अभिनेयता :

abhineytaअमिताभ बच्चन, जिनकी अदाकारी में उनकी आवाज का जादू भी शामिल है, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’
में एक गूंगे पात्र को सफलतापूर्वक निभा ले गए। इसी तरह शाहरुख खान, जिनका अंदाज ए बयां हटकर
है, फिल्म ‘कोयला’ में गूंगे बनकर कथानक की भावधारा का नेतृत्व करते रहे। फिल्म ‘अंकुर’ में साधु
मेहर ने भी गूंगे बहरे की भूमिका से ही अपनी अभिनेयता का सिक्का जमाया।

फिल्म ‘खिलौना’ में संजीव कुमार, ‘मजबूर’ में अमिताभ बच्चन, ‘ईश्वर’ में अनिल कपूर या ‘कोई मिल
गया’ में रितिक रोशन का किरदार जितना अलग था, फिल्म ‘किशन कन्हैया’ में श्रीराम लागू या ‘अंजाम’
में शाहरुख खान का रोल उतना ही सरल नहीं था।

इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के असाध्य व्याधियों से त्रस्त पात्रों की भूमिकाएं भी अनेक फिल्मों की सफलता
का आधार रही हैं; जैसे ‘आनंद’ में राजेश खन्ना, ‘शोले’ में संजीव कुमार, ‘गजनी’ में आमिर खान, ‘पा’
में अमिताभ बच्चन, ‘गुजारिश’ में रितिक रोशन, ‘माय नेम इज खान’ में शाहरुख खान आदि।

कीर्तिमान :

kirtimanमहबूब खान की बहुचर्चित फिल्म ‘मदर इंडिया’ में राजकुमार के अपंग हो जाने के बाद का मानसिक तनाव
उनकी मुखमुद्राओं एवं चेष्टाओं में प्रतिबिंबित होता है। इसी फिल्म से उभरे अभिनेता सुनील दत्त फिल्म ‘खानदान’
में एक लूले व्यक्ति की भूमिका अत्यंत स्वाभाविक रूप से जी चुके हैं। फिल्म ‘कर्मा’ में नसीरुद्दीन शाह का भी
एक हाथ कुछ गड़बड़ था।

दिल से ही नहीं, दिमाग से भी काफी रईस गुरुदत्त फिल्म ‘बहूरानी’ में एक विक्षिप्त पात्र की भूमिका अदा करके अपनी तरह की अनोखी मिसाल कायम कर चुके हैं। अमोल पालेकर ने फिल्म ‘सोलहवां सावन’ में अपंग पात्र का सहज अभिनय किया। फिल्म ‘आदमी’ में दिलीप कुमार तथा ‘अगर तुम न होते’ में राज बब्बर के विकलांग अभिनय में दैहिक व्यथा के साथ साथ मानसिक तनाव भी समन्वित है।

अंधे लंगड़े पात्रों की जोड़ी के रूप में सुधीर कुमार एवं सुशील कुमार के अभिनय ने फिल्म ‘दोस्ती’ की अपार लोकप्रियता में काफी हाथ बंटाया। इसी तरह गूंगे बहरे दंपति की भूमिका में संजीव कुमार और जया भादुड़ी ने फिल्म ‘कोशिश’ में अभिनव कीर्तिमान स्थापित किए। इसी भूमिका में नाना पाटेकर ‘खामोशी’ में कमाल कर गए।

सशक्त अभिनय :

sashaktदिलीप कुमार की पुरानी और अच्छी फिल्मों में ‘दीदार’ को लोग अभी भुला नहीं पाए हैं, जिसमें उन्होंने एक
अंधे गायक का किरदार निभाया था। ‘शोले’ में ए के हंगल, ‘आंखें ’ में अक्षय कुमार और उसके दो साथियों तथा ‘गोलमाल’ में परेश रावल और उसकी पत्नी ने अभिनय की दृष्टि सेे तरह तरह के अंधे पात्रों को सहजता के साथ जिया।

देव आनंद ने ‘हम दोनों’ में डबल रोल किया, जिनमें से एक रोल में लंगड़े सेना अधिकारी का अभिनय भी सम्मिलित था। इस रोल को देव आनंद ने इतने प्रभावशाली ढंग से अभिनीत किया कि उसे प्रसंगवश अभी भी
याद किया जाता है। कालांतर की एक फिल्म ‘साजन’ में संजय दत्त का विकलांग होने का अभिनय भी काफी सराहा गया।

डैनी डेंग्जोंग्पा, जो फिल्म ‘जरूरत’ में दौड़ते दौड़ते दर्शकों को भा गए थे, ‘गंगा मेरी मां’ में लंगड़े की
भी अच्छी भूमिका निभा गए। श्रीराम लागू ने ‘दो दुश्मन’ तथा ओम शिवपुरी ने ‘किनारा’ में लंगड़े पात्रों
की भूमिकाओं को भली भांति निभाया है। लंगड़े पात्रों की भूमिकाओं में फिल्म ‘बूट पाॅलिश’ में डेविड के
अभिनय को भुलाना भी आसान नहीं।

हिंदी फिल्मों के खलनायकों के सरताज प्राण फिल्म ‘उपकार’ में लंगड़े मलंग की भूमिका इस प्रकार निभा गए
कि उनकी परंपरागत छबि में उनकी अभिनय क्षमता के नूतन आयाम परिलक्षित हुए। पैरों से लाचार पात्रों में
फिल्म ‘शान’ के अब्दुल की तो बात ही निराली लगी, जो छोटे छोटे चार पहियों वाले चैकोर तख्ते पर बैठ कर हाथों के सहारे दौड़ता हुआ सारे शहर में गाता फिरता है कि – आते जाते हुए मैं सब पे नजर रखता हूं ; नाम अब्दुल है मेरा सबकी खबर रखता हूं।

अपंगता :

apangtaदेह की अपंगता को चुनौती के रूप में स्वीकार करने वाले कई कर्मठ यह प्रमाणित कर चुके हैं कि जहां मुर्गा नहीं होता, वहां का सवेरा ज्यादा खूबसूरत भी हो सकता है। लोग इस सच्चाई से भी नावाकिफ नहीं कि जिन लोगों की देह का एक आध अंग अक्षम होता है, उनके अन्य अंग अपेक्षा से अधिक सक्षम होते हैं। तभी नियति की व्यवस्थित दंड प्रक्रिया में असंतुलित कर्माें के संतुलित फल परिलक्षित होते हैं। इसका कारण केवल एक को ही सुधारना नहीं, अपितु सभी को सचेत करने के लिए सद् असद् का भेद समझाना भी है।

यही वजह है कि किसी अपंग को देखकर जनमानस में केवल करुणा का ही भाव नहीं जगता, वरन् किसी अज्ञात सत्ता के व्यापक आतंक का आभास भी होता है। सार्वजनिक सहानुभूति से किसी अपंग की हीन भावना कम हो जाती है, तो वह नई उमंग के साथ आगे बढ़ता है। अपनी अपंगता को अपनी सौम्यता या शिष्टाचार से पूरित करते हुए अपने कार्य की दक्षता से सब का मन मोह लेता है। धीरे धीरे वह समाज में अपने लिए एक ऐसी जगह बना लेता है कि उसके जिक्र के बिना उसके समाज का जिक्र अधूरा सा लगता है, क्योंकि उसके चरित्र की विषेशताएं बेहद निजी और निराली होती हैं।

फिल्मी कथानकों में जिस समाज की घटना होती है, उसी परिवेश के पात्र होते हैं। इन पात्रों में यदा कदा अपंग पात्र भी पर्दे पर आते और छा जाते हैं। ऐसे पात्रों का चरित्र केवल नाटकीय ही नहीं, मर्मस्पर्शी भी होता है। इनकी भूमिकाएं अभिनीत करने वाले कलाकार फिल्मी दुनियां के स्वस्थ एवं सुदर्शन सितारे ही हुआ करते हैं।

अशक्त पात्र :

ashakt

विधाता की स्रष्टि में देह प्रारब्ध से प्राप्त होती है, अतः पंचभौतिक देह की विकृतियां कर्म फलानुसार
मानी जाती हैं। कर्मफल का विधान देह की पूर्व रूप की त्रुटियों को संतुलित करने के लिए होता है।
संतुलन की यह व्यापक प्रक्रिया हर समाज व हर पीढ़ी पर समान रूप से लागू होती है, जिसके
परिणाम स्वरूप प्रत्येक काल में और प्रत्येक स्थान में कुछ विकलांग होते ही हैं।

विकलांगता दो प्रकार की हो सकती है – जन्मजात या आकस्मिक। जन्मजात विकलांगता को पूर्वजन्म
का फल मानने वाली व्यवस्था में सहानुभूति के स्थान पर कुछ भ्रामक धारणाएं रूढ़ हो गई हैं और
आकस्मिक विकलांगता के प्रति संवेदना का भाव प्रबल होते हुए भी कर्मफल की मान्यता षिथिल नहीं
हो पाई है।

एक तो खुदा की मार, उसके बाद यह व्यवहार; जिसकी वजह से विकलांगों में एक अजीब सी हीन
भावना घर करती है और वे समाज से कटने के साथ साथ एकांतप्रिय होने लगते हैं। एकांत की
उकताहट से बचाव या अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी स्थिति के अनुरूप वे जो कार्य
चुनते हैं, उसे एकाग्रता के साथ करते हैं अतः कभी कभी प्रसिद्धि के उच्च शिखर तक भी पहुंचते हैं।