छठी :

chhathiलोकगीत : छठी :

छठी के गीतों में जच्चा की मन:स्थिति और इच्छाओं का वर्णन करने के
साथ-साथ ननद-भावज को दिए जाने वाले नेगों की चर्चा एवं हास-परिहास
होता है, जिन्हें स्त्रियां सहर्ष गाती हैं।

आहो छट्टी हमारा घर छट्टा दिन छटा मास
छट्टी सुणी सांचो मैले रोहिणी पिठ्याउँ , साली का अच्छत
छट्टी सुणी सांचो मैले मोहर असरफी
छट्टी सुणी सांचो मैले रेशम वस्त्र
छट्टी सुणी सांचो मैले लाडु सुंवाली, बीड़ा बताशा
छट्टी सुणी सांचो मैले खेता काजां ऊँ
छट्टी सुणी सांचो मैले गाइ को गोबर, दूद घिरत …

संस्कार गीत :

sanskarलोकगीत : संस्कार गीत :

अनिवार्य संस्कार गीतों के बाद संस्कार विशेष से संबंधित गीत गाने की परिपाटी है,
जो मौखिक परम्परा में पल्लवित होने के कारण शिल्प की दृष्टि से भले ही उन्नीस
लगते हों, पर भाव की प्रबलता के कारण प्रभाव की दृष्टि से पर्याप्त हृदयस्पर्शी होते हैं।
उनके विधि-विधान का अनुपालन ही लोकजन को एक विशेष प्रकार के सामाजिक ढांचे
में ढालता है।

एक संस्कार गीत में जन्म से लेकर विवाह तक के दैनिक, मासिक व वार्षिक संस्कारों
का क्रमबद्ध उल्लेख मिलता है। पहले जन्म से लेकर नामकरण तक के कर्मों का विवरण
है; जैसे- पहले दिन ‘जात’ लगाना, तीसरे दिन ‘तिछोड़ी’ करना, पांचवें दिन ‘पंचोली’
होना, छठे दिन ‘षष्ठी’ पूजन, नवें दिन ‘नौल’ स्नान, ग्यारहवें दिन ‘नामकरण’ आदि।

बाद में बाइसवें दिन ‘बैसोली’, छठे महीने ‘अन्नप्राशन’, वर्ष पूरा होने पर ‘जनमबार’,
तीसरे वर्ष ‘चूड़कर्म’, पॉंचवें वर्ष ‘कर्णवेध’, आठवें वर्ष ‘जनेऊ’ और बारहवें वर्ष ‘विवाह’
का वर्णन है। लोक व्यवहार में उक्त अवस्था में आज इतने कर्मों का विधान नहीं रह गया है,
पर कम से कम इन संस्कारों के नाम यथावत् संरक्षित हैं।

अभिषेक :

abhishekलोकगीत : अभिषेक :

गंग जमुन को पाणि ए
कुंभ कलश को पाणि ए
सिंचनीं पुरोहित ए
छोड़नीं जजमान ए
तुमरी सोहागिली जनमैं आइवांती ए
जनमैं पुत्रवांती ए
सिंचनी अरजुन ए भीम ए वशिष्ट ए
छोड़नीं रामीचंदै छोड़नीं लछीमण ए
पढ़ी गुणी बिरामनै देला असीस ए
जीयौ तुमि जजमानै लाखै बरीस ए

अग्नि स्थापन :

img-20151021-wa0011agniलोकगीत : अग्नि स्थापन :

होम हेतु अग्निदेव की चारों दिशाओं में खोज की जाती है,
जो अन्तत: पीपल के पेड़ के नीचे मिलते हैं।  ……

पूर्व को देश मैले हेरी फेरी नहीं पाया
वैश्वानर देव ए नहिं पाया
पश्चिम को देश मैले हेरी फेरी नहीं पाया
वैश्वानर देव ए नहिं पाया
उत्तर को देश मैले हेरी फेरी नहीं पाया
वैश्वानर देव ए नहिं पाया
दक्षिण को देश मैले हेरी फेरी नहीं पाया
वैश्वानर देव ए नहिं पाया
पीपल की डाली मुणी पाया छन
वैश्वानर देव ए पाया छन
चल तुमी वैश्वानर मध्य लोक
तुम बिना होम नहीं यज्ञ ए तुम बिना

लोकगीत : नवग्रह पूजा :

navagraha_pujaलोकगीत :: नवग्रह पूजा ::

अनिष्ट निवारण एवं भाग्योदय हेतु यह कामना की जाती है
कि सभी ग्रह अपने वाहनों पर सवार होकर इस शुभ कार्य में उपस्थित हों।

जै मंगल शुभ मंगल ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
गावंत जै मंगल बोलंत शुभ मंगल ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
मूषक वाहन चढि़ गणपति ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
हंस वाहन चढि़ ब्रह्मा ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
गरूढ़ वाहन चढि़ विष्णु ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
वृषभ वाहन चढि़ शम्भु ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
सिंह वाहन चढि़ देवी ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
हस्ती वाहन चढि़ इंद्र ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
रथ वाहन चढि़ सूर्य ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
मृग वाहन चढि़ चंद्र ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
मेष वाहन चढि़ भौम ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
सिंह वाहन चढि़ बुद्ध ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
हस्ति वाहन चढि़ गुरू ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
अश्व वाहन चढि़ शुक्र ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
वृषभ वाहन चढि़ शनि ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
सिंह वाहन चढि़ राहु ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
गृद्ध वाहन चढि़ केतु ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
अश्व वाहन चढि़ गोल ज्यू चलि आये ऊन शुभ मंगल इनू घरिये
मूषक वाहन चढि़ गणपति ज्यू आया छन

लोकगीत : कलश स्थापन :

kalashलोकगीत :: कलश स्थापन ::

गंगा-यमुना के जल, दही-दूध, घी-हल्दी, अक्षत-रोली, रेशमी वस्त्र,
त्रिसूत्र धागा, फूल-दूब, सप्तधान्य, औषधि, धनद्रव्यादि से कलश स्थापना की जाती है।

धरती धरम लै कलश थापि ले
आजु भरियो कलश,
आज बधावन नगरी सुहावन
सप्त धान्य लै कलश थापि ले
तामा का कुंभ लै कलश थापि ले
गंगा जमुना का नीर लै कलश थापि ले
चतुमुर्ख ब्रह्मा लै कलश थापि ले
दधि दूध घृत लै कलश थापि ले
हल्दी की गांठि लै कलश थापि ले
रोहिणी पिठ्या लै साई का अक्षत लै
रेशमी वस्त्र लै त्रिसूत्रा धागा लै कलश थापि ले
फूल-दूब लै कलश थापि ले
गाई का गोबर लै कलश थापि ले
खेत का जौ लै कलश थापि ले
आजु भरियो कलश,
आज बधावन नगरी सुहावन
लाडू सुवाल लै कलश थापि ले
फीणी बतासन लै कलश थापि ले
सर्व धान्य लै सर्व औषधिन लै कलश थापि ले
धन-द्रव्य लै कलश थापि ले
पंच पल्लव लै कलश थापि ले
पंच रतन लै कलश थापि ले
आजु भरियो कलश,
आज बधावन नगरी सुहावन

लोकगीत :: पुण्याह वाचन ::

punyahलोकगीत :: पुण्याह वाचन ::

रामीचंद्र लछीमन दिन छन
धरणी धराय हो धरणी धराय
सीतादेही बहुराणी दियो बड़ो दान त
बड़ो रे अविय लै संपत्ति पुरियले
ऐवांति मंगल देली त ब्राह्मण वेद पढ़े
सुहागिनी मंगल देली त ब्राह्मण वेद पढे ….

(परिजनों के नामोच्चार सहित गायन)