कथ्य और शिल्प :

kahnaसाहित्य : कथ्य और शिल्प

शिल्प प्रधान कहानियों में पात्र-परिवेश या भाषा-शैली द्वारा किसी भावना की स्थापना
तो हो जाती है, पर संवेदना का अभाव बना रहता है। ऐसी कहानी के शिल्प विश्लेषण
में संवेदना की खोज करने वाले समीक्षक प्रयोगवाद के नाम पर कहानीकार की प्रशंसा
में भले ही चार चांद लगा दैं, पर संवेदना हीन कहानी बिना चांद की रात से बढ़कर
नहीं होती।

अधुनातन कहानियों ने कथ्य और शिल्प के संबंध को सही मायनों में निभाने का प्रयास
किया है। परिवेश के अनुरूप अगर कभी कथ्य ने परंपरा से हटना चाहा तो शिल्प ने भी
नएपन से परहेज नहीं किया। फिर भी वास्तविकता यही है कि काल्पनिक नवीनता भी
तत्काल चमत्कृत कर सकती है, लंबे समय तक प्रभावित नहीं कर पाती।

पाठक केवल कथ्य (क्या कहा गया) से ही द्रवित नहीं होता, शिल्प (कैसे कहा गया) से भी

प्रभावित होता है। इसके बाद नंबर आता है कहानीकार (कहने वाले) का। इससे कोई
फर्क नहीं पड़ता कि वह नया है या पुराना। उसे लुभाता है ‘क्या’ और ‘कैसे’ का संतुलित
समन्वय। उसके लिए सहज शिल्प के माध्यम से सजीव कथ्य को कहना ही कहानी है।

अकहानी :

akahaniसाहित्य : अकहानी :

इसके बाद कहानी कभी व्यक्तिवादी विद्रोह भंगिमा की तरफ मुखातिब हुई और
कभी यौन संबंधों की तरफ, लेकिन ये दिशाएं भी उसे खास रास नहीं आईं।
फिर सचेतन कहानी का आंदोलन उसे न केवल आम आदमी तक ले गया,
बल्कि उसके परिवेश के साथ भी जोड़ता रहा। इसलिए वह जन सामान्य के
अभावों, संघर्षों, विवशताओं, समस्याओं या प्रयासों के साथ घुल मिल कर
आगे बढ़ी।

इस बीच समाजवादी, जनवादी यहां तक कि अकहानी जैसा कोई भी नाम हिंदी
कहानी ने क्यों न रख लिया हो, पर उसकी भाव धारा भारतीय जीवन दर्शन तथा
सामाजिक यथार्थ के बीच ही प्रवाहित होती रही। प्रेमचंद की परंपरा में प्रगतिशील
यथार्थवादी कहानियों का शिल्प अपने कथ्य के अनुरूप उभर कर सामने आता रहा।

मनोविश्लेषणवादी कहानियों का अपने नूतन कथ्य के लिए अभिनव शिल्प की ओर
उन्मुख होना अस्वाभाविक नहीं था, लेकिन कथ्य और शिल्प का सहज निर्वाह न
होने पर कहानी का समग्र प्रभाव शिथिल पड़ जाता है। एक पहिए वाली गाड़ी की
तरह केवल शिल्प को परिमार्जित करते हुए कथाधारा को आगे बढ़ाने वाले कहानीकार
इसकी नैसर्गिक प्रगति को गति नहीं दे पाए।

प्रेमचंद :

premchandसाहित्य : प्रेमचंद :

प्रेमचंद ने गौरवशाली अतीत के आदर्श की अपेक्षा अभावग्रस्त वर्तमान के
यथार्थ को अपना कथ्य बनाना बेहतर समझा। उनके इस निर्णय से कहानी
न केवल अपने समाज से जुड़ी, बल्कि उसे पनपने के लिए सही जमीन भी
हासिल हुई। इस निम्न मध्यम वर्गीय जमीन के खुरदरेपन में साहित्यिक
सौंदर्य का जो अकूत भण्डार हाथ लगा, उसे पाकर अन्य कहानीकार भी
समृद्ध हुए।

प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को कथ्य की दृष्टि से ही नहीं, शिल्प की दृष्टि से
भी हिंदुस्तान के ताजातरीन संदर्भों से जोड़ा। जन प्रचलित भाषा में काल्पनिक
भावुकता से बचते हुए उन्होंने शोषकों व शोषितों की वस्तुस्थिति का चिट्ठा
खोला। नतीजतन उनके बाद के कहानीकारों की कहानियां भी अपने परिवेश
के लोगों की चेतना एवं व्यंजना से बंधीं रहीं।

आजाद मुल्क की नई कहानी में किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर
केवल परिवेशगत सत्य को महत्व दिया गया। अतः महानगर, शहर, कस्बे
और गांव के चरित्र व उनके जीवन यथार्थ अत्यंत प्रामाणिकता के साथ कहानी
का अंग बने; जिनमें यदा कदा नए जीवन मूल्यों के साथ साथ आने वाले
सुनहरे कल का सपना भी झलकता था, पर यह सिलसिला भी ज्यादा दिनों
तक नहीं टिक पाया।

कहानी :

kahaniसाहित्य : कहानी :

आमतौर पर साहित्य के दो रूप दिखाई देते हैं – पद्य एवं गद्य। इन रूपों
के अंतर्गत भी आकार प्रकार के आधार पर अनेक भेद किए जाते हैं। गद्य
की विधाओं में नाट्य साहित्य, स्मारक साहित्य और कथा साहित्य जैसा
वर्गीकरण उपलब्ध होता है। कथा साहित्य में मुख्यतः इन विधाओं की
गणना की जाती है – उपन्यास, लघुकथा और कहानी।

कहानी का शिल्प, किसी फिल्मी गीत की धुन की तरह नहीं होता,
जिसके सांचे में गीतकार वांछित कथ्य समायोजित करता है। वह तो
कहानी के कथ्य के अनुरूप स्वतः पल्लवित होता है, जैसे किसी पदार्थ
पर मूर्तिकार की कल्पना साकार होती है। कहानीकार का संप्रेषण जितना
सहज होता है, कहानी उतनी ही अच्छी बनती है। कहानी जितनी अच्छी
बनती है, कहानीकार भी उतना ही अच्छा बन जाता है।

अच्छे कहानीकार प्रेमचंद से पहले की कहानियों को प्रायः बहुत गंभीरता
से नहीं आंका जाता, पर उनमें भी भारतीय जीवन मूल्यों की गरिमा का
अभाव नहीं है। भाषा शैली की दृष्टि से यदि उनमें अपेक्षित प्रौढ़ता नजर
नहीं आती, तो इसका कारण यह है कि उन दिनों हिंदी कहानी के साथ
साथ हिंदी भाषा भी अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रही थी।

आंचलिकता :

aanchlikसाहित्य : आंचलिकता :

साहित्य को समाज का आईना इसलिए कहा जाता है, क्योंकि
उसकी कल्पना में समाज का सच भी नजर आता है। कथा
साहित्य में इसे वर्णित करने के लिए सामाजिक परिवेश को
एक खास अंदाज में अपनाने और दिखाने का विशेष आग्रह रहा
है। समय समय पर परिवेश में होने वाले परिवर्तन रचनाकालीन
संस्कृति का स्वरूप भी प्रकट करते हैं, अतः आरंभ से ही कथा
साहित्य के प्रमुख तत्वों में देश काल और वातावरण का विशेष
महत्व रहा है।

कथा साहित्य में ग्राम्य समाज की झांकियों का अभाव नहीं है,
पर अंचल विशेष के रहन सहन, असन वसन के अतिरिक्त कतिपय
भाषिक तत्व इस बात का आभास कराते हैं कि कथा साहित्य के
पात्रों के परिवेश में उनकी आंचलिक संस्कृति भी झलकती है। वस्तुतः
अलग अलग कालों में देश के विभिन्न अंचलों के आर्थिक, सामाजिक
परिवर्तनों से वहां का वातावरण भी प्रभावित हुआ, जिसका परिचय
कथा साहित्य के पात्रों के परिवेश, व्यवहार एवं संवाद के माध्यम से
अनायास ही मिलता है।

प्रवृत्तिगत परिवर्तन के आधार पर यद्यपि अलग अलग विद्वानों द्वारा
अद्यावधि हिंदी कथा साहित्य को अनेक युगों, चरणों या वादों में
विभाजित किया जाता रहा है, तथापि उसमें आंचलिक संस्कृति की
एक अनवरत अंतर्धारा युगीन प्रभाव सहित आद्योपांत प्रतिष्ठित है।
सामाजिक या राजनीतिक ढांचे में बदलाव के समानांतर हिंदी कथा
साहित्य की उपर्युक्त अंतर्धारा में समाहित इस सांस्कृतिक परिवर्तन के
क्रमशः एवं विधिवत् अनुशीलन का कार्य होना बाकी है।

कथा साहित्य :

kathaसाहित्य : कथा साहित्य :

साहित्य एक शांत नदी की तरह अग्रसर होता है। अपने प्रवाह की निरंतरता में जिस
प्रकार नदी कभी कठोर चट्टानों से टकराती हुई, कभी जंगलों के बीच गूंजती हुई और
कभी समतल क्षेत्र में छलछलाती हुई अनेक रूप धारण करती है; उसी प्रकार साहित्य
भी विभिन्न मनःस्थितियों अथवा विविध परिस्थितियों में नाना रूप धारण करता हुआ
सदैव गतिशील रहता है।

कहानी को साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा माना जाता है। इनके माध्यम से हम
समाज के विभिन्न प्रकार के पात्रों के चरित्रों के विशिष्ट व्यवहार से अवगत होते हैं। इस
व्यवहार में पात्रों के विचारों और भावों के अतिरिक्त हमें उनके परिवेश की झांकी भी दिखती
है, जिसके माध्यम से कथा साहित्य के पाठक किसी समाज की खास संस्कृति से परिचित
होते हैं।

हिंदी कथा साहित्य का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के
भारतेंदू युग में गद्य की अन्य विधाओं के साथ साथ कहानी और उपन्यास की भी आधारशिला
रखी गई। द्विवेदी युग में सम्यक् रूप से इनकी भाषा का भण्डार भी समृद्ध हुआ। इस युग के
बाद हिंदी गद्य साहित्य को पुष्पित पल्लवित करने वाले साहित्यकारों में प्रेमचंद, प्रसाद, रामचंद्र
शुक्ल जैसे नामों की लंबी सूची है।

साहित्यकार

 

sahitya

 

स्वंतंत्र भारत के कुमाउनी साहित्यकारों में ब्रजेन्द्र लाल साह, चारुचंद्र पाण्डे,
शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, पार्वती उप्रेती, जयंती पन्त, गिरीश तिवाड़ी,
वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, डा.शेर सिंह बिष्ट, डा. हयात सिंह रावत
आदि तमाम नामों की लम्बी सूची बनाई जा सकती है; जिन्होंने अपनी
प्रतिभा द्वारा इस भाषा को न केवल विषयवस्तु वरन शिल्प की दृष्टि से भी
उन्नत किया.

कहते हैं कि इधर कुमाउनी में मौलिक लेखन के अतिरिक्त कुछ अनुवाद एवं
शोध कार्य भी हुआ है. कुमाउनी रचनाओं के प्रकाशन व प्रसार में आँखर,
कत्यूरी मानसरोवर, हिलाँस, पुरवासी, रन्त-रैवार, पहरू जैसी विविध पत्रिकाओं
ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई है.