जय गंगाजल,
2019 में एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर ने भावपक्ष एवं कलापक्ष की उंचाइयों को सम्यक्
रूप से स्पर्श किया है। क्रमशः

सिनेमा: साठ से नब्बे तक:

 

saath se nabbeसिनेमा: साठ से नब्बे तक:

1961 में धर्मपुत्र, सन आफ इंडिया, गंगा जमना; 1963 में आदमी और इंसान,
शहीद भगत सिेह, चंद्रशेखर आजाद; 1964 में लीडर, सुभाष चंद्र बोस, शहीद,
शहर और सपना; 1965 में हकीकत; 1966 में मेरी आवाज सुनो, मेरे लाल,
संबंध; 1967 में उपकार, अमन; 1968 में बंबई रात की बाहों में; 1969 में
सात हिंदुस्तानी, सत्यकाम; 1970 में प्रेम पुजारी, हमारा अधिकार, समाज को
बदल डालो नामक राजनीतिक फिल्में जनता द्वारा पसंद की गई।

धीरे धीरे जब छात्रों ने राजनीति में सक्रिय भाग लेना प्रारंभ किया, तब विपक्षी दल
के नेताओं ने उन्हें अपनी स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बनाया; जिसके परिणाम स्वरूप
जन आंदोलन, अनशन अथवा तोड़ फोड़ की घटनाओं द्वारा सत्ता के विरोध का मार्ग
प्रशस्त हुआ। ‘मेरे अपने’ नामक फिल्म में यही सब दिखाया गया है।

मेरे अपने के अलावा 1971 में ललकार, जय बांग्लादेश; 1972 में नया जमाना,
बावर्ची; 1973 में गर्म हवा, हिंदुस्तान की कसम, नमक हराम; 1974 में सगीना,
आविष्कार; 1975 में किस्सा कुर्सी का, आंधी, आक्रमण; 1977 में त्रिशूल, स्वामी,
आनंद आश्रम; 1978 में गम, सुनयना, खुद्दार; 1979 में सुभाष चंद्र, अंधा कानून,
काला पत्थर; 1980 में घर, लोक परलोक; 1981 में सिलसिला, सद्गति, कालिया,
अंगूर; 1982 में गांधी, 1983 में विजेता, कुली; 1984 में पार्टी, दहलीज, दामुल;
1985 में अंकुश, मिर्च मसाला; 1986 में अर्जुन, कर्मा; 1987 में शहंशाह; 1988
में बाज बहादुर, 1089 में मैं आजाद हूं 1990 में लाल सलाम नामक फिल्में काफी
लोकप्रिय रहीं।

सिनेमा: साहित्यकार:

 

sahitykar (1)सिनेमा: साहित्यकार:

हिंदी कथासाहित्यकारों में प्रेमचंद की रचनाओं पर सबसे ज्यादा फिल्में बनीं, क्योंकि
अपनी रचनाओं में उन्होंने केवल देश की आजादी की आकांक्षा ही अभिव्यक्त नहीं की,
बल्कि जातिगत मिथ्याभिमान, सामंतवादी शोषण, सांप्रदायिक मदांधता, मानसिक संकीर्णता,
बाल विवाह, विधवा विवाह, दहेज, निरक्षरता, अस्पृश्यता आदि अनेक ज्वलंत समस्याओं
पर भी लेखनी चलाई। उनकी रचनाओं में उनका युग अपने यथार्थ रूप में प्रतिबिंबित हुआ
है। यह यथार्थ अपनी आदर्शोन्मुखता के कारण अनुकरणीयप्रतीत हुआ और इसी प्रतीति ने
हिंदी के सुरुचिसंपन्न फिल्मकारों को आकर्षित किया।

कहानियों पर बनी फिल्में –

1. मिल 1934 अजंता सिनेटोन
2. नवजीवन 1934 एए एए
3. स्वामी 1941 सिरको प्रोडक्षंस
4. हीरा मोती 1959 श्रीकृष्ण चोपड़ा
5. शतरंज के खिलाड़ी 1977 सत्यजित रे
6. सद्गति 1981 एए

उपन्यासों पर बनी फिल्में –

1. सेवा सदन 1934 महालक्ष्मी सिनेटोन
2. रंगभूमि 1946 भावनानी प्रोडक्षंस
3. गोदान 1963 त्रिलोक जेटली फिल्म्स
4. गबन 1966 श्री सोरल और सोनथालिया

विगत शताब्दी के मध्य में हिन्दी के जिन साहित्यकारों के कथासाहित्य पर फिल्में बनीं,
उनमें से भगवती चरण वर्मा ;चित्रलेखाद्धए सुदर्शन ;धूप.छांवद्धए सेठ गोविंद दास (धुआंधार),
चंद्रधर शर्मा गुलेरी (उसने कहा था), आचार्य चतुर सेन शास्त्री (धर्मपुत्र, आम्रपालीद्ध)
फणीश्वर नाथ रेणु (तीसरी कसम), धर्मवीर भारती (सूरज का सातवां घोड़ा) के नाम विशेष
रूप से उल्लेखनीय हैं। क्रमश:

सिनेमा: नई शताब्दी:

any aitihasik

सिनेमा: नई शताब्दी:

नई शताब्दी में एक ओर आमिर खान की लगान तथा मंगल पाण्डे में अंग्रेज षासकों के तौर-तरीकों पर नए अंदाज से रोषनी डाली गई और दूसरी ओर षाहरुख खान की अषोक तथा अकबर खान की ताजमहल में नव्यता एवं भव्यता के साथ मगध व मुगल सम्राटों का पुनरावलोकन हुआ। गांधी को लेकर ष्याम बेनेगल ने द मेकिंग आफ महात्मा नामक फिल्म बनाई। राप्ट्र नायकों को लेकर फिल्म बनाने वाले राजकुमार संतोपी की द लीजेण्ड आफ भगत सिंह, गुड्डू धनोवा की 23 मार्च 1931 शहीद, केतन मेहता की सरदार बल्लभ भाई पटेल, श्याम बेनेगल की बोस-द फाॅरगाॅटन हीरो ने फिर से इतिहास पर नजर डालने का प्रयास किया।

इसके अलावा आषुतोष गोवारिकर की जोधा अकबर – 2008 ओर उसके बाद
2010 में खेलें हम जी जान से, 2011 में द डर्टी पिक्चर, 2012 में पान सिंह तोमर, 2013 में भाग मिल्ख भाग, श्रंगार; 2014 में संभाजी 1689, क्या दिल्ली क्या लाहौर; 2015 में बाजी राव मस्तानी, 2016 में मोहन्जो दारो, सिद्धार्थ गौतम, चापेकर ब्रदर्स, एयरलिफ्ट; 2017 में बेगम जान, इंदु सरकार; 2018 में राजी, पद्मावत, पलटन; 2019 में मणिकर्णिका और केसरी नामक फिल्मों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सही समीक्षा के अभाव में व्यवसायी फिल्मकार यह भूल जाते हैं कि उनकी फिल्मों में ऐतिहासिक प्रसंगों के साथ समसामयिक संस्कृति भी समन्वित है और इन फिल्मों का भारत के अलावा अन्य देषों में भी प्रदर्शन होता है। अंतर्राप्ट्रीय स्वीकृति के लिए विदेशी दर्षकों की बौद्धिक अवस्था का भी ध्यान रखना पड़ता है। यही कारण है कि स्वदेषी अथवा विदेषी पुरस्कार पाने वाली फिल्मों में हिन्दी फिल्मों की अपेक्षा क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में अधिक होती हैं, क्योंकि वे अपनी जमीन से जुड़ी होती हैं, अपने परिवेष से सजी होती हैं। सही पहचान के लिए कोई भी सृजन देश और काल के सहज वातावरण में होना चाहिए । क्रमशः

सिनेमा: सवाक् ऐतिहासिक:

savaak aitihasikसिनेमा: सवाक् ऐतिहासिक:

सवाक् फिल्मों के प्रारंभ होने के बाद 1931 में नूरजहां, आलमआरा; 1932 में वीर कुणाल, रोशन आरा; 1933 में विक्रम चरित्र, इंतकाम, रूपलेखा; 1934 में जहांआरा, मुमताज बेगम, वीरांगना पन्ना, चंद्रगुप्त, असंतसेना; 1935 में अनारकली, कत्लेआम, बीरबल की बेटी, खून का खून, बलिदान; 1936 में बाज बहादुर, चांद बीबी, बसंतसेना, ऐलान ए जंग, सईद ए हवस; 1937 में खान बहादुर, विद्यापति; 1938 में मीठा जहर, तलाक, राजकुमारी, विजय डंका; 1939 में रण संग्राम, गाजी सलाउद्दीन, पुकार, मुराद; 1940 में दीपक महल, रानी साहिबा आदि अनेक ऐतिहासिक फिल्में बनीं।

1941 में सिकंदर, ताजमहल, चित्रलेखा, शाहजादी, राजनर्तकी; 1943 में शहंशाह अकबर, पृथ्वी बल्लभ, दुहाई, राजा; 1944 में हुमायूं, शहंशाह बाबर; 1945 में वीर कुणाल, आम्रपाली, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, पन्ना धाय, महाकवि कालिदास; 1946 में शाह ए जहां, मगधराज, शालीमार, एक दिन का सुल्तान, महारानी मीलनदेवी, राजपूतानी; 1947 में बहराम खां, महाराणा प्रताप, उमर खैयाम, सम्राट अशोक, चित्तौड़ विजय, शहजादी, वीरांगना; 1948 में महात्मा गांधी, अंजनगढ़, चंद्रलेखा, रंगमहल, राजमाला; 1949 रूप बसंत, रूपलेखा, निशान तथा 1950 में शीशमहल, राजमुकुट, मंगला, राजरानी आदि नामक ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण हुआ।

1951 में राजपूत, एक था राजा, शबिस्तान; 1952 में छत्रपति शिवाजी, महारानी झांसी, आन; 1953 में अनारकली, झांसी की रानी, जलियांवाला बाग की ज्योति, शहंशाह, राजमहल; 1954 में मलिका ए आलम नूरजहां, शहीद ए आजम भगत सिंह, चांदनी चैक, सल्तनत, बादशाह; 1955 में अदल ए जहांगीर, रामशास्त्री का न्याय, रतनगढ़, रुखसाना, दिल्ली दरबार, रियासत; 1956 में हलाकू, दुर्गेश नंदिनी, पन्ना, ढोलामारू, बादशाह सलामत, राजहठ, राजधानी, पटरानी; 1957 में चंगेज खां, अमर सिंह राठौर, राजा विक्रम, नौशेरवान ए आदिल, मुमताज महल, महारानी; 1958 में सम्राट चंद्रगुप्त, यहूदी, बागी सिपाही, राजप्रतिज्ञा, राजसिंहासन, राजतिलक; 1959 में रानी रूपमती, महाकवि कालिदास, सम्राट पृथ्वीराज चैहान, जय सिंह, टीपू सुल्तान, नवरंग तथा 1960 में बनीं वीर दुर्गादास, मुगल ए आजम, बाबर, लालकिला, कोहिनूर, रानी सारंगा, चंद्रमुखी आदि फिल्में प्रमुख रहीं।

1961 में स्त्री, सेनापति, महावत, वजीर ए आजम; 1962 में आल्हा उदल, राष्ट्रवीर शिवाजी, संगीत सम्राट तानसेन, बलिदान, राजनंदिनी; 1963 में ताजमहल, अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, नवाब सिराजुद्दौला, राजमहल; 1964 में नूरजहां, जहांआरा, चित्रलेखा, बागी शाहजादा, राजकुमार, बागी; 1965 में महाराजा विक्रमादित्य, महारानी पद्मिनी, सिकंदर ए आजम, तीन सरदार; 1966 में आम्रपाली, सूरज, दिल दिया दर्द लिया; 1967 में नूरजहां तथा 1970 में महाराजा, धरती आदि के बाद ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण का सिलसिला टूट सा गया। 1973 में आलमआरा की बेटी, गोरा और काला; 1977 में शतरंज के खिलाड़ी; 1979 में मीरा, सिनेमा सिनेमा, जुनून; 1981 में क्रान्ति, 1982 में गांधी, 1983 में रजिया सुल्तान, 1985 में मर्द, 1992 में 1942 – ए लव स्टोरी, 1993 में सरदार, 1995 में तहलका, 1997 में सजा ए कालापानी नामक ऐतिहासिक फिल्में बनीं। क्रमशः

सिनेमा: ऐतिहासिक:

aitihasikसिनेमा: ऐतिहासिक:

जिस प्रकार भारतीय संस्कृति में गहन आस्था रखने वाले हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार
श्री जयशंकर प्रसाद प्राचीन भारत के अतीत के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर, अपने नाटकों
के लिए इतिहास का वह युग चुना; जिसमें हमारी संस्कृति अपने पूर्ण वैभव पर थी
और चन्द्रगुप्त मौर्य, कालिदास, स्कंद गुप्त, ध्रुवस्वामिनी तथा राज्यश्री आदि नाटकों का
प्रणयनकिया। उसी प्रकार भारतीय चलचित्र निर्माताओं ने भी अपनी ऐतिहासिक फिल्मों के
लिए नकेवल इस महान युग के चरित्रों या घटनाओं को चुना, बल्कि संपूर्ण भारतीय
इतिहास के गौरवपूर्ण प्रसंगों को अपनी फिल्मों का विषय बनाया।

ऐतिहासिक फिल्मों में एक वर्ग ऐसी फिल्मों का भी है, जो सन्तों और भक्तों के
व्यक्तित्वएवं कृतित्व पर आधारित हैं; जैसे – सन्त मीराबाई – 1929, कबीर
कमाल – 1930,सन्त तुलसीदास – 1935, सन्त तुकाराम, भक्त चेता – 1936,
सन्त तुलसीदास – 1939,भक्त सूरदास, भक्त कबीरदास – 1942, भक्त रैदास
-1943, धन्ना भगत – 1944,मीराबाई – 1947, सन्त तुकाराम – 1948, सन्त
जनाबाई, भक्त पुण्डलीक – 1949,श्री चैतन्य महाप्रभु – 1953, तुलसीदास – 1954,
जगतगुरु शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद- 1955, राजरानी मीरा – 1956, नरसी भगत,
सन्त रघु – 1957, गोपीचंद – 1958,माया मछेन्द्र – 1960, अंगुलिमाल – 1961,
गोस्वामी तुलसीदास – 1964, गोपीचंद – 1965, तुलसीदास – 1990 आदि।

इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक फिल्मों के अंतर्गत तीन प्रकार की फिल्में उपलब्ध होती
हैं – पहली शुद्ध रूप से इतिहास पर आधारित, दूसरी इतिहास के साथ कल्पना से
अनुप्रेरिततथा तीसरी केवल काल्पनिक राज्यों से सम्बन्धित; जिनका संयुक्त विवरण
प्रस्तुत है। हिंदी फिल्मों के अवाक् युग में 1917 में अशोक, 1920 में चन्द्रगुप्त,
1923 में सिंहगढ़, 1924 में सती पद्मिनी और रजिया बेगम, 1925 में अदले जहांगीर
तथा राणा प्रताप,1926 में सिराजुद्दौला, 1927 में मेवाड़ का सिंह, अनारकली, लव
आॅफ ए मुगल प्रिंस, 1929 में पृथ्वीराज चैहान, राजपूतानी, 1930 में उदयकाल का
प्रमुख रूप से उल्लेख किया जाता है। क्रमशः

सिनेमा: सिलसिला:

silsilaसिनेमा: सिलसिला:

एक बात और कि अब तक जिन लोक कथाओं या किंवदन्तियों को आधार बनाकर
पौराणिक फिल्मों का सिलसिला शुरू हुआ था, वे धीरे धीरे अपना प्रभाव खोती चली
गईं और फिल्मकार उनके स्थान पर अन्य नवीन विषयों को लेकर व्यस्त होते चले गए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के अनंतर शनैः – शनैः हिंदी सिनेमा में सामाजिक फिल्मों की जो बाढ़
आई, उसका असर लगातार बना रहा और अभी तक विद्यमान है।

जहां तक छठे दशक में बनी पौराणिक फिल्मों का प्रश्न है; 1951 में कृष्णलीला, लव
कुश, नन्दकिशोर, जय महाकाली, मुरली वाला, श्री गणेश जन्म, श्रीकृष्ण सत्यभामा,
लक्ष्मी नारायण, हनुमान पाताल विजय, श्रीविष्णु भगवान, जय महालक्ष्मी; 1952 में
विश्वामित्र, द्रौपदी, द्रौपदी वस्त्र हरण; 1953 में नाग पंचमी, रामराज्य, नवदुर्गा, पाताल
भैरवी, हरि दर्शन; 1954 में हनुमान जन्म, राधा कृष्ण, दुर्गा पूजा, शिवरात्रि, चक्रधारी,
शिवकन्या, गोकुल का राजा, कुष्ण सुदामा; 1955 में शिवभक्त, श्रीगणेश विवाह,
प्रभु कीमाया, वामन अवतार, नवरात्रि, सावित्री सत्यवान, सती मदालसा, एकादशी,
भागवत महिमानामक फिल्मों ने काफी लोकप्रियता अर्जित की।

इनके अलावा 1956 में गौरी पूजा, सती अनुसुइया, नागकन्या, द्वारकाधीश,
सुदर्शन चक्र,दशहरा, राम नवमी; 1957 में लक्ष्मी पूजा, भक्त ध्रुव, जनम
जनम के फेरे, हनुमान जन्म,चण्डी पूजा, जय अम्बे, पवन पुत्र हनुमान;
1958 में राम लक्ष्मण, भक्त गोपाल भैया, साक्षीगोपाल, दुर्गा माता, तीर्थयात्रा,
रामभक्त विभीषण, भक्त प्रह्लाद; 1960 में रामायण नामकफिल्मों का निर्माण हुआ।

1961 में सम्पूर्ण रामायण, सन्त ज्ञानेश्वर, रामलीला, सम्पूर्ण रामायण – रंगीन, जय
भवानी,भगवान बालाजी; 1962 में चार धाम, दुर्गा पूजा; 1963 में कण कण में
भगवान, संत ज्ञानेश्वर,हरिश्चंद्र तारामती, जय जगन्नाथ; 1964 में सीता मैया; 1965
में महाभारत; 1967 में रामराज्य,बद्रीनाथ यात्रा; 1968 में गंगा सागर व रामकृष्ण
नामक फिल्मों की जानकारी मिलती है, जो विगतदशकों में निर्मित पौराणिक फिल्मों
की तुलना में बहुत कम हैं।

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दौर में एक फिल्म शनिदेव के उपर बनी और एकाधिक
फिल्में शिरडीवाले साईं बाबा को केन्द्र में रखकर बनाई गईं, जिनमें उनके भक्तों के
विश्वास तथा अंधविश्वास कासंघर्ष प्रदर्शित किया गया। साईं बाबा वाली फिल्मों में तो
अनेक मशहूर अभिनेताओं – धर्मेंद्र, राजेशखन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, मिथुन चक्रवर्ती, सचिन,
विजयेन्द्र घाटगे आदि ने उनकी भक्ति के गीत गाने काखुलकर अभिनय किया है। क्रमशः

सिनेमा: सवाक् पौराणिक:

 

savaak pau.सिनेमा: सवाक् पौराणिक:

पौराणिक फिल्मों के अनेक निर्माता विविध प्रासंगिक कथाओं में से किसी प्रेरक
या रोचक मूल कथा को लेकर भी चित्रांकित करते रहे। 1931 से हिंदी सिनेमा
में सवाक् फिल्मों का दौर शुरू हुआ। 1931 के बाद भी यद्यपि चार पांच वर्षों
तक अवाक् फिल्में बनती रहीं, तथापि सवाक् फिल्मों का ज्यादा बोलबाला रहा।

इस दशक की पौराणिक फिल्मों में राजा हरिश्चंद्र, देवी देवयानी, प्रह्लाद, शकुंतला,
द्रौपदी – 1931; सती सावित्री, मीरा बाई, भतृहरि, माया मछेंद्र, भक्त प्रह्लाद,
विष्णु माया, राधेश्याम, श्यामसुंदर, सुभद्रा हरण, अयोध्या का राजा, इंदर सभा,
पूरन भगत, पवित्र गंगा – 1932; सुलोचना, सैरंध्री, भोलाशंकर, महाभारत, राजा
गोपीचंद,भक्त ध्रुव, रामायण, सेतु बंधन, लंका दहन, कृष्ण सुदामा, राधा कृष्ण,
सती अनुसुइया, सती महानंदा – 1933; सीता, वामन अवतार, अजामिल, विष्णु
भक्ति, हरि भक्ति, नंद के लाला, देवकी, नारी दुर्गा, भक्त के भगवान – 1934;
कृष्ण शिशुताई, श्याम सुंदर – 1935; सती पिंगला – 1937; गोपाल कृष्ण, भक्त
ध्रुव, गोरख आया, राजा गोपीचंद – 1938; रुक्मिणी दुर्गा – 1939; संत ज्ञानेश्वर,
अलख निरंजन – 1940 प्रमुख रहीं।

1941 में मधुसूदन, संत सुख; 1942 में भरत मिलाप; 1943 में शकुंतला,भक्तराज;
1944 में महारथी कर्ण, द्रौपदी, प्रभु का घर; 1945 में श्रीकृष्णार्जुन युद्ध, शंकर पार्वती,
सुभद्रा हरण, श्रीकृष्ण भक्ति; 1946 में उर्वशी, रुक्मिणी स्वयंवर, भक्त प्रह्लाद, वाल्मीकि,
देवकन्या; 1947 में मोहन, कृष्ण सुदामा, भक्त ध्रुव, मेरे भगवान, भक्त के भगवान,
चुद्रहास, भगवती, परशुराम; 1948 में रामवाण, अजामिल, श्री रामभक्त हनुमान, जय
हनुमान, भक्त विल्व मंगल, सावित्री सत्यवान, सती विजया, गोपाल भैया; 1949 में राम
प्रतिज्ञा, राम विरह, शबरी, गिरधर गोपाल, अहिल्या उद्धार, जय भीम, वीर घटोत्कच,
नर नारायण; 1950 में श्रीगणेश महिमा, राम दर्शन, श्रीकृष्ण दर्शन, अलख निरंजन, सती
नर्मदा, हर हर महादेव, वीर भीमसेन, गुरु दक्षिणा, भीष्म प्रतिज्ञा, भगवान श्रीकृष्ण, श्री
राम अवतार नामक पौराणिक फिल्मों का निर्माण हुआ। क्रमशः