लोकगीत : कृषि विषयक कथागीत :

krishiलोकगीत : कृषि विषयक कथागीत :

खेतों में गोड़ाई करते समय और धान की रोपाई के समय गाए
जाने वाले गीत ‘गोड़ाैल’ अथवा ‘हुड़किया बौल’ कहे जाते हैं।
प्रमुख गायक अपने वाद्य ‘हुड़का’ पर थाप दे देकर मंद लय में
गीत की पंक्ति गाता है और रोपाई या गोड़ाई के कार्य में लगी हुई
महिलाओं की पंक्ति उसे दोहराती है। इन गीतों के स्वर श्रम को
सहज बना देते हैं।

इस प्रकार के ‘जसी बौराण’ नामक एक कथागीत में बलिप्रथा के
विषय में जानकारी मिलती है। सबके खेतों में सिंचाई होते देख एक
महिला ने अपने पुत्र को खेतों की सिंचाई का मुहूर्त निकलवाने के
लिए ब्राह्मण के पास भेजा। ब्राह्मण ने रेखाएं खींचते-मिटाते हुए यह
विचार किया कि औरों के खेतों में तो बकरे की बलि पर्याप्त है,
पर तुम्हारे खेतों के लिए मानव की बलि देनी होगी।

ओ सबूं की सेरो मांझा बकरिया बइ छ
तुमरि सेरी मांझा मनखिया बइ छ
जो निकांसी बौराण, उनोर बइ छ
रूमनै-झुमनै जसू घरा नसी ऐ गोछ

च्याला त्विथैं कि कुंणौंछी बामण ?

ओ बुढि़या माएडि़ पुछन पैगिछ
ओ निकांसि बौराण, उनोर रे बइ
सबूं की सेरी रे बाकरै कि बइ
हमरी रे सेरी मनखा कि बइ

लोकगीत : ॠतु विषयक कथागीत :

 

rituलोकगीत : ॠतु विषयक कथागीत :

ॠतुरैण ‘चैती’ गाथा है और केवल चैत के महीने गाई जाती है। इसे ‘ॠतुगीत’ भी कह
सकते हैं। चैत की संक्रांति के दिन से ही ढोली गले में लटकते ढोल बजाते हुए इसे गाते
रहे हैं और उनकी पत्नियां इसमें ‘भाग’ लगाती रही हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक ढोलिनें नाचती
भी थीं।

नागवंशीय राजा के साथ ब्याही गौरी के भ्रातृस्नेह में उमड़ते हुए आंसुओं से भीगे इस
कथागीत में पर्वतीय प्रकृति की सुंदरता एवं नारी हृदय की कोमलता का अद्भुत समन्वय
हुआ है। चैत के महीने में भाई अपनी बहिन से मिलने जाते हैं; इसलिए गौरी का भाई भी
छोटा होने के कारण माता के द्वारा रोके जानेे के बावजूद रास्ते की मुश्किलों को पार करता
हुआ अपनी बहिन से मिलने जाता है।

बहिन ने भाई को जी भरकर भेंटा। इसी बीच कालीनाग आ पहुंचा। अपनी पत्नी को परपुरूष
के साथ देख उसने भाई को डस लिया। भाई की मृत्यु से दुखित बहिन दांतों तले जीभ दबा
कर मर गई। वास्तविकता जानकर कालीनाग ने उन्हें अमृत से सींचकर जिंदा कर दिया।

भितर पलंग गोरिधना रोलि रितु
‘बास-बास कफु चाड़ा म्यर मैत बास रितु
बाबु सुणला भाया भेंट लाला रितु
द्योराणी जेठानी का भै भेंट उनन रितु

मैं भयूं निरांशी बैना रितु
न कोखी बालो न पीठी भायलो रितु
को उंछ भेटुलि रितु
आंसु पडि़ जूंन बाबुक घर रितु

लाडि़ली चेलिया भालाघर देछन रितु
मैं बेचि खायूं ये चौगंगा पार रितु
म्यर देस मैत का मनखि ले न उंना रितु
को उंछ भेटुलि रितु’

लोकगीत : संस्कार विषयक कथागीत :

 

sanskarलोकगीत : संस्कार विषयक कथागीत :

संस्कारों के अंतर्गत ‘ज्यूंति पूजा’ के अवसर पर ‘नंदू बालो’ नामक एक कथागीत
गाया जाता है। इस कथागीत में नंदू नामक बालक अपनी माता से खाना बनाने का
आग्रह करता है, क्योंकि उसे पूजा के फूल लेने के लिए जमुना पार जाना है।

मां पूछती है कि तुम वहां कैसे जाओगे ? तुम्हें रास्ता कौन दिखाएगा ? नदी कौन पार
कराएगा ? बालक उत्तर देता है कि दो आंखें रास्ता दिखाएंगी, दो जांघें नदी पार कराएंगी।
फिर वह बालक एक डलिया बिनने वाले के पास जाकर एक डलिया बिनने को कहता
है। वहां से एक लोहार के पास जाकर एक छोटा सा हथियार गढ़ने को कहता है। फिर
रास्ते की कठिनाइयों को पार करता हुआ वह नागिन के पास पहुंचता है और मासी का
फूल तोड़ने के लिए कहता हैै।

नागिन उससे पूछती है कि – तू दुखी है या जुए में हारा है ? बालक को टालने के लिए
नागिन कहती है कि – तू पइयां के फूल ले जा। रूखी-सूखी पत्ती ले जा। बालक कहता है
कि – पइयां के फूलों या झड़े पत्तों से पूजा नहीं होती। मैं तो नाग के सिर पर पैर रखकर
वृक्ष से फूल तोड़कर ले जाउंगा, जो मेरे मामा कंस राजा के यहां ज्यूंतिपूजा के लिए चाहिए।
यह कहकर वह बालक मासी के फूल से अपनी डलिया भरकर लौटता है।

झडि़या पडि़या को पूजा नि हूनी
पैंया पाति की पूजा नि हुनी
मैं लि जूंलो रूख का टिपिया रे
नाग की माथी में खूटा धरूंलो
ली मैं जूंलो रूख का टिपिया रे
भला भला कुरिड़ भरौंलो
मेरे मामा का कंस राजा का ज्यूंति पूजा
वाँ रे चैनीं मासी का फूल ए।

लोकगीत : कथागीत :

kathagitलोकगीत : कथागीत :

हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी एक आध सदी के प्रयासों का नहीं, वरन् हजारों
वर्षों के संघर्ष और चिन्तन का प्रतिफल हैं; जिनका प्रत्येक पहलू अनन्त काल से
चल रहे देवासुर संग्राम अर्थात् अच्छाई और बुराई के युद्ध से सीखा हुआ सबक है।
गेय होने के कारण कुमाउनी लोकगीतों के अंतर्गत कथागीतों एवं लोकगाथाओं की
चर्चा करना अस्वाभाविक नहीं ।

कथागीतों का सौंदर्य गायन की अपेक्षा वर्णन की शैली में अधिक निखरता है। इनकी
भावधारा बड़ी खूबसूरती के साथ संवादों के माध्यम से आगे बढ़ती है। संवाद अन्य
लोकगीतों में भी होते हैं, पर वहां किसी परिस्थिति या मनस्थिति का उद्घाटन होता है,
जबकि कथागीत में घटना प्रधान होती है। इसके अतिरिक्त कथागीतों में मुख्य घटना के
साथ अवांतर प्रसंग नहीं होते, जिसके कारण आकार में ये अन्य लोकगीतों से अलग प्रतीत
नहीं होते और प्रकार में लोकगाथाओं से भिन्न माने जाते हैं।

यह भिन्नता केवल आकार में ही नहीं, वरन् कथ्य में भी परिलक्षित होती है। इनमें किसी
पौराणिक, ऐतिहासिक या सामाजिक घटना का वर्णन होता है। विषयवस्तु के आधार पर
कुमाउनी कथागीतों को वर्गीकृत भी किया गया है; जैसे संस्कार विषयक, ॠतु विषयक,
कृषि विषयक, शौर्य विषयक आदि। ‘सोगुन’ जोहार के शकुनाक्षर हैं।”

लोकगीत : विशिष्ट गीत :

vishishलोकगीत : विशिष्ट गीत :

डॉ0 त्रिलोचन पांडे ने अपनी पुस्तक ‘कुमाउनी भाषा और उसका
साहित्य’ में लिखा है कि स्फुट गीतों के ”विशिष्ट वर्ग में ‘घन्याली’,
‘गणतौ’, ‘ढोसुक’, ‘सोगुन’ आदि के उदाहरण तो मिल जाते हैं,
किंतु ‘कड़खा’, ‘फांक’, ‘पौंड’ और ‘ड्योड़’ आदि के उदाहरण
नहीं मिलते।

‘घन्याली’ को ‘घट्याली’ अथवा ‘घटेली’ भी कहते हैं। घण्टी बजते
रहने के कारण संभवत: गीत का यह नाम पड़ा है। अथवा प्रत्येक शब्द
के अंत में ‘घन्याली’ शब्द की पुनरूक्ति होने के कारण यह नाम पड़ा
होगा।’गणतौ’ वस्तुत: ‘गणतू’ (गणना करने वाला) से बना है, जो
ग्रामीण क्षेत्रों में ज्योतिषी का नाम है। इसमें अभिमंत्रित वस्तु द्वारा शुभाशुभ
का विचार कराया जाता है। यह दानपुर पट्टी की ओर अधिक प्रचलित है।

‘ढोसुक’ मुख्यत: मंगलामुुखियों द्वारा दीपावली के अवसर पर गाए
जाते हैं और चौखुटिया, मासी क्षेत्रों की ओर अधिक प्रचलित हैं।
इनमें ‘डफ’ बाजा बजता है।

लोकगीत : नृत्य गीत :

nrityageetलोकगीत : नृत्य गीत :

मार झपुका सिलगड़ी का पार चाला मार झपुक
मार झपुका मैता का असुरज्यू हो मार झपुक

मार झपुका सब दिन दयाल होला मार झपुक
मारझपुका गंगा ज्यू का बगड़ में हो मार झपुक

मार झपुका भुरा भुरा मेल ज्यू हो मार झपुक
मार झपुका धोपैरी को घाम लाग्यो मार झपुक

मार झपुका नां पानी नां सेल ज्यू हो मार झपुक
मार झपुका धौल बलद कैका होला मार झपुक

मार झपुका नौं घर हरी का ज्यू हो मार झपुक
मार झपुका यसा दिना रौंप हुन कि मार झपुक

मार झपुका जनम भरी का ज्यू हो मार झपुक
मार झपुका सिलगड़ी का पार चाला मार झपुक

लोकगीत : पर्यावरण गीत :

paryavaranलोकगीत : पर्यावरण गीत :

नी काटा नी काटा
झुपर्याली बांज
बंजानी धुरा ठण्डो पानी

ठण्डो पानी
ठण्डो पानी बांज
बंजानी धुरा ठण्डो पानी

यो दिन यो बार
मेरी उमर की बात
भुलुलो भुलुलो कूंछी
बांकी ऊँछी याद

नी काटा नी काटा
झुपर्याली बांज
बंजानी धुरा ठण्डो पानी

ठण्डो पानी
ठण्डो पानी बांज
बंजानी धुरा ठण्डो पानी