विशेष: साम्प्रदायिकतावाद:

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विशेष: साम्प्रदायिकतावाद:

सांप्रदायिकतावाद में समाहित पाशविकता के कारण कभी कभी हमारे देश में ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जिन पर किसी भी सभ्यता का सर लज्जा से झुक जाना चाहिए। अतः सांप्रदायिकता को राष्ट्रीयता के नाम पर कलंक कहा जाना अनुपयुक्त नहीं। यह कलंक जितना संकीर्ण है, उतना ही हिंसात्मक भी है; जो कभी लांछित करता है तो कभी दिग्भ्रमित कर देता है।

‘‘मुल्क का मौसम बदलता रहता है। यों अपने देश का एक अन्य खुशनुमा मौसम भी है। यह हमारे प्रजातंत्र की पहचान है। किसी राज्य में चुनाव होते हैं, तो कहीं उपचुनाव। पूरे वर्ष , कहीं न कहीं चुनावी मौसम चलता ही रहता है। जो दल या नेता जनता को भाषण, वादे, प्रलोभन, आश्वासन आदि से ठगने में जितना सफल है, वह इस प्रजातंत्र के उत्सव में उतना ही कामयाब है। बात सब जनहित की करते हैं, जोर अपनी जात पर रहता है।’’ 1

‘‘हर दल की मान्यता है कि उसका विरोधी सांप्रदायिक है। दलित उत्पीड़न का सबसे अधिक शोर वह मचाते है, जिन्होंने उनके सुधार के लिए अपने शासन काल में; उस पर आज भी प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। उनकी परंपरा राजसी है, नजरिया सामन्ती। परिवार के बाहर का कोई प्रधानमंत्री उन्हें बर्दाश्त नहीं है। नही ंतो स्वर्गीय राव के आर्थिक सुधारों को भुलाने के लिए सक्रिय प्रयास क्यों करते ?’’ 2

साम्प्रदायिकतावाद में धार्मिक रूढ़िवाद को कारण मानने वालों को यह जान लेना चाहिए कि धर्म जितना रूढ़ होता है, उतना ही राजनीति से दूर होता है। संाप्रदायिकतावाद को विदेशियों की चाल बताने वालों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती, अर्थात् संाप्रदायिकतावाद को रूढ़िवादिता या विदेशी प्रयासों से जोड़ने वाले राजनीति की आड़ में वास्तविकता को छिपाना चाहते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शीघ््राातिशीघ््रा ऐसे कदम उठाए जाएं, जो वोटों की रातनीति में पनप रही संाप्रदायिकता को नेस्तनाबूद कर सकें। मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, अकालीदल जैसी संाप्रदायिक संस्थाओं को भी अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की बजाय सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्थान में जुटना चाहिए। देश के समस्त संाप्रदायिक दलों के लोगों को राष्ट्र को अपने दल से बड़ा मानकर संाप्रदायिकतावाद को राजनीतिक दुरुपयोग से बचाने का संकल्प लेना चाहिए।
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1 और 2 – ‘साहित्य अमृत’ नामक मासिक पत्रिका के नवंबर 2018 के पृष्ठ 48 में प्रकाशित – गोपाल चतुर्वेदी के लेख ‘मौसम के रंग’ से उद्धृत।

विशेष: धर्म निरपेक्ष:

dharm-1विशेष: धर्म निरपेक्ष:

प्रजातांत्रिक प्रणाली में एक ही राजनीतिक दल का लंबे अरसे तक सत्ता में बने रहना अगा कुछ मामलों में सौभाग्यपूर्ण लगता है, तो कुछ संदर्भों में दुर्भाग्यपूर्ण भी अनुभव होता है। लंबे अरसे तक सत्ता में रहने वाले किसी राजनीतिक दल के हित और सरकार के हित एकाकार होने लगते ह, तो सरकार ऐसे निर्णय लेने लगती है जो उसके अपने परंपरागत मतदाताओं के पक्ष में होते हैं।

धार्मिक स्थलों की पवित्रता के नाम पर एक वर्ग के पूजागृह में पुलिस के प्रवेश को निषिद्ध करना, देश की अखण्डता के नाम पर कियी भाषा विशेष को आवश्यकता से अधिक महत्व देना, श्रीराममंदिर के स्थान पर बाबरी मस्जिद बनाने के मसले को राजनीतिक बनाना सरकार द्वारा अपनाई गई उस तुष्टीकरण की नीति के प्रमाण हैं, जो वोट की राजनीति को देश की राजनीति से अधिक महत्व देती हैं।

यही कारण है कि धर्म निरपेक्ष भारत में धर्मों के आधार पर कई आचार संहिताएं चल रही हैं। किसी धर्म के मानने वाले अपनी वेशभूषा में अस्त्र शस्त्र भी धारण कर सकते हैं, किसी धर्म के मानने वाले एक से अधिक विवाह कर सकते हैं, किसी धर्म के मानने वाले अपनी शिक्षण संस्थाओं को अपनी नीतियों के हिसाब से चला सकते हैं। इन परिस्थितियों में एक देश में समस्त नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होने वाली संहिता का प्रश्न ही नहीं उठता।

समानता के अभाव में एकता की कल्पना करना बेबुनियाद है। अनेकता का सिद्धान्त सांप्रदायिकता को बढ़ावा देता है और सांप्रदायिकतावाद सरकार को परोक्ष रूप से लाभदायक प्रतीत होता है। नतीजतन कई निर्णय भारत के समस्त नागरिकों और सम्पूर्ण राष्ट्र को ध्यान में पखकर नहीं लिए जाते, जिनके परिणाम वर्षों से भयंकर समस्याओं के रूप में हमारे सामने मुंह बाए खड़े हैं ओर इनका प्रभाव दिन प्रतिदिन अधिक विकराल होता चला जा रहा है।

कुल मिलाकर इस सांप्रदायिकतावाद ने हमारे देश की एकता और उन्नति पर बहुत बुरा असर डाला है। सांप्रदायिकतावाद का विष भारतीयता के लिए काफी घातक सिद्ध हो रहा है। यदा कदा यही विष भारतीयों को अजनबी, नागरिकों को सांप्रदायिक और मनुष्य को पशु बना देता है। क्रमशः

विशेष: वोट की राजनीति:

 

vote kiविशेष: वोट की राजनीति:

सांप्रदायिकता का जहर कभी संघर्ष और कभी आंदोलन के रूप में असर दिखाता है तथा कभी राजनीतिक हलचल पैदा करके राष्ट्रीय विचारधारा में अशांति उत्पन्न करता है। लोकसभा अध्यक्ष अनन्तशयनम् आयंगर ने एक बार कहा था कि ‘प्रजातंत्र के उचित कार्य निष्पादन और राष्ट्रीय एकता के विकास और संगठन के लिए जरूरी है कि भारतीय जीवन में से सांप्रदायिकता का उन्मूलन किया जाए।’

जैसे और बहसें खास मुद्दे से हटकर नया मोड़ ले लेती हैं, वैसे ही साम्प्रदायिक उन्मूलन को लेकर जो विवाद प्रारंभ हुआ और जो प्रस्ताव रखे गए, उन्हें पारित करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने विशेष जोर नहीं दिया। मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहकर उुन्हें विशेष संरक्षण दिया गया, ताकि उनके वोट हाथ से न निकलने पाएं। केरल में मुस्लिम लीग और कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनने पर चैधरी चरण सिंह ने कहा था कि – ‘यह साम्प्रदायिकतावाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।’

तब से लेकर अब तक साम्प्रदायिकतावाद चिंतन मनन और वाद विवाद का विषय तो बना हुआ है, पर सांप्रदायिक दलों पर रोक लगाने का इरादा कामयाब नहीं हो पाया है। कभी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के नाम में से हिंदू शब्द हटाने का अभियान चलता है, तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मुस्लिम शब्द हटाने पर जोर दिया जाता है। इसके अलावा आरक्षण की नीति साम्प्रदायिकतावाद के मूल में पोषण का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जिसका लाभ अल्पसंख्यक वर्गों तक सीमित रहता है और हानियां बहुसंख्यक वर्गों के हिस्से में आती हैं।

अब भी सरकार आरक्षण की नीति को महत्व दे रही है, जिसके परिणामस्वरूप सारे देश में अशांति की लहर दौड़ गई है और युवावर्ग तरह तरह से अपना आक्रोश व्यक्त कर रहा है। जब बेरोजगारी की समस्या सभी के लिए समान है, तब किसी वर्ग विशेष के लिए अतिरिक्त सुविधा क्यों ? क्या इसके पीछे वोट की राजनीति और आरक्षण का मिला जुला प्रतिबिंब नहीं झलकता ? सम्प्रदायवाद द्वारा एक देश के नागरिकों को विभाजित कर अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने की यह राजनीतिक साजिश नही ंतो और क्या है ? क्रमशः

विशेष: भारत:

bharatविशेष: भारत:

भारत एक विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र है। भारतीय संविधान का उद्देश्य इसे एक ऐसा प्रमुख गणराज्य बनाना है, जिसमें समस्त नागरिकों को उनकी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक स्वतंत्रता के साथ विचारों के अभिव्यक्तीकरण का अधिकार हो और उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए। किसी भी व्यक्ति के साथ रंग, धर्म, जाति अथवा लिंग के आधार पर अन्याय न हो तथा उसे केवल देश का सम्मानित मतदाता ही नहीं, वरन् नियमानुसार किसी भी पद के योग्य भी माना जाए।

यह सत्य निर्विवाद है कि राजनीतिक दृष्टि से भारत स्वतंत्र है, पर एक राष्ट्र को जिन निषेधात्मक भावनाओं से मुक्ति की आवश्यकता होती है; वे भावनाएं अभी तक हमारी मानसिकता में जीवित हैं और देशवासियों को विभिन्न संप्रदायों में विभाजित किए हुए है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सुशिक्षित भारतीय भाईचारे और शान्तिसम्पन्न एकता का जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, लेकिन इस बात में भी कोई संदेह नहीं कि कुछ लोग अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए सांप्रदायिकता की ही आड़ लेते हैं।

यह सांप्रदायिकता भारत की राजनीति के लिए एक ऐसा अभिशाप बन चुकी है, जिसने देश के प्रजातांत्रिक स्वरूप को बुरी तरह दूषित किया है। फरवरी 1987 के अंत में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कहा था कि – ‘हमारी राष्ट्रीयता, धर्मनिरपेक्षता, प्रजातांत्रिक प्रणाली और समाजवाद के मूल सिद्धांतों को बाहरी तत्वों की सहायता से सांप्रदायिक और रूढ़िवादी दल चुनौती दे रहे हैं। एकता और विविधता की हमारी बहुमूल्य सम्पत्ति की रक्षा इन सभी विभाजक दलों कामना करके ही की जा सकती है।’

संप्रदायिकतावाद आज ही नहीं भारत के पुराने दिनों से प्रचलित एवं पोषित राजनीतिक पद्धति है। विदेशी शासकों ने इसी के आधार पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। आजादी के बाद भी सरकार द्वारा तुष्टीकरण की जो नीतियां बनाई गईं, उनके मूल में भी सांप्रदायिक अलगाव की भावना दृष्टिगोचर होती है। पाकिस्तान के अलग होने के बाद भी तत्कालीन नेताओं ने इस प्रकरण में उसी प्रकार के फायदे ढूंढने शुरू किए, जो पहले कभी विदेशी शासकों को नजर आए थे। क्रमशः

विशेष: संभावना:

sambhavnaविशेष: संभावना:

अब वह समय आ गया है कि जब जीवन के हर क्षेत्र में समान माने जाने वाले नर नारी अपने समाज के समस्त दुखद आडंबरों का मिलकर और खुलकर विरोध करें। आत्मविश्वास से भरपूर जागरूक युवक दहेज लेने की बात करना छोड़ दें और शिक्षित युवतियां विशेष साहस का प्रदर्शन करते हुए दहेज लोभियों को ठुकराना शुरू कर दें। जो युवक और युवतियां ऐसा करने की हिम्मत दिखाएं, समाज न केवल उन्हें प्रोत्साहित करे वरन् अपने आश्रितों को भी एतदर्थ प्रेरित करे।

सामाजिक आडंबरों से छुटकारा पाने के लिए सरल विवाह विधियों का प्रचलन प्रारंभ हो, जिनमें अनावश्यक तथा दिखावटी खर्चों से बचा जा सके। अदालत में होने वाले प्रेम विवाह वाले दम्पतियों को भी अन्य विधियों से विवाहित लोगों के समान मान्यता दी जाए। भलीभांति पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़े युवक युवतियां अंतर्जातीय विवाह करने लगें तो समाज राष्ट्रीयता एवं मनुष्यता की दृष्टि से उन्हें भी समुचित सम्मान प्रदान करे।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के अनुसार ‘मनुष्यता इसीलिए प्रणम्य है, वह इसीलिए देवत्व को पराजित करती है; क्योंकि देवताओं के स्वर्ग जैसी एकरसता मनुष्य ने धरती पर नहीं रहने दी। स्वर्ग जैसी एकरसता और मोक्ष जैसा निर्जन मौन सच्चा मनुष्य कभी नहीं चाहेगा, क्योंकि स्वर्ग और मोक्ष की भूमि सुजन के लिए बंजर है। इसलिए यदि मौलिकता भ्रम भी है तो ऐसा भ्रम इस सृष्टि का सौभाग्य है।’ 1

कुल मिलाकर इस अभिशाप को मिटाने के लिए सामाजिक चेतना में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। यही परिवर्तन दहेज की समस्या को मिटाकर भारतीय नारी को उस आदर्श स्थिति में प्रतिष्ठित कर सकेगा, जिसकी वह प्राचीन काल में अधिकारिणी थी। ऐसे अभिनव विचार किसी एक की सोच को बेचैन न करते हुए भी समाज की चेतना को झकझोरते रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा, प्रशासन, व्यापार और उद्योग के क्षेत्रों में आधुनिक युगीन नारी नर के कदमों के साथ अपने कदम मिलाते हुए प्रगति की ओर अग्रसर है, लेकिन यह बात अभी एक विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित है। यद्यपि तथाकथित विकास के बावजूद दूरस्थ कस्बों और ग्रामों की नारी की स्थिति अभी विचारणीय बनी हुई है, तथापि भारतीय संविधान में उल्लिखित नारी की स्थिति और अधिकारों के आलोक में एक ऐसी दिशा की संभावना स्पष्ट है; जहां भारतीय नारी अपना अपेक्षित मंतव्य अवश्य प्राप्त कर लेगी।
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1 ‘साहित्य अमृत’ नामक मासिक पत्रिका के नवंबर 2018 के पृष्ठ 36 में प्रकाशित – नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के लेख ‘ मनुष्य नहीं हुआ पुराना’ से उद्धृत।

विशेष: स्वतंत्रता के पश्चात्:

svatantrataविशेष: स्वतंत्रता के पश्चात्:

देश की स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में नारी के उत्थान के लिए कई प्रकार के कार्यक्रम तय किए गए। उन्हें शिक्षित बनाने के लिए स्कूलों ओर विद्यालयों की स्थापना की गई। मगर विडंबना यह कि शिक्षित कन्याओं के लिए उनसे अधिक शिक्षित वरों की मांग बढ़ने लगी, तो फिर से परंपरागत दहेज की समस्या की प्रगति के नए अवसर पनपने लगे। इन अवसरों ने आधुनिकता की आड़ में भौतिक सुख – सुविधाओं के सामान के लेन देन का ऐसा व्यापार प्रारंभ किया, जो श्खिित नववधुओं के लिए प्राणलेवा साबित हुआ।

स्वतंत्र भारत में दहेज उन्मूलन की बात पर काफी जोर दिया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जमाने में सरकार द्वारा इस विषय में रुचि ली गई और कई दहेज विरोधी नियम भी बनाए गए। दहेज विषयक मामलों पर विचार करने के लिए पृथक् न्यायालयों की व्यवस्था की गई। अनेक नवगठित सामाजिक संगठनों और महिला मंचों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर इस समस्या को सुलझाने के प्रयास प्रारंभ किए, लेकिन इस बुरे रोग का सही उपचार न हो सका।

कारण यह है कि वर का पिता यदि दहेज न लेने को राजी भी हो जाए तो वर की माता राजी नहीं होती। वह अपने अड़ोस पड़ोस तथा सगे संबंधियों को दहेज न लेने का आदर्श प्रदर्शित करने की अपेक्षा अधिकाधिक दहेज दिखाने में अपनी ज्यादा शान समझती हैं। व्यावहारिक दृष्टि से इसे नवदंपति की नई गृहस्थी जमाने के लिए आवश्यक सामान का अथवा वर की पढ़ाई लिखाई पर हुए कुल व्यय का भुगतान भी माना जाने लगा।

आजकल विवाह दो परिवारों का संबंध सूचक न रहकर ताम झाम के प्रदर्शन का आयोजन मात्र बनकर रह गया है। इस प्रदर्शन का बोझ वर और कन्या पक्षों को समान रूप से उठाना पड़ता है। बढ़ती हुई मंहगाई के साथ यह बोझ असह्य होता चला जा रहा है। यद्यपि लोग इस प्रथा के साथ साथ बारात की औपचारिकता तथा सामाजिक रीतियों या जातिगत बंधनों से मुक्ति के लिए छटपटाने लगे हैं, तथापि सच्चे साहस के अभाव की वजह से वे इन प्रपंचों का खुलकर विरोध नहीं कर पाते हैं। यह मनःस्थिति समाज में नारी की स्थिति को और भी डांवाडोल बनाए हुए है। क्रमशः

विशेष: बदलाव:

badlaavविशेष: बदलाव:

भारत में विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन तथा उनकी सत्ता की स्थापना के साथ साथ भारतीय नारी की स्थिति में बदलाव दिखाई देता है। विदेशियों के अत्याचारों व कुदृष्टि से बचने के लिए वह कभी तलवार लेकर समर में कूद पड़ी, कभी सिंधौरा लेकर जौहर की ज्वालाओं में समा गई; लेकिन हर नारी दुर्गावती या पद्मावती नहीं होती।

सामान्य नारी के लिए पदा प्रथा प्रारंभ हुई, बाल विवाह की परंपरा पड़ी ।इन परिपाटियों ने सामाजिक दृष्टि से भले ही नारी की सुरक्षा की हो, लेकिन शिक्षा से पूरी तरह वंचित कर दिया। अशिक्षित होने के कारण वह अपने पति की सहधर्मिणी या सहभागिनी नहीं बन सकी और कालांतर में उसकी स्थिति इतनी खराब हो गई कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण की लेखनीतक भाव विह्वल हो उठी –

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आंचल में है दूध और आंखों में पानी

ऐसी भावनाओं से अनुप्रेरित होकर आधुनिक युग में राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महान विचारकों तथा समाज सुधारकों भारतीय नारी की स्थिति सम्हालने का बीड़ा उठाया। सभी लोगों ने उनका समर्थन किया और नारी उत्थान के लिए किए जाने वाले प्रयास सफल होने लगे। इन सफलताओं के बावजूद सती प्रथा और दहेज प्रथा का अस्तित्व काफी हद तक बरकरार रहा। इनमें से सती प्रथा धीरे धीरे लुप्त होती चली गई, पर दहेज प्रथा का रूप अभी भी विकराल बना हुआ है।

यू ंतो यह प्रथा हमारे देश में वैदिक तथा पौराणिक काल से ही चली आ रही है, लेकिन यह कन्या के पिता द्वारा वर को भेंट स्वरूप प्रदान किया जाता था। सामंतवादी युग में राजा महाराजा अपनी प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए दहेज के रूप में हाथी घोड़ों और वस्त्राभूषणों के ढेर सहित दास दासियां भी देते रहे।
आधुनिक युग के प्रारंभ में तो यह परंपरा कन्यापक्ष की सामथ्र्य की सीमाओं में पोषित हुई, पर कालांतर में वरपक्ष की मांग के रूप में प्रकट होकर इसने सौदेबाजी की हद छू ली। इस पर गांधी जी ने कहा था कि – ‘हमें नीचे गिराने वाली दहेज प्रथा की निंदा करने वाला जोरदार लोकमत जागृत करना चाहिए और जो युवक इस तरह के पाप के पैसे से अपने हाथ गंदे करें, उन्हें समाज से बाहर निकाल देना चाहिए।’ क्रमशःः

विशेष : भारतीय नारी :

bhartiyविशेष : भारतीय नारी :

मानव सृष्टि के सनातन रथ के दो पहिए हैं – एक नर और दूसरा नारी।
इनमें से किसी एक के भी अभाव में मानव जीवन आगे नहीं बढ़ सकता।
नर को परुषता का और नारी को मृदुलता का प्रतीक माना जाता है।
शिवशंकर के अर्धनारीश्वर में कठोरता और कोमलता के समन्वय के साथ
साथ यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं,
बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। संभवतः इसीलिए भक्ति और साहित्य में देवी
देवताओं युगल रूप में उपासना प्रारंभ हुई होगी; जैसे शिव पार्वती, विष्णु
कमला, राम सीता, राधा कृष्ण आदि।

नर और नारी के युगल स्वरूप की पूर्णता को ध्यान में रखते हुए हमारे देश
में प्राचीन काल से ही नारी को र्प्याप्त सम्मान दिया जाता रहा है। ‘यत्र नार्यस्तु
पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जैसी उक्तियां हमारे पुरातन सभ्यता के अनुभव सम्पन्न
जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति हैं। मां के रूप में आदर, बहन के रूप में स्नेह, पत्नी
के रूप में प्रेम और पुत्री के रूप में वत्सलता की अधिकारी नारी वास्तव में कई
प्रकार से अपनी सामाजिक भूमिका अदा करती है। वह ब्रह्मा की तरह सृजनकारी
है, तो विष्णु की तरह पालनहार भी। आवश्यकता पड़ने पर वह शिव की तरह
प्रलयंकारी भी हो जाती है।

नारी की स्थिति के संदर्भ में यह ज्ञात होता है कि वैदिक काल में वह जीवन के
प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष की सहभागिनी रही। उसके बिना धार्मिक अनुष्ठान अपूर्ण माने
जाते थे और वह आध्यात्मिक विषयों पर शास्त्रार्थ भी कर लेती थी। रामायण –
महाभारत काल में भी नारी का स्थान महत्वपूर्ण बना रहा। सीता और अनुसूया, कुंती
और गांधरी, सावित्री और दमयंती की कथाएं आज तक यथावत् प्रेरक बनी हुई हैं।
सम्राट अशोक ने अपनी पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए दूर दूर
तक भेजा था। मण्डन मिश्र की धर्मपत्नी भारती ने जगतगुरु शंकराचार्य के साथ
अविस्मरणीय शास्त्रार्थ किया था। नारी की इस स्थिति कां परिवर्तनशील समय ने एक
सा नहीं रहने दिया। क्रमशःः

विशेष: वरदान या अभिशाप:

vardanविशेष: वरदान या अभिशाप:

आजकल जब विश्व के किसी भी देश के किसी भी संकट से ग्रस्त लोगों के लिए वायुयानों द्वारा तरह तरह का सामान भेजा जाता है या कोई रोबोट एक पेड़ काटकर उसे उठाता है ओर उसके गंतव्य तक पहुचा देता है या जे सी बी से विशाल पर्वतों को हटाकर समतल रास्तों का निर्माण किया जाता है अथवा जब घर बैठे हर प्रकार की ऐश्वर्यमयी सुविधाएं प्राप्त होती हैं, तब ऐसा लगता है कि विज्ञान मानव जाति के लिए एक अनोखा वरदान है, जिसने आम आदमी की विविध कल्पनाओं को इच्छानुकूल आकार देकर हमारे सामने खड़ा कर दिया है।

शायद इसीलिए रूसी लेखक टाॅल्सटाॅय ने यह लिखा था कि ‘ धर्म का युग चला गया। विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी बात पर विश्वास करना मूर्खता है। जिस किसी वस्तु की हमको आवश्यकता है, वह सब विज्ञान से प्राप्त हो जाती है। मनुष्य के जीवन का प्रदर्शन केवल विज्ञान ही होना चाहिए।’

फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विज्ञान अगर आकाश में महानगर की कल्पना कर सकता है तो पृथ्वी पर नागासाकी और हिरोशिमा जैसे महानगरों को उजाड़ भी सकता है। विज्ञान की प्रगति की पराकाष्ठा देखकर ऐसा प्रतीत होता हे कि ज्यों ज्यों शक्ति में वृद्धि होती है, त्यों त्यों सद्भावनाओं का ह्रास होता जाता है। ऐसी स्थिति में विज्ञान की एकांगी प्रगति को ही मानव जाति का वास्तविक प्रगति मानना भूल होगी।

विज्ञान की शक्ति में धर्म की आध्यात्मिक शक्ति का योग आवश्यक है, ताकि मन और बुद्धि का संतुलन बना रहे। मन और बुद्धि के संतुलित धरातल पर विज्ञान और अध्यात्म से बनने वाली संस्कृति ही मानवता के लिए कल्याणकारी हो सकती है। यही संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’के आदर्श को सच्चे अर्थों में स्थापित कर सकती है।

इसलिए हमें विज्ञान को वरदान या अभिशाप न मानकर मानव की बुद्धि से अर्जित ऐसी शक्ति मानना चाहिए, जिसके प्रयोग के लिए विवेक की आवश्यकता पड़ती है। विवेक रहित स्थिति में विज्ञान अभिशाप बन सकता है और विवेक सहित स्थिति में यह वरदान सिद्ध होता है। अर्थात् विज्ञान एक ऐसी जलती हुई लौ है, जिसका सदुपयोग किया जाए तो घर में उजाला हो सकता है और दुरुपयोग किया जाए तो सारा घर जलकर खाक भी हो सकता है। यदि विवेकपूर्वक विज्ञान का प्रयोग किया जाए तो निसंदेह इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाया जा सकता है।

विशेष: विज्ञान और धर्म:

vigyan & dharmविशेष: विज्ञान और धर्म:

विज्ञान और धर्म जिज्ञासा रूपी पेड़ की ऐसी दो शाखाएं हैं, जिनमें सत्य का फल लगता है। विज्ञान की अत्यधिक उन्नति ने मानव जीवन को सुख सुविधाओं से भर दिया है। इन सुविधाओं ने मानव को परितुष्ट करने की बजाय असंतोषी बना दिया है। यह असंतोष उसं अधर्म की ओर उन्मुख करने लगा है, अतः परिस्थिति के संतुलन के लिए आज धर्म की आवश्यकता भी महसूस होने लगी है।

शायद इसी आवश्यकता की ओर इशारा करते हुए विश्व के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था कि ‘ धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा है।’ इसी बात को सर फ्रांसिस बेकन ने इन प्रकार कहा है कि ‘मानवीय ज्ञान की अपरिपक्वावस्था में धर्म और विज्ञान के बीच 36 के 3 व 6 का संबंध दिखाई देता है, परंतु वास्तव में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।’

हिंदी के प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य कामायनी की कथा उस मानव की कथा है, जो बुद्धि के समीप पहुंच कर अंततः संतप्त होता है और श्रद्धा के पास आकर अखण्ड आनंद का अनुभव प्राप्त करता है। बुद्धि के प्रयत्नों से प्राप्त होने वाले सांसारिक सुख हृदय के प्रयासों से अनुभव होने वाले आनंद से बढ़कर नहीं होते।

जीवन में उनकी आवश्यकता है, लेकिन केवल उन्हीं की आवश्यकता नहीं है। उनके अतिरिक्त भी जीवन का कोई उद्देश्य होता है। इसलिए विज्ञान और धर्म दोनों ही मानव के लिए आवश्यक हैं, पर विज्ञान तभी तक उपयोगी है; जब तक वह विनाश की ओर उन्मुख नहीं होता। इसी प्रकार धर्म भी तभी तक लाभप्रद है जब तक कि वह पाखण्डों या आडंबरों से दूूूूूूूूूूूूर रहता है।

इसमंे कोई संदेह नहीं कि मानव ने विज्ञान के बूते पर निरंतर प्रगति की है ओर वह भौतिक दृष्टि से पर्याप्त संपन्न हो चुका है, लेकिन उसका यह विकास एकांगी ही माना जाता है। विज्ञान ने मानव को जो शक्तियां प्रदान की हैं, उन्हें विध्वंसात्मक प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। यदि समय रहते इस सोच को नहीं बदला गया, तो विज्ञान मानव जाति के लिए एक अभिशाप बनकर रह जाएगा। क्रमशः