विनोद: आइ लव यू:

विनोद: आइ लव यू:

प्रेमिका:
(इतराते हुए) अच्छा आज तुम मुझे यह बताओ कि ‘बाॅलीवुड’ की हीरोइनों में मुझसे ज्यादा सुंदर कौन है ?

प्रेमी:
कोई नहीं। ‘बाॅलीवुड’ में क्या, ‘हाॅलीवुड’ में भी तुमसे ज्यादा सुंदर कोई नहीं है।

प्रेमिका:
वाह ! कितनी साफगोई है, तुम्हारे दिल में। कितने वफादार आशिक हो ?

प्रेमी:
वफादार ही नहीं, मैं तो बुजदिल भी हूं। आजमाकर देख लेना कभी।

प्रेमिका:
अच्छा यह सोचो ! कल को जब मैं (खा-पीकर) मोटी हो जाऊंगी, तब भी क्या तुम मुझसे इतना ही प्यार करते रहोगे ?

प्रेमी:
बेशक ! जब सुख-दुख में साथ निभाया जा सकता है, तो मोटे-पतले में क्यों नहीं ?

प्रेमिका:
मैंने देखा है कि लोग सिर्फ पैसे के भूखे होते हैं, लेकिन तुम तो सिर्फ पैसे वाले के प्यार के भूखे लगते हो।

प्रेमी:
मेरे मुंह की बात छीन ली तुमने। मेरे पास भी सिर्फ प्यार की ही तो दौलत है, पैसा कहां है ?

प्रेमिका:
यह तो डूब मरने वाली बात कह दी तुमने।
प्रेमी:
डूब भी जाऊंगा, पर मर नहीं पाऊंगा; क्योंकि मुझे तैरना आता है।

प्रेमिका:
अब तुम डूबो चाहे तैरो, मुझे जाना होगा।

प्रेमी:
थोड़ी देर में चली जाना।

प्रेमिका:
(घड़ी देखते हुए) मैंने तुमसे एक घण्टे पहले ही फोन पर कह दिया था कि मैं दस मिनट से ज्यादा नहीं रुकूंगी। पंद्रह मिनट तो रास्ते में उस मरीज टाइप के लोफर ने खराब कर दिए और बीस मिनट तुमने फालतू की बातों में बरबाद कर दिए।
प्रेमी:
वक्त की इतनी ही पाबंद हो, तो करीब आने से परहेज क्यों करती हो ?

प्रेमिका:
तुम भूल रहे हो शायद ! मैं एक इज्जतदार घराने की लड़की हूं।

प्रेमी:
मेरी तरह तुम भी भूल जाओ ना ! थोड़ी देर के लिए ही सही। प्लीज !

विनोद: प्रोपर्टी:

विनोद: प्रोपर्टी:

प्रेमी: (गाते हुए ) पैली-पैली बार बलिये ! दिल गया हार बलिये ! रब्बा मैंनंू प्यार हो गया … हाए .. ए .. ए …ए / ….जिएं तो जिएं कैसे …ए ….ए …बिन आपके।

प्रेमिका: (आते हुए) वाह ! मजा आ गया डार्लिंग ! कितना अच्छा मिक्स करते हो ? साॅरी फाॅर लेट।

प्रेमी: तुमने तो साॅरी कहकर पल्ला झाड़ लिया। (घड़ी की तरफ देखते हुए) मगर इंतजार की घड़ियां कितनी खराब होती हैं ?

प्रेमिका: प्रेमी का घड़ी वाला हाथ पकड़ते हुए) इतनी मामूली घड़ी पहनते क्यों हो ? वह भी चाइनीज। उतार फेंको इसे।

प्रेमी: फेंक दूंगा यार, पहले मेरी बात तो सुनो।

प्रेमिका: नहीं। पहले तुम मेरी बात सुनो। पता है, आज एक ‘लोफर’ मेरा पीछा कर रहा था, रास्ते में।

प्रेमी: वह पीछा कर रहा था, तो यह उसका ‘प्राॅब्लम’ था। तुम्हें क्या परेशानी थी ?

प्रेमिका: परेशानी थी ? तेज नहीं चल पा रहा था। धीरे-धीरे चल रहा था, नालायक।

प्रेमी: एक ‘लोफर’ की चाल की चिंता है तुम्हें। अपने ‘लवर’ की नहीं, जो तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता है।

प्रेमिका: (चौंककर) जीवनसाथी ! अभी हमें मिले चार दिन भी नहीं हुए और तुमने इतना बड़ा फैसला ले लिया ?

प्रेमी: चार दिन से तुम्हारे साथ जरूर हूं , पर तुम्हारा एकाउण्ट तो चार साल से देख रहा हूं। मैं उसी बैंक में काम करता हूं , जानेमन ! जहां तुम्हारा खाता है।

प्रेमिका: अच्छा ! …. अब समझी। ….. मेरे नाना ने काफी दौलत बैंक में जमा करवाई है। शायद इसीलिए तुम मुझसे ……….

प्रेमी: बिलकुल गलत समझ रही हो तुम ! तुम्हारे नाना ही क्या, कोई और रिश्तेदार भी इतनी दौलत जमा कराता, तो भी मैं ….

प्रेमिका: तो तुम यह क्यों कहते हो कि मैं बहुत बड़ी प्रोपर्टी की मालकिन हूं।

प्रेमी: तुम्हारे जैसे नाक-नक्श वाली लड़की से मोहब्बत करने का कोई ‘जेनुइन’ कारण भी तो होना चाहिए।

भागम भाग :

bhagamविनोद : भागम भाग :

आज हर आदमी किसी न किसी खुशी के पीछे ऐसे दौड़ रहा है, जैसे जैरी के पीछे टॅाम दौड़ता रहता है।
कोई खुशी कभी जरा देर के लिए हाथ आती भी है, तो जैरी की ही तरह मुंह चिढ़ाती है और मौका
निकाल कर भाग जाती है। लेकिन वह हताश नहीं होता। उम्मीद की किरन उसे फिर दौड़ाती है।

इस भागम भाग में वह ऐसे जी रहा है, जैसे बस के इंतजार में सड़क के किनारे चाय पीता हुआ मुसाफिर
किसी भी गाड़ी की आहट सुनकर गरमा गरम चाय को फटाफट सुड़कने लगता है। उसकी नजर अर्जुन की
तरह सिर्फ्र लक्ष्य पर है। आस पास की बाकी चीजों के लिए उसमें कोई संवेदन नहीं बचा है।

वह आपके पिता के निधन पर भी इसलिए दिलासा देने नहीं आता कि वह आपका शुभचिंतक है। बल्कि वह
यह जानता है कि जब उसका बाप मरेगा, तब उसे आपके दिलासे की जरूरत पड़ेगी। ठीक उसी तरह जैसे
दूसरों का भविष्य बताने वाला हर ज्योतिषी अपने ही कल के बारे में एकदम निश्चिंत नहीं हो सकता।

निश्चिंत तो अब वे बच्चे भी नहीं, जो निश्चिंत होकर टॅाम एण्ड जैरी की भागम भाग का लुत्फ उठाते हैं।
अपनी मंजिल को हासिल करने के लिए आखिर उन्होंने भी तो अपने सहपाठियों के साथ बचपन से ही
जाॅगिंग करना शुरू कर दिया है। आगे भी हर नई चाहत के पास उन्हें अपने ही बैच के संगी साथी अपने
इर्द गिर्द दौड़ते दिखेंगे।

हवाखोरी :

hawakhoriविनोद : हवाखोरी :

जीने के लिए जिंदगी, जिंदगी के लिए सेहत, सेहत के लिए कसरत और कसरत के लिए खुराक जरूरी
मानी जाती है, पर आजकल डाइटीशियन खाने पीने के नाम पर जो लिस्ट थमा देते हैं, उसके हिसाब
से रोज सौ पचास दंड नहीं पेली जा सकती। उसकी जगह डाॅक्टर साहब योगा करने या पार्क में घूमने
की सलाह देते हैं।

पार्क में प्रवेश करने की सुविधा चारों तरफ से होती है। हर दिशा से आने वाले लेफ्ट हेण्ड ड्राइव स्टाइल
में अक्सर बाईं तरफ मुड़कर घूमना चालू कर देते हैं। इस तरह सुबह सुबह एक दूसरे के पीछे पीछे लगातार
घूमने वालों को उनकी पीठ से ही पहचान लिया जाता है और चलते चलते दुआ सलाम भी चलती रहती है।

लेकिन बिरले लोग कहां नहीं होते ? पार्क में भी होते हैं। वे होते तो इक्के दुक्के ही हैं, पर राइट हैण्ड
ड्राइव के मूड में विरोधी दिशा से आने वाले हवाखोरों को हर राउण्ड में बार बार दर्शन देते हुए बड़ी शान
से उनके बीच से गुजर जाते हैं। वे भी शायद खानदानी बहादुरों की तरह पीठ दिखाना पसंद नहीं करते।

मजे की बात यह है कि आदमी आंखें होते हुए भी अपनी पीठ और अपनी शकल खुद नहीं देख सकता।
आईने में अक्स भले ही देख ले, पर पीठ तो ठीक से खुजला तक नहीं पाता। इसलिए बिना किसी दूसरे
की मदद के यह जानना भी आसान नहीं होता कि किसी की पीठ पीछे हो क्या रहा है ?

विनोद :: बाल-विद्या :: क्रमशः

baalविनोद :: बाल-विद्या :: क्रमशः

अगले दिन सुरिन्दर मिल गया। परे’ाान लग रहा था। मैंने पूछा ‘क्या प्रोब्लम है भाई !’
बोला – ‘मेरे बेटे का एडमीशन नहीं हो पा रहा है।’

मैंने कहा – ‘डोण्ट वरी ! कल मुझे एक पेयर मिला था। मियां-बीवी दोनों अलग-अलग स्कूलों में हैं।
कहीं न कहीं तो उल्लू सीधा हो ही जाएगा।’

दूसरे दिन हम लोग मुलुण्ड गए। सरस्वती बाल मंदिर जाकर पता चला कि सरस्वती बाई अकेली है।
उसने टाइम पास करने के लिए अपने घर में उन बच्चों के लिए ‘क्रेच’ खोल रखा है, जिनके मां-बाप
सर्विस करते हैं। वे अपने बच्चों को दिन में वहां छोड़ जाते हैं। सुचित्रा बेन उन बच्चों की सू-सू और पाॅटी
मैनेज करके कपड़े बदलने का काम करती है।

अभी भी आशा की एक किरण बाकी थी। सुचित्रा से उसके हसबैण्ड का पता लेकर हम बाल-विद्या मंदिर पहुंचे।
वहाँ सुचित्रा का हसबैण्ड एक आदमी के बाल काट रहा था। मैंने पूछा – ‘यह क्या कर रहे हो ?’

वह बोला – अपना काम कर रहा हूं।
मैंने पूछा – यही बाल-विद्या है तुम्हारी ?
उसने बताया – बाल यानी हेयर , विद्या यानी सैटिंग।
मैं समझ गया – बाल विद्या मंदिर माने हेयर कटिंग सेलून।

विनोद :: मुलाकात ::

mulakatविनोद :: मुलाकात ::

एक दिन जुहू में घूम रहा था। अचानक एक बच्चा मामू-मामू कहता हुआ आया और पीछे से मेरी
पैण्ट पकड़ ली। मैं रुक गया। तभी उस बच्चे की मां आ गई और बोली -‘माफ करना भाई साहब !
आपने मेरे भाई की जैसी कमीज पहन रखी है , इसलिए बच्चे ने आपको मामू बना दिया।’
मैंने सोचा – इतना छोटा बच्चा भी मामू बना सकता है।

तभी एक आदमी और आ गया। बच्चे की मां ने परिचय कराया – ‘ये मेरे पति हैं। इनका अपना
बाल-विद्या मंदिर है और मेरा नाम सुचित्रा है। मैं सरस्वती बाल मंदिर में काम करती हूं।’
मैंने पूछा – जब पति का अपना बाल-विद्या मंदिर है , तो सरस्वती बाल मंदिर में क्यों हो ?

उसने बताया – सरस्वती बाल मंदिर हमारे घर के पीछे ही है , मुलुण्ड स्टेशन के पास। वहां से
इनके बाल-विद्या मंदिर जाने में भौत टैम लगता है।मैंने कहा – आप लोगों से मिलकर बड़ी खुशी हुई।
आदमी हाथ मिलाते हुए बोला -’कभी आइए ना ! मुलुण्ड की तरफ।’ मैंने भी हाथ छुड़ाते हुए दांत
दिखा दिए।