लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 11

lakshy a 11लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 11

हिंदी रूपांतर

तुम्हारी मृत्यु जिस दिन (भी) जहाँ कहीं भी हुई-
(तुमने) मुँह-आगे, पीठ-पीछे कुछ भी नहीं देखा।
(तुम्हारा जीवन अन्धकारमय हो गया था)।

मृत्यु के दिन तुम्हें पानी नहीं मिला?
तुमने मृत्यु के दिन पानी नहीं पाया,
तो पानी पिलायेंगे।

मृत्यु के दिन तुमने वस्त्र नहीं पाये?
तुमने वस्त्र नहीं पाये,
तो वस्त्र दिलायेंगे।

नदी में बहकर मरे हो तो,
(तुम्हारा) फन्दा कटवायेंगे।
काँठे से गिरकर मरे हो तो,

पखाण कटवायेंगे।
तुम्हारा बड़ा कुल है, बड़ा वंश है।
अपने वंश का नाम मत डुबाना । क्रमशः

लोकगीत : लोकगाथा :

lokgathaलोकगीत : लोकगाथा :

लोकसाहित्य सदियों तक जन-गण-मन पर अपना प्रभाव बनाए रखता है। मन को एक
ओर यदि मुक्तक रचनाओं के भावानुभावों की अभिव्यंजना लुभाती है, तो दूसरी ओर प्रबंध
रचनाओं के चरित्रों की विशेषता भी आकर्षित करती है। यही कारण है कि मन की कोमल
भावनाओं से अनुरंजित लोकगीत भुलाए नहीं भूलते और चारित्रिक विशेषताओं से अनुप्राणित
लोकगाथाएं बरबस याद आती हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि लोक साहित्य के पुराचरित्रों के माध्यम से सम-सामयिक
भावबोध की जटिलताओं का विश्लेषण करना आसान नहीं होता, तथापि प्रत्येक युग
अपने ऐतिहासिक अनुभवों को सदैव नई दृष्टि से व्याख्यायित करना चाहता है।
शायद इसीलिए हर युग का कलाकार सृजनात्मक स्तर पर अतीत एवं वर्तमान के
परोक्ष तथा प्रत्यक्ष समाजों को समानांतर रखकर शाश्वत जीवन मूल्यों पर सही का
निशान लगाना चाहता है।

कुमाऊँ का लोक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। इसकी लोकगाथाओं में गद्य-पद्य मिश्रित चंपू
शैली के दर्शन होते हैं। गाथाओं के विस्तृत वर्णन में अनेक स्थल ऐसे भी आते हैं, जहां
पद्य का स्थान गद्य ले लेता है, पर गायक उस अंश को भी लय के साथ गाकर प्रस्तुत
करता है। विषयवस्तु के आधार पर कुमाऊँ में प्रचलित लोकगाथाओं को निम्नवत्
विभाजित किया जा सकता है ; जैसे – परंपरागत, पौराणिक, धार्मिक और वीरतापरक।

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 10

lakshya a 10लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 10

हिंदी रूपांतर

अपने हृदय में सत्य-स्मरण किया।
हृदय में गुरु का ध्यान किया।
वायु का पुत्र था (अर्जुन) ब्रह्मा का नाती।

कुन्ती का पुत्र था (अर्जुन)
कोख का पूत।
तैल की कड़ाह में (उसने)

मछली की आँख भर देखी।
सुनहरी मछली पर सरसंधान किया।
योद्धा ने धर्मचक्र घुमा दिया।

(तू) ब्राह्मण घराने का ब्राह्मण-कुमार है।
(तू) ठाकुर घराने का महाराजा है।
(तू) क्षत्रिय घर का बड़ा वीर है।

(तू) किस उद्देश्य से मरा,
किस व्यथा से मरा?
अपना व्यथा-लक्ष्य मुझसे क्यों नहीं कहता?
क्रमशः ए

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 9

lakshy a 9लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 9

हिंदी रूपांतर

पूर्व के राजा थे युवनाश्व राजा।
पश्चिम दिशा के राजा थे मोरध्वज राजा।
उत्तर दिशा के राजा थे हिमाचली राजा।

दक्षिण दिशा के राजा थे तालध्वज राजा।
एक-एक कर (सबने) सर-संधान किया।
तैल की कड़ाह में कुरा सा दिखाई दिया।

श्री कृष्ण ने साथ किया अर्जुन का।
धर्मचक्र में सुदर्शन (चक्र) लगाया
(सुदर्शन) चक्र की छाया से दृष्टि (ठिकाने) न पहुँची।

किसी भी राजा का बाण लक्ष्य पर न लगा।
राजा द्रुपद ने आदेश दिया-
तुम ब्रह्मचारी, लोग लक्ष्य-बेध करो।

योद्धा अर्जुन खड़ा हो गया।
बाहु-दंड से धनुष निकाला।
सिखा की लटों से बाण। क्रमशः

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 7

lakshya a 7

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 7

हिंदी रूपांतर

राजकुमारों की भीड़ जुड़ी थी।
दरी-दीवानों की एक (अलग) कचहरी थी।
श्रेष्ठ ब्राह्मणों की एक (अलग) कचहरी थी।

योगियों, भक्तों की एक (अलग) कचहरी थी।
संन्यासी बैरागियों की एक (अलग) कचहरी थी।
दासी उदासियों की एक (अलग) कचहरी थी।

राजा द्रुपद ने अब क्या किया?
रानियों के अन्तःपुर में आदेश दिया-
कन्या द्रोपदी को श्रृंगार करवाने का आदेश दिया।

राजाओं की दासियाँ वस्त्र पहिनाने लगीं।
तेल-फुलेल का छिड़काव करने लगीं।
चोबा चन्दन, हीरामणि मालायें पहिनाने लगीं।

पटूमर धोती पहिनाने लगीं।
लली-द्रोपदी, माँ के कंठ से चिपक गई।
मेरे पिता ने लक्ष्यबेध (की शर्त) बाँधी। क्रमशः

लोकगाथा: लक्ष्य- बेध 6

lakshya a 6लोकगाथा: लक्ष्य- बेध 6

हिंदी रूपांतर

उत्तर दिशा में हैं पाँचाल देश।
तीन वर्ष का रास्ता है, भाई गरुड़।
पक्षी गरुड़, हम नहीं आ सकते।

तब गरुड़ बोलने लगा-
तुम सभी पाण्डव मेरी पीठ में बैठ जाओगे।
दो घड़ी में (ही) पाँचाल देश पहुँचा दूँगा।

पाँचों भाई गरुड़ की पीठ में बैठ गये।
माता कुन्ती भी गरुड़ की पीठ में बैठीं।
गरुड़ पक्षी उड़ चला।

पाँचाल देश में थी कपिला नगरी।
उस नगरी में रहता था आत्माराम।
पाण्डव उसके डेरे में रहे (एक रात),

पाण्डव हैं’-यह कोई नहीं जानता (था)।
पाण्डवों का कुल, कौतुक (के स्थान पर पाँचाल) पहुँचा।
राजाओं और राजाओं की भीड़ जुटी थी। क्रमशः

लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 5

lakshya a 5लोकगाथा: लक्ष्य – बेध 5

हिंदी रूपांतर

श्री कृष्णदेव ने गरुड़ बुलाया।
गरुड़ पक्षी! तुम पाण्डवों की खोज लाओ!
गरुड़ पक्षी पाँचाल देश की ओर चल पड़ा।

पक्षी, घुमने लगा हे हरी! चारों दिशाओं में घूमने लगा।
घूमता-फिरता पक्षी दक्षिण दिशा पहुँचा।
दक्षिण दिशा में बहती (थी) नर्मदा नदी।

नर्मदा के किनारे, उसने कुटिया देखी।
कुटिया के ऊपर घूमा गरुड़ पक्षी।
राजा युधिष्ठिर समाचार पूछने लगे।

राजा युधिष्ठिर से पक्षी ने कहा-
श्री कृष्णदेव ऐसा कहते थे कि-
तुम पाण्डव पाँचाल चले आना।

कन्या द्रोपदी के (स्वयंवर हेतु)
लक्ष्य-बेध निश्चित हुआ है।
राजा युधिष्ठिर बोलने लगे-
हम लोग दक्षिण दिशा में हैं। क्रमशः