सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – दो:

rahasya 2सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – दो:

रहस्य और रोमांच से भरी हिंदी की सवाक् फिल्मों के तारतम्य में 1961 में जादू नगरी, बगदाद,, व अनारबाला, 1962 में बगदाद की रातें, हवा महल, जादू महल, जादूगर डाकू, बात एक रात की व बीस साल बाद, 1963 में वह कौन थी, पारसमणि, खुफिया महल, 1964 में कोहरा व जुआरी, 1965 में भूत बंगला, गुमनाम व पूनम की रात, 1966 में मेरा साया, ये रात फिर न आएगी व तीसरी मंजिल, 1967 में मुजरिम कौन, अनीता व ज्वैल थीफ, 1969 में इत्तफाक व थीफ आॅफ बगदाद तथा 1970 में कब क्यों और कहां आदि के नाम प्रमुख हैं।

‘‘ बीस साल बाद – 1962 – एक रहस्यमय कथा है और आरंभ से अंत तक दर्शकों को और फिल्म के नायक को घने जंगल में उभरती हुई घुंघरुओं व गाने की आवाज की खोज के भयानक रूप में बांधे रखती है। इसमें खूनी पंजे से की जाने वाली हत्या के दृश्यों से दर्शकों में भयंकर खौफ उत्पन्न हो जाता है। अंत में जाकर खूनी पंजे और डरावनी हवेली का रहस्य खुलता है। इस प्रकार इस फिल्म ने रहस्यपूर्ण हिंदी चित्रों की एक नई शैली को जन्म दिया।’’ 1

1971 में परवाना, 1973 में धुंध व अनामिका, 1974 में बंनाम, 1975 में फरार व खेल खेल में, मजबूर, 1980 में सबूत, 1982 में सुराग, 1985 में खामोश, 1989 में नागिन, 1990 में मोर्चा, 1991 में जादूगर, 1993 में डर व इंद्रजीत, 1994 में खिलाड़ी, 1995 में हथकड़ी, 1997 में गुप्त व जहरीला, 1998 में बिच्छू व दुश्मन, 1999 में कौन नामक फिल्में काफी लोकप्रिय हुईं।

2001 में अजनबी व दीवानगी, 2002 में गायब व हमराज, 2003 में भूत व समय, 2004 में ऐतराज व एक हसीना थी, 2005 में काल व शिकार, 2006 में गैंग्स्टर व चायना टाउन, 2007 में द ट्रेन, 2008 में आमिर, अ वेडनस डे व रेस, 2011 में मर्डर 2, 2012 में तलाश, 2013 में स्पेशल 26 व उंगली, 2014 में एक विलन, 2015 में दृश्यम्, 2016 में रुस्तम व एयर लिफ्ट, 2017 में खोज आदि फिल्में इसी परंपरा में बनती रही हैं। क्रमशः

सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – एक:

rahasya 1सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – एक:

हिंदी की रहस्य और रोमांच से भरी सवाक् फिल्मों के अंतर्गत 1931 में अबुल हसन, 1932 में भूतिया महल व अलीबाबा चालीस चोर, 1933 में आब ए हयात व मायाजाल, 1934 मेंगुल सनोवर व तिलस्मी हीरा, 1935 में जादुई डण्डा व जादुई घोड़ा, 1938 में भेदी त्रिशूल, 1939 में सन आॅफ अलादीन व गुल ए बकावली, 1940 में अनार बाला व जादुई कंगन आदि अनेक फिल्में उल्लेखनीय हैं, जिन्हें काफी लोकप्रियता प्राप्त हुई।

1941 में जादुई बंधन, 1943 में भागता भूत, 1944 में जादुई किस्मत, 1945 में अलादीन, 1946 में अलीबाबा, अरेबियन नाइट्स, हूर ए बगदाद, मैजिक कैप व बगदाद का चोर, 1947 में बुलबुल ए ईरान, गुल ए बकावली, अंगूर बाला व जादुई रतन, 1948 में गैबी तलवार, जादुई चित्र, जादुई बंसरी व जादुई शहनाई, 1949 में अलादीन की बेटी, जादुई सिंदूर, भेदी बंगला, महल, तिलस्मी खंजर, माया महल आदि रहस्य-रोमांच से परिपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ।

1951 में नगीना, 1952 में बगदाद जलपरी, नीलम परी व पाताल भैरवी, 1953 में अलिफ लैला व गुल सनोवर, 1954 में लालपरी, मीनार व हूर ए अरब, 1955 में बगदाद का चोर व तातार का चोर, सन आॅफ अलीबाबा व चिराग ए चीन 1956 में अरब का सौदागर, बसरे की हूर, बगदाद का जादू व गुल ए बकावली, 1957 में माया नगरी व परिस्तान, 1958 में अलादीन का चिराग, पाताल पुरी, स्वर्ण सुंदरी, मधुमती व माया बाजार आदि फिल्में बनीं।

उक्त रहस्य रोमांच प्रधान फिल्मों के संदर्भ में श्री बी. एन. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘सवाक् भारतीय हिंदी फिल्म्स’ में लिखा है कि ‘‘ ऐसी फिल्में जो बनती आई हैं, उनमें वही घिसी पिटी शैली है – उड़ती दरी का दिखाया जाना, सिम सिम कहकर दरवाजों का खुलना, चिराग के घिसते ही विशालकाय जिन्न का प्रकट होना और कहना हू हा हा हा, मेरे आका! आदि। इससे कुछ परिष्कृत और सहज ग्राह्य रूप धार्मिक फिल्मों में दिखाया जाता है, जो फोटोग्राफी के चमत्कार का ही विकसित प्रमाण है।’’

‘‘जादुई और धार्मिक फिल्मों की फोटोग्राफी में थोड़ा सा अंतर प्रतीत होता है। जादुई फिल्मों में चमत्कार के साथ डरावनी आवाज तथा भयानक सैट दिल दहलाने वाले होतं हैं। धार्मिक फिल्मों में भगवान की असीम कृपा का चमत्कार बताया जाता है; जैसे – जल्दी जल्दी सब्जी का कटना, पकवानों का तैयार हो जाना, समुद्र में से भगवान का धरातल पर आना, आकाश मार्ग से भगवान का तथा देवी देवताओं का धरती पर प्रकट होना और संगीत की टिक टक टिक, खन खन खन ध्वनियों के साथ बारीक परंतु प्रिय आवाज का जो सामंजस्य दिया जाता है, वह निःसंदेह प्रशंसनीय ही कहा जाएगा। इसे ट्रिक फोटोग्राफी कहा गया है।’’ क्रमशः

सिनेमा: साहस प्रधान:

saahasसिनेमा: साहस प्रधान:

जहां तक हिंदी में बनी साहस प्रधान फिल्मों की बात है 1933 में हातिम ताई , शाही लुटेरा, 1935 में मिस्र का खजाना, जिंगारू, सपेरा, 1936 में जंगल क्वीन, हूर ए समंदर, मिस फ्रण्टियर मेल, 1937 में सिंहलद्वीप की सुंदरी, तूफानी टार्जन, तूफानी खजाना, 1938 में टार्जन की बेटी, मिस्टर एक्स, 1939 में जंगल किंग, जिंबो का बेटा, काल कुण्डला, 1940 में हातिम ताई की बेटी आदि बहुत पसंद की गईं।

1941 में जंगल की लड़की, तारपीडो, 1942 में जंगल प्रिंसेज, 1945 में सन आॅफ हातिम ताई, 1946 में नेडी राॅबिनहुड, जंगल की पुकार, भेदी खजाना, कंगारू, सिंदबाद द सेलर, 1947 में हातिम ताई, समुंदर की मलिका, 1948 में जंगल गाॅडेस और 1950 में जंगल मैन आदि फिल्मों का निर्माण हुआ।

1951 में खजाना, सिम्बा, 1952 में जिम्बो, जंगल जवाहर, वनराज, 1953 में गोरिल्ला, 1954 में अफ्रीका, 1955 में आदमखोर, खौफनाक जंगल, सखी हातिम, शिकार, 1956 में जंगल क्वीन, समुद्री डाकू, 1957 में जहाजी लुटेरा, समुंदर, मिस्टर एक्स, 1958 में जंगल प्रिंसेज, शान ए हातिम, जिम्बो, 1959 में जिम्बो की बेटी, जंगल किंग तथा 1960 में डाॅक्टर शैतान, सुपरमैन, रिटर्न आॅफ सुपरमैन, जिम्बो शहर में आदि फिल्में बनीं।

1961 में एलीफेण्ट क्वीन, 1962 में काला समंदर, तूफानी टार्जन, किंगकांग, 1963 में रुस्तम सोहराब, जंगल ब्वाय, फौलाद, राकेट टार्जन, शिकारी, जिंगारू, टार्जन और जादूगर, 1964 में टार्जन और जलपरी, टार्जन एण्ड डिलाइला, मारबल मैन, आंधी और तूफान, सैमसन, रुस्तम ए रोम, जग्गा, दारा सिंह, आया तूफान, हरक्युलिस, मिस्टर एक्स इन बाॅम्बे, 1965 में सन आॅफ हातिम ताई, टार्जन एण्ड सर्कस, एडवेंचर्स आॅफ राॅबिनहुड, खूनी खजाना, सात समंदर पार, टार्जन एण्ड किंगकांग, बाॅक्सर, खाकान, राका, शेरदिल, संग्राम, टार्जन कम्स टू डेल्ही नामक फिल्मों ने पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की।

1966 में इंसाफ, जवां मर्द, खून का खून, नौजवान, रुस्तम ए हिंद, दादा, ठाकुर जरनैल सिंह, रुस्तम कौन, टार्जन की मेहबूबा, जिम्बो का बेटा, 1969 में टार्जन इन फेयरी लैण्ड, आदि फिल्में बनीं तो 1972 में पहली डरावनी फिल्म – दो गज जमीन के नीचे, 1973 में विक्टोरिया नंबर 203, डाॅ0 एक्स, जुगनू, 1978 में इंस्पेक्टर ईगल, 1980 में द ग्रेट गेंबलर, द बर्निंग ट्रेन, सुरक्षा, 1990 में शिवा, 1991 में दरार, 1993 में बाजीगर, 1994 में इंटरनेशनल खिलाड़ी, 1997 में हिम्मत आदि फिल्मों का बोलबाला रहा।

नई सदी में 2001 में लगान व दिल चाहता है, 2002 में कंपनी, 2003 में गंगाजल व हंगामा, 2994 में स्वदेस व खाकी, 2005 में मंगल पाण्ड व ब्लैक, 2006 में रंग दे बसंती, 2007 में शूटआफउट एट लोखण्डवाला व चक दे इ्रडिया, 2008 में आमिर व अ वेड्नस डे, 2009 में थ्री ईडियट्स, 2010 में पीपली व राजनीति, 2011 में गैंग्स आॅफ वासेपुर, 2012 में पान सिंह तोमर,जैसी फिल्मों का सिलसिला लगातार जारी है। क्रमशः

सिनेमा: साहसिक:

saahsikसिनेमा: साहसिक:

किसी असाधारण काम को दृढ़तापूर्वक करने की प्रवृत्ति साहस कहलाती है। मानव मन में यह प्रवृत्ति सृष्टि के प्रारंभ से ही पाई जाती है। शुरू में जंगलों में संघर्षरत मानव के उत्साह और जीने के लिए जानवरों का शिकार करने की आवश्यकता ने ही साहस को लगातार बढ़ाया होगा। तब संभवतः मानव ने भावना की अपेक्षा साहस और पिचार की अपेक्षा बल पर अधिक भरोसा किया होगा और अब सामान्य स्थितियों में यद्यपि बल की अपेक्षा बुद्धि को अधिक महत्व दिया जाने लगा है, तथापि कठिन परिस्थितियों में बल और साहस ही काम आते हैं।

साहसी लोगों की कहानियां केवल हमारे देश में ही नहीं, दुनिया के हर मुल्क में बड़े चाव के साथ कही और सुनी जाती है; क्योंकि उनके श्रोता उन कहानियों के नायक में स्वयं को समाहित करते हुए कथाधारा के साथ आगे बढ़ते हैं और कोई भी समस्या आने पर पूरे साहस के साथ उसका हल सोचते चलते हैं। कहानी का उद्देश्य पूरा होने तक यह प्रवृत्ति बिलकुल शांत नहीं होती।

1920 से 1930 के मध्य मूक सिनेमा के जमाने में बनी साहसिक फिल्मों में भेदी सवार, पंजाब मेल, इंतकाम, दगाबाज दुश्मन, खूनी खंजर, थीफ आफ देहली, शेरदिल, खूनी कौन, हिंद केसरी, मायानगरी, बुलबुल ए परिस्तान, गुल ए बकावली, चार दरवेश, थीफ आॅफ ईराक, फेयरी आॅफ सिंहलद्वीप, हूर ए अरब, हूर ए बगदाद, चिराग ए कोहिस्तान, माया महल, जादुई बंसरी, बंसरी वाला, शाही जंगल, शाही फरमान, बंगाल का जादूगर के नाम प्रमुख हैं।

इन फिल्मों में से किसी में नायक के साहसिक कारनामें हैं, किसी में नायक के साहस के साथ रहस्य रोमांच अधिक है तो किसी में नायक के साहस के साथ अपराध भी मिश्रित है। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए इस कोटि की सवाक् फिल्मों को तीन विशेष वर्गों में विभाजित किया जा सकता है – साहस प्रधान, रहस्य रोमांच प्रधान तथा अपराध प्रधान। आगे इन्हीं वर्गों के अंतर्गत हिंदी में बनी साहसिक फिल्मों का विवरण प्रस्तुत किया जाएगा। क्रमशः

नई सदी की प्रेमकथाएं:

nai sadiनई सदी की प्रेमकथाएं:

जहां तक नई सदी की प्रेम प्रधान फिल्मों की बात है 2001 में बरसात, रहना है तेरे दिल में, चोरी चोरी चुपके चुपके, कभी खुशी कभी गम, गदर, तुम बिन, स्टाइल, 2002 में देवदास, साथिया, मैंने दिल तुझको दिया, कर्ज, 2003में तेरे नाम, मैं प्रेम की दिवानी हूं, कुछ ना कहो, कल हो न हो 2003 में मुन्ना भाई एम बी बी एस, रन, 2004 में हम तुम, वीर जारा, 2005 में क्यों कि, पहेली, आशिक बनाया आपने, बेवफा, 2006 में विवाह, हमको दिवाना कर गए, मेरे जीवन साथी, बस एक पल, 2007 में जब वी मेट, नमस्ते लंदन, ओम शांति ओम, सलाम ए इश्क, 2008 में रब ने बना दी जोड़ी, एक विवाह ऐसा भी, किस्मत कनेक्शन, 2009 में लव आजकल, अजब प्रेम की गजब कहानी, डेल्ही 6, तुम मिले,2010 में बैण्ड बाजा बारात और अनजाना अनजानी का बहुत बोलबाला रहा।

श्री ललित जोशी ने अपनी पुस्तक ‘हाउस फुल’ में लिखा है कि ‘ महानगरीय संस्कृति को पृष्ठभूमि में रखकर बनाई गई इन फिल्मों का हीरो कसरती बदन वाला ‘माचो’ युवक है तथा देह प्रदर्शन से न चूकने वाली ‘हेप’ युवतियां। विदेशी लोकेशन्स पर फिल्माए गए गानों की लय पर थिरकते हीरो हीरोइन की सबसे बड़ी कद्रदान उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में पली बढी नई पीढ़ी है। उसकी भाषा वही है, जो उसके चहेते सितारों की है – यानि कि हिंदी और अंग्रेजी के फूहड़ सम्मिश्रण से बनी हिंगलिश। वह पुराने गीतों के शौकीन हैं। भले ही उन्हें ‘रीमिक्स’ करके प्रस्तुत किया जाए।’

2011 में तनु वेड्स मनु, रेडी, बाॅडी गाॅर्ड, मौसम, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, 2012 में जब तक है जान, एक था टाइगर, काॅकटेल, 2013 में आशिकी 2, राम लीला, रांझना, ये जवानी है दिवानी, लुटेरा, 2014 में टू स्टेट्स, हंसी तो फंसी, हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया, 2015 में तमाशा, दिलवाले, तनु वेड्स मन रिटन्र्स, शानदार, बाजी राव मस्तानी, 2016 में डियर जिंदगी, रुस्तम, की एण्ड का, ए दिल है मुश्किल, 2017 में जब हैरी मेट सैजल, टाॅयलेट – एक प्रेम कथा, बद्रीनाथ की दुल्हनिया, मुबारकां, 2018 में पद्मावत, धड़क, लवयात्री, अंधाधुन, केदारनाथ, बत्ती गुल मीटर चालू, मनमर्जियां, नवाबजादे, बरेली की बरफी 2019 में राजी, मलाल, ड्रीमगर्ल, लुकाछिपी, दे दे प्यार दे, स्टूडेण्ट आॅफ द इयर 2 आदि प्रेम प्रधान फिल्में दर्शकों को देखने को मिलीं।

आजकल कंेवल पुराने गीतों का ही नहीं, अब तो पुरानी फिल्मों का भी पुनर्सजन किया जा रहा है। एन. आनंदी ने 25 जनवरी 2003 के ‘अमर उजाला’ के रंगायन स्तंभ में लिखा कि ‘‘बात गलत नहीं है, नया नौ दिन और पुराना सौ दिन। नए दौर की फिल्में देखिए तो कितने दिन याद रहती हैं। वहीं पुरानी फिल्मों की बात करें , तो दीवाने दर्श्रकों पर जैसी मदहोशी छाने लगती है। बाॅलीवुड पर भी इन दिनों पुरानी फिल्मों का ऐसा ही कुछ नशा तारी है। भंसाली की ‘देवदास’ का एक मात्र मन्त्र था ‘भव्यता’। तो पुरानी क्लासिकों को फिल्माते वक्त भी इसी का ध्यान रखा जाएगा। पिछले दिनों तीन बड़ी फिल्मों ‘साहब बीवी और गुलाम’ 1962, ‘काबुली वाला’ 1961 और ‘मुगल ए आजम’ 1069 को रिमेक करने की बात सामने आई है।’’ क्रमशः

सिनेमा: पैंसठ के बाद का प्रेम:

paisath ke baadसिनेमा: पैंसठ के बाद का प्रेम:

प्रेम प्रधान फिल्मों के अंतर्गत 1965 में यादें के अलावा गजल, रात और दिन, भीगी रात, गाइड, मेरे सनम, जब जब फूल खिले, नीला आकाश; 1966 में प्यार किए जा, दिल दिया दर्द लिया, एराउण्ड द वल्र्ड, तीसरी कसम, 1967 में पवि़त्र पापी, पड़ोसन, दीवाना, चिराग, सुहाना सफर, एन इवनिंग इन पेरिस, मिलन, ब्रह्मचारी; 1968 में मेरे हुजूर, झुक गया आसमां, हसीना मान जाएगी, शागिर्द, तुमसे अच्छा कौन है; 1969 में सपनों का सौदागर, आराधना, मन का मीत, अनमोल मोती, सावन भादौं; 1970 में शर्मीली, सच्चा झूठा, पहचान, शराफत, हमजोली, तलाश, मेरा नाम जोकर आदि फिल्में बनीं।

1971 में हम तुम और वो, आप आए बहार आई, मर्यादा, आन मिलो सजना, कटी पतंग, महमूब की मेंहदी; 1972 में रामपुर का लक्ष्मण, अमर प्रेम, बनफूल, तांगे वाला; 1973 में एक नजर, दाग, लोफर, चोर मचाए शोर, बाॅबी, सौदागर, दो फूल, नैना; 1974 में प्रेमनगर, प्रेमपर्वत, यादों की बारात, अमीर गरीब, प्रेमशास्त्र; 1975 में जूली, रफूचक्कर, रजनीगंधा, मिली; 1976 में कभी कभी, चितचोर, महबूबा, दो अनजाने; 1977 में चला मुरारी हीरो बनने, अमर अकबर एण्थोनी; 1978 में कस्में वादे, देवता, देस परदेस, सत्यं शिवम्, सुंदरम्; 1979 में बातों बातों में और नूरी तथा 1980 में कर्ज व आशा वगैरह फिल्मों ने बहुत लोकप्रियता हासिल की।

1981 में नसीब, याराना, 1982 में ये नजदीकियां, मासूम, दीदार ए यार, 1983 में अगर तुम न होते, शराबी, बेताब, एक दूजे के लिए, 1985 में राम तेरी गंगा मैली, हीरो, 1986 में हीरो हीरा लाल, अर्जुन पण्डित, मैं और तुम, दूध का कर्ज, 1987 में मि. इण्डिया, 1988 में सोहनी महिवाल, कयामत से कयामत तक, 1989 में मैंने प्यार किया, चांदनी, शोला और शबनम, इश्क इश्क इश्क एवम् 1990 में आशिकी व दामिनी आदि फिल्मों का काफी बोलबाला रहा।

1991 में फूल और कांटे, सड़क, साजन, 1992 में खुदा गवाह, माशूक, सनम बेवफा, 1993 में अनाड़ी, फिर तेरी कहानी याद आई, डर, चमेली की शादी, दिल आशना है, 1994 में हम आपके हैं कौन, हेलो ब्रदर, मेंहदी, हद कर दी आपने, कभी हां कभी ना, बादल, 1995 में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, आओ प्यार करें, अंदाज अपना अपना, राजा भइया, 1996 में राजा की आएगी बारात, अग्निसाक्षी, कुली नं. वन, हीरो नं. वन, 1997 में जीत, दरार, राजा हिंदुस्तानी, 1998 में करीब, डुप्लीकेट, कुछ कुछ होता है, दिल तो पागल है, 1999 में ताल, कहो ना प्यार है, राम जाने, हम दिल दे चुके सनम तथा 2000 में अफसाना प्यार का, मोहब्बतें, गज गामिनी, जानम समझा करो नामक फिल्में रिलीज हुईं। क्रमशः

सिनेमा : प्रेम प्रधान :

images (1)सिनेमा : प्रेम प्रधान :

जहां तक हिंदी की प्रेम प्रधान फिल्मों की परिपाटी का सवाल है, 1931 में लैला मजनू और शीरी फरहाद, 1932 में ससी पुन्नू और हीर रांझा, 1933 में सोहनी महिवाल और प्रेम का नशा, 1934 में प्रेम परीक्षा और अनोखा प्रेम, 1935 में देवदास और दर्द ए उल्फत, 1936 में संगदिल और स्ट्रीट सिंगर, 1937 में प्रेम कहानी और आशा, 1038 में बागवान और प्रेम बंधन, 1939 में दिल ही तो है और प्रेम सागर तथा 1940 में प्रेम नगर और सिविल मैरिज उल्लेखनीय रहीं।

1941 में परदेसी और मेरे साजन, 1942 में प्रीतम और नजराना, 1943 में दिल्लगी और मोहब्बत की जीत, 1944 में पहली नजर और ज्वार भाटा, 1945 में गजल और अनमोल घड़ी, 1946 में मेघदूत और साजन, 1947 में रोमियो जूलियट और दो दिल, 1948 में अनोखा प्यार और खिड़की, 1949 में अनोखी अदा और अंदाज तथा 1950 में बावरे नैन और जान पहचान आदि प्रेम प्रधान फिल्में बनीं।

1951 में अफसाना और मल्हार, 1952 में नौबहार और बैजू बावरा, 1953 में आह और दिल ए नादां, 1954 में आर पार और झनक झनक पायल बाजे, 1955 में मुनीम जी और मिस्टर एण्ड मिसेज 55, 1956 में चोरी चोरी और बसंत बहार, 1957 में गूंज उठी शहनाई और लव मैरिज, 1958 में चलती का नाम गाड़ी और फागुन, 1959 में अनाड़ी और दिल अपना और प्रीत पराई तथा 1960 में चौदहवीं का चांद और दिल भी तेरा हम भी तेरे आदि के नाम प्रमुख हैं।

1961 में जब प्यार किसी से होता है और नजराना, 1962 में प्रोफेसर और गीत गाया पत्थरों ने, 1963 में मेरे मेहबूब और फिर वही दिल लाया हूं, 1964 में आओ प्यार करें और हिमालय की गोद में के बाद ‘‘ एक नई प्रायोगिक फिल्म सुनील दत्त की ‘यादें’ फिल्म जगत में अपना विशेष महत्व रखती है। इस प्रकार की फिल्म पहले कभी भी नहीं बनी।अब तक तो फ्लैश बैक सिस्टम के माध्यम से पूर्व घटित घटना को पात्रों सहित दिखाया जाता था, जिसमें एक पात्र दूसरे पात्र से पीछै की बात कहता, तो उस बात को प्रकाश के वृत्त बनाकर साकार रूप दिया जाता था।’’

उक्त उद्धरण के लेखक श्री बी. एन. शर्मा जी ने अपनी पुस्तक ‘सवाक् भारतीय हिंदी फिल्म्स’ में लिखा है कि यादें ‘गीत विहीन एकपात्रीय फिल्म डेढ़ घण्टे की बनाई, जिसके पात्र सुनील दत्त स्वयं हैं। जिसको किसी घटना की पूर्व स्मृति होती है, वह घटना सामने नहीं आती, बल्कि सुनील दत्त के भावों के माध्यम से अबोध रूप से घटती है। जिसका दर्शकों को अप्रस्तुत पात्रों की अलग अलग आवाज से अनुभव होता है।’ क्रमशः

सिनेमा : साठ के बाद :

saath ke baadसिनेमा : साठ के बाद :

परिवार प्रधान फिल्मों की परिपाटी में 1961 में भाभी की चूड़ियां, मेम दीदी तथा मॉडर्न गर्ल, 1962 में मेंहदी लगी मेरे हाथ, शादी तथा मैं चुप रहूंगी, 1963 में बहूरानी, घर बसा के देखो तथा सेहरा, 1964 में पूजा के फूल, मैं भी लड़की हूं तथा शगुन, 1965 में बहू बेटी, वक्त तथा खानदान, 1966 में देवर, ममता तथा दादी मां, 1967 में दस लाख, हरे कांच की चूड़ियां तथा एक फूल दो माली, 1968 में नीलकमल, दो कलियां तथा तीन बहूरानियां, 1969 में बड़ी दीदी, होली तथा वारिस, 1970 में मां का आंचल, ममता तथा गोपी आदि फिल्मों के नाम उल्लेखनीय हैं।

1971 में पूरब और पश्चिम, लाखों में एक और मैं सुंदर हूं, 1072 में पराया धन, पिया का घर और भाई हो तो ऐसा, 1973 में धुंध, 1974 में कोरा कागज, और आपकी कसम, 1975 में छोटी सी बात और चुपके चुपके, 1976 में वैराग, 1977 में परवरिश, घरौंदा और अपना खून, 1978 में पति पत्नी और वो, मैं तुलसी तेरे आंगन की, दुलहन वही जो पिया मन भाए और अंखियों के झरोखे से, 1979 में नौकर, अमर दीप और आंगन की कली, 1980 में थोड़ी सी बेवफाई, सौ दिन सास के, खूबसूरत और सुहाग आदि फिल्में पर्याप्त लोकप्रिय हुई।

1982 में प्रेम रोग व निकाह, 1983 में भावना व आदमी और औरत, 1986 में नसीब अपना अपना, 1988 में घर घर की कहानी व श्रद्धांजलि, 1992 में बेटा, 1994 में आज की औरत, 1995 में चालबाज, 1996 में बीवी नंबर वन व होगी प्यार की जीत, 1997 में विरासत व इनकाउण्टर, 1998 में चाची 420, 1999 में रामअवतार व जिस देश में गंगा रहता है, 2000 में सूर्यवंशी, जमाई राजा, किशन कन्हैया व खामोशी, 2001 में कभी खुशी कभी गम, 2002 में मेरे यार की शादी है व मुझसे दोस्ती करोगे और 2004 में बागवां आदि फिल्में बनीं।

26. 12. 2004 के राष्ट्रीय सहारा अखबार के – सण्डे उमंग – पृष्ठ 4 में चंद्रकांत शिन्दे ने लिखा कि‘नंगेपन से भरी फिल्मों के माहौल में ‘बागवां’ ने एक खुशनुमा माहौल का निर्माण किया। बूढ़े नायक नायिका की यह फिल्म दर्शकों को रुलाने और सोचने पर मजबूर कर गई। अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी फिल्म के नायक नायिका थे। बच्चे बड़े होने पर किस तरह माता पिता को दुत्कारते हैं, उसकी बहुत ही अच्छी कहानी रवि चोपड़ा ने पर्दे पर उतारी थी। फिल्म की सफलता ने साबित कर दिया कि दर्शक सिर्फ नंगापन ही नहीं, बल्कि अच्छी और स्तरीय फिल्मों को भी स्वीकार करते हैं।’ क्रमशः

सिनेमा: पारिवारिक:

parivarikसिनेमा: पारिवारिक:

श्री ब्रजेश्वर मदान ने अपनी पुस्तक ‘सिनेमा नया सिनेमा’ के पृष्ठ 12 में लिखा है कि ‘ फिल्म देखने से पहले जिन फिल्मों की कहानियां पिताजी ने हमें सुनाई थी, उनमें एक फिल्म जेमिनी की संसार थी। इस फिल्म की हीरोइन आज की प्रसिद्ध हीरोइन रेखा की मां पुष्पावली थीं। यह फिल्म पिताजी को इसलिए पसंद आई कि उसमें परिवार के सदस्यों का एक दूसरे से गहरा प्यार दिखाया गया था। वह सुनाते हैं कि कैसे परिवार बिछुड़ता है, मिलता है और परिवार के सब सदस्य एक दूसरे के लिए किस तरह जान देने को तैयार हैं।’

इस फिल्म से पहले 1931 में थर्ड वाइफ, गृहलक्ष्मी, हठीली दुल्हन; 1933 में सौभाग्य सुंदरी; 1935 में क्वांरी और विधवा, बहन का प्रेम, घर जमाई, शादी की रात, स्त्रीधर्म; 1936 में ममता, लग्नबंधन, मां, मां की ममता, सुहाग का दान; 1937 में अनाथ आश्रम, औरत की जिंदगी, कुलबधू; 1938 में भाभी, डाइवोर्स; 1939 में कंगन, पति पत्नी; 1940 में बहूरानी, घर की रानी, सोहाग, आंधी आदि फिल्में बनीं।

1941 में सौभाग्य, चरणों की दासी, बहन, खजांची, ससुराल, शादी; 1942 में खानदान, लाजवंती, ममता; 1943 में भाईचारा, दुलहन, पति पूजा, अमानत; 1944 में मेरी बहन, भाई, मां बाप, बड़ी मां, कुल कलंक, घर; 1945 में दादा जी, घूंघट, देवर, नई मां; 1946 में दूल्हा, लाज, ग्वालन, सालगिरह, बाप, बहन बेटियां, बिंदिया, दासी और मां; 1947 में दो भाई, डोली, दूसरी शादी, घर की बहू, मंगल सूत्र, मेंहदी, मेरा सुहाग, पति सेवा; 1948 में दीदी, घरबार, घर की इज्जत, गृहस्थी, काजल, मेरा मुन्ना, मेरी भाभी, महल, दहेज; 1949 में छोटा भाई, बड़ी बहन, घराना, गृहलक्ष्मी, जन्मपत्री, मां का प्यार, ननद भौजाई, राखी, सुहागरात; 1950 में बाबुल, हमारा घर, हमारी बेटी, नई भाभी, भाई बहन, बहूरानी, छोटी भाभी आदि फिल्मों का निर्माण हुआ।

1951 में संसार और संस्कार, 1952 में बहू बेटी और ममता, 1953 में घरबार और दायरा, 1954 में पहली तारीख और औलाद, 1955 में जोरू का भाई और खानदान, 1956 में काबुलीवाला और दिया और तूफान, 1957 में भाभी और बड़ी बहू, 1958 में सुहाग और परवरिश, 1959 में छोटी बहन और लाजवंती, 1960 में मेरा घर मेरे बच्चे और मां बाप आदि फिल्में बहुत ज्यादा पसंद की गईं।

‘सवाक् भारतीय हिंदी फिल्म्स’ के लेखक श्री बी. एन. शर्मा के शब्दों में 1963 में बनी‘ये रास्ते हैं प्यार के नामक फिल्म एक अभूतपूर्व घटना – नानावटी काण्ड – को लेकर बनाई गई, जिसमें सुनील दत्त, रहमान और लीला नायडू ने जीवंत अभिनय प्रस्तुत किया।नौसेना के एक परिवार विशेष की यह एक जबरदस्त प्रणय कथा थी, जो उन दिनों प्रत्येक समाचार पत्र में चर्चा का विषय बनी हुई थी।’ क्रमशः

सिनेमा: सवाक् सामाजिक 03

savaak 3सिनेमा: सवाक् सामाजिक 03

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में 1981 में लावारिस, मेरी आवाज सुनो, आधार शिला; 1982 में नमक हलाल, अर्थ, कथा, खारिज,सतह सक उठता हुआ आदमी; 1983 में मण्डी, खण्डहर, होली; 1984 में जाने भी दो यारो, हम रहे न हम, कहां तक आसमान है, मशाल, मोहन जोशी हाजिर हो, अंधी गली, अर्धसत्य; 1985 में शर्त, गुलामी, त्रिकाल, परिणति, आघात, न्यू डेल्ही टाइम्स; 1986 में नाम, ईमान धरम, बवण्डर, मैसी साहब, एक पल; 1987 में आग ही आग, तरंग, पेस्टनजी, प्रतिघात; 1988 में खुदगर्ज, सलाम बाॅम्बे, उन्नी, एक दिन अचानक, खयाल गाथा; 1990 में अवतार, दिशा, दृष्टि, कस्बा, लेकिन व नजर काबिल ए तारीफ रहीं।

1991 में अमृत, बुलंदी, टकसाल, गुप्त, दिलवाले, ईडियट; 1992 में चैराहा, चमत्कार, सूरज का सातवां घोड़ा; 1993 में विजय पथ, मिस विटीज चिल्ड्रन, जयगंगा; 1994 में पुष्पा, नाजायज, दलाल, तर्पन; 1995 में द मेकिंग आॅफ महात्मा; 1996 में गैर, चल मेरे भाई, तू चोर मैं सिपाही, चांद ग्रहण, चांदनी बार, घटक, संदोशन; 1997 में सर, मृत्युदण्ड, कुदरत, बेदर्दी, डांस आॅफ द विण्ड, शैडोज इन द डार्क; 1998 में सत्यमेव जयते, भाई, तवायफ; 1999 में जानी दुश्मन; 2000 में कब्जा, संघर्ष आदि फिल्मों का निर्माण हुआ।

नई सदी में 2001 में दिल चाहता है, खेल, रुद्राक्ष, सलाखें, दाग, रांग नंबर, मोक्ष, चमेली, बाॅलीवुड काॅलिंग; 2002 में अग्निचक्र, आवारा पागल दीवाना, जाल, युग पुरुष, कगार, गंगाजल, जुबैदा, मानसून वैडिंग; 2003 में कर्ज, मुंबई मेटिनी, मार्केट, मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं, डरना मना है, मिस्टर एण्ड मिसेज एैयर, मैं प्रेम की दीवानी हू, मुंबई से आया मेरा दोस्त, भूत, कोई मिल गया, अरमान, दम, अब तक छप्पन, मुन्नाभाई एमबीबीएस; 2004 में स्वदेश, लकीर, मीनाक्षी, मकबूल, मातृभूमि, जूली, न तुम जानो न हम, ऐलान, तौबा तौबा, सत्य बोल, बाजार ए हुस्न, खामोशी और 2005 में ब्लैक आदि फिल्में बनीं।

2006 में ओंकारा, खोसला का घोसला, रंग दे बसंती, डोर, लगे रहो मुन्ना भाई; 2007 में तारे जमीं पर, जब वी मेट; 2008 में ओए लकी ! लकी ओए, फिराक, गुलाल, अ वेडनसडे; 2009 में देव डी और थ्री ईडियट्स; 2010 में लव सेक्स और धोखा, शोर इन द सिटी, उड़ान, पीपली लाइव, गुजारिश; 2011 में जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, रेडी, बाॅडी गार्ड, शागिर्द, फोर्स; 2012 में कहानी, पान सिंह तोमर, विकी डोनर, रूाहीद, गैंग्स आॅफ वासेपुर; 2013 में बाॅस, चेन्नई एक्सप्रेस, स्पेशल 26, जौली एलएलबी; 2014 में सिंघम रिटन्र्स, किक, इंटरटेनमेण्ट, हीरोपंती, पी के; 2015 में अलीगढ़, तितली, मसान, दम लगाके हाईशा, दृश्यम्; 2016 में पिंक और दंगल, सुल्तान, शिवाय, अकीरा; 2017 में मुक्तिभवन, रईस, ट्यूब लाइट, टाइगर जिंदा है; 2018 में स्त्री, पद्मावती, पैडमैन, रेस 3, सिंबा तथा 2019 में आर्टिकल 15, वार, कबीर सिंह, केसरी आदि फिल्में उल्लेखनीय हैं। क्रमशः