प्रकार :

 

 

prakarलोकगीतों की विषयवस्तु का प्रमुख आधार प्रेम होता है, जिसकी परिधि
में प्रियजन, परिजन, ससुराल वाले, मायके वाले, सखी-सहेली, यार-दोस्त,
फूल-फल, वन-उपवन, पशु-पक्षी, चांद-तारे, देवी-देवता वगैरह आते हैं।
कभी अपने बचपन की, कभी गांव-घर की अथवा प्रिय की स्मृति गीत में
ढलती है तो कभी क्षणिक यौवन की चंचलता, जीवन यापन की जटिलता
या सामाजिक परिवर्तन की आहट गीत बनकर मुखरित होती है।

कुमाऊँ के लोकसाहित्य में मुखरित जनजीवन देश के अन्य हिन्दी भाषी क्षेत्रों
के लोक साहित्य से अधिक भिन्न नहीं है। यही कारण है कि अनेक लोकगीत
कुमाऊं, गढ़वाल,ब्रज या अवध में यत्किंचित् अन्तर के साथ समान रूप से गाए
जाते हैं। कुमाउनी में संस्कार गीतों के अतिरिक्त नृत्य प्रधान, अनुभूति प्रधान,
तर्क प्रधान, संवाद प्रधान ही नहीं; कृषिगीत, रितुगीत, पूजागीत, बालगीत
आदि विविध प्रकार के लोकगीत उपलब्ध होते हैं।

मनोविनोद

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6 – पहेलियां :

पहेलियां मनोविनोद का सहज साधन मानी जाती हैं।
कुमाऊं में पहेलियां ‘आहण’ या ‘आण’ के नाम से जानी जाती हैं।
इन्हें भी कई वर्गों में रखा जाता है – भोज्य पदार्थ संबंधी,घरेलू वस्तु संबंधी,
जीव-जन्तु संबंधी, प्रकृति संबंधी, अंग-प्रत्यंग संबंधी, कृषि संबंधी आदि।

7 – बालगीत

कुमाउनी लोक साहित्य में बालगीतों का अपना अलग स्थान है।
संख्या की दृष्टि से अधिक न होते हुए भी ग्राम्य परिवेश में इनका प्रचलन बदस्तूर जारी है।
इनकी शब्दावली अर्थ की बजाय लय और तुक का अधिक अनुसरण करती है।
कुमाउनी में मुख्यत: दो प्रकार के बालगीत मिलते हैं – हिलोरी तथा खेल संबंधी।

8 – नवगीत

आजकल अलग-अलग म्यूजिक कंपनियों द्वारा बनाई जा रही कुमाउनी गीतों
की आँडियो कैसेट/सीडी/वीसीडी के लोक शैली में रचित गीत पर्याप्त प्रचलन में हैं।
इन्हें भी प्रेम संबंधी, विरह संबंधी, हास्य संबंधी, भक्ति संबंधी, बेरोजगारी संबंधी,,
फौज की नौकरी संबंधी आदि वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

लोकसाहित्य

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कुमाऊँ

3 – लोकगाथाएं :

कुमाऊँ में प्रचलित छोटी-बड़ी लगभग एक सौ लोकगाथाएं

अपने पात्रों के माध्यम सेस्थानीय जन जीवन की विविध झांकियां दिखाती हैं।

विषय वस्तु के आधार पर इनके भी अनेक भेद किए गए हैं; जैसे – पारंपरिक गाथाएं,

पौराणिक गाथाएं, धार्मिक गाथाएं, वीर गाथाएं आदि।

4 – लोककथाएं : कुमाऊँ में अनेक प्रकार की लोक कथाएं प्रचलित हैं।

वर्ण्य-विषय की दृष्टि से इनके भी कई रूप मिलते हैं; जैसे – पशु-पक्षी संबंधी कथाएं,

भूत-प्रेत संबंधी कथाएं, धर्म संबंधी कथाएं, प्रकृति परक कथाएं, नीति परक कथाएं,

व्रत परक कथाएं, कारण मूलक कथाएं, हास्य मूलक कथाएं, बाल कथाएं आदि।

5 – लोकोक्तियां : अपनी संक्षिप्तता के कारण गागर में सागर

का आभास कराने वाली लोकोक्तियों को अनुभवों की बेटियां माना जाता है।

कुमाऊँ में आम बोलचाल में प्रचलित लोकोक्तियों को भी कई भागों में बांटा गया है;

जैसे – सामाजिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक, जीव-जन्तु संबंधी, कृषि संबंधी, नीति परक, हास्य परक आदि।

उदाहरण – द्याप्त देखण जागसर, गंग नाण बागसर