अतीत :

ateet

जहां तक भारत में नारी की स्थिति का प्रश्न है, वैदिक काल में वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
पुरुष की सहभागिनी रही। उसके बिना धार्मिक अनुष्ठान अपूर्ण माने जाते थे और वह आध्यात्मिक
विषयों पर शास्त्रार्थ कर सकती थी। रामायण महाभारत काल में भी नारी का स्थान महत्वपूर्ण बना
रहा। सीता और अनुसूया, गांधारी और कुंती, सावित्री ओर दमयंती की कथाएं आज तक यथावत्
प्रेरक बनी हुई हैं।

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ की भावना से अभिभूत भारत की पुराकथाओं में अनेक ऐसे
प्रेरक प्रसंग मिलते हैं, जो तत्कालीन नारी की गरिमा की महिमा बताते हैं। इसके अतिरिक्त सम्राट अशोक
ने अपनी पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए दूर दूर भेजा था। मंडन मिश्र की धर्मपत्नी
भारती ने जगत्गुरु शंकराचार्य के साथ शास्त्रार्थ किया था, पर नारी की इस स्थिति को परिवर्तनशील समय
ने वैसा नहीं रहने दिया।

महिला शक्ति :

mahila

स्रष्टि के सनातन रथ के दो पहिए हैं – एक नर और दूसरा मादा। इनमें से किसी एक के अभाव
में सामान्यतः जीवन आगे नहीं बढ़ सकता। नर को परुषता और नारी को मृदुलता का प्रतीक माना
जाता है। शिवशंकर के अर्धनारीश्वर स्वरूप की कल्पना में कठोरता और कोमलता के समन्वय से यह
तथ्य भी स्पष्ट होता है कि ये दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। संभवतः इसीलिए भक्ति
साहित्य में देवी देवताओं की युगल रूप में उपासना प्रारंभ हुई होगी।

नर नारी के युगल स्वरूप की पूर्णता को ध्यान में रखते हुए हमारे देश में प्राचीन काल से ही नारी को
पर्याप्त सम्मान दिया जाता रहा है। मां के रूप में आदर, बहन के रूप में स्नेह, पत्नी के रूप में प्रेम और
पुत्री के रूप में वत्सलता की अधिकारी नारी वास्तव में कई प्रकार से अपनी सामाजिक भूमिका अदा करती
है। वह ब्रह्मा की तरह सृजनकारी है, तो विष्णु की भांति पोषणकारी भी और आवश्यकता पड़ने पर शिव जैसी प्रलयंकारी भी हो जाती है।