कथ्य और शिल्प :

kahnaसाहित्य : कथ्य और शिल्प

शिल्प प्रधान कहानियों में पात्र-परिवेश या भाषा-शैली द्वारा किसी भावना की स्थापना
तो हो जाती है, पर संवेदना का अभाव बना रहता है। ऐसी कहानी के शिल्प विश्लेषण
में संवेदना की खोज करने वाले समीक्षक प्रयोगवाद के नाम पर कहानीकार की प्रशंसा
में भले ही चार चांद लगा दैं, पर संवेदना हीन कहानी बिना चांद की रात से बढ़कर
नहीं होती।

अधुनातन कहानियों ने कथ्य और शिल्प के संबंध को सही मायनों में निभाने का प्रयास
किया है। परिवेश के अनुरूप अगर कभी कथ्य ने परंपरा से हटना चाहा तो शिल्प ने भी
नएपन से परहेज नहीं किया। फिर भी वास्तविकता यही है कि काल्पनिक नवीनता भी
तत्काल चमत्कृत कर सकती है, लंबे समय तक प्रभावित नहीं कर पाती।

पाठक केवल कथ्य (क्या कहा गया) से ही द्रवित नहीं होता, शिल्प (कैसे कहा गया) से भी

प्रभावित होता है। इसके बाद नंबर आता है कहानीकार (कहने वाले) का। इससे कोई
फर्क नहीं पड़ता कि वह नया है या पुराना। उसे लुभाता है ‘क्या’ और ‘कैसे’ का संतुलित
समन्वय। उसके लिए सहज शिल्प के माध्यम से सजीव कथ्य को कहना ही कहानी है।