लोकगाथा: हरू सैम 5

haru m 5लोकगाथा: हरू सैम 5

भभूत को गोलो लियो, सुनू की मेखला हो।
हिय हार माला पैरी, केदारी फरुवा हो।
सिर में साफी पैरी, दुमुखिया चिमटा हो।
धुनी का किनारे बैठी, अनठणि जोगी बण्यो हो।

चैबाटी की धूल पकड़ी, बोकसाड़ी विद्या हो।
भभूत को गोलो लियो, आग को रे शोलो हो।
बणी-ठणी जोगी बेष, बाट लागी गया हो।
तली हठी माल आयो, भिजिया रमूँछ हो।

बणबाषा को भात, उड़द की दाल हो।
भोग न लागनूँ दिगौ भुक्वे रई जाँछ हो।
तली हठी माल बटी, श्यामा खेगत मँज हो।
खैराणी भुजाणी बटी आयो धरमैं का घर हो।

ठुलखाला दशौली बटी बेरीनाग पुज्यो हो।
थल-बागनाथ बटी हुपुली नागणी हो।
धाणधुरा पुज्यो जोगी, अन बिदो जोगी हो।
धौली गंगा धाल तरी हुमा घुरा लाग्यो हो। क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 4

haru m 4लोकगाथा: हरू सैम 4

बिरछा का नौ सैलले न बैठ्यै हो।
ज्यूनी मैं को चैलो हौलै मेर नित्तित्तर आलै हो।
सात राणी तेर घर छन।
अठूँ मैं पिंगलास बेवै लैजालै हो।

मर्यूँ मैं को चेलो हौले बिनराबनै रोले हो।“
आधाराति सपना पिंगला हरानि हो।
हरेहरुसैमज्य नींन भंग है गैछ हो।
रहनी रतूड़ा में मुरुली बजूँछ, आँङुली नचूँछ् हो।

मसाणी कैजू क्या बोली बोलाँछी हो-
सागरी को सैंम आज उदासी है गयो हो।
कित सौत नागणी राणी ले टहले न करी हो।
कित सीणी खाट आई पूज्या खटमल राकस हो।

”कौहो बाबा हरुसैंम, मन को बयान हो“।
मनकि बयान हरु बिंदराबन है बाटा लाग्यो हो।
बुकी को सुनू लियो, दुध-चाँदी बर्तन हो।
भगुवा कपड़ा लियो, हाथ को कंगन हो। क्रमशः

लोकगाथा : हरू सैम 3

haru m 3लोकगाथा : हरू सैम 3

गाई धन देला सैंमज्यू
कलड़िया ठाट हो।
बैगिया लछिमि दी देला
दी देला चारै पदारथ हो।

सुपना में देखी सैमज्यू ले
छिपूला को कोट हो।
पिछुला का कोट होलि
राणि पिंगला हो।

बार भाई छिपुलों की होली
एक राणी पिंगला हो।
पिंगला देखी सैमज्यू जाणी
कै रुबा को कातो हो।

जाणी पुन्यू की चाननी,
बैसाखी सूरिज हो।
आधी रात मजा पिंगला
क्या बोली बोलाँछी हो-

”जै दिन बटी पिंगला का आयूँ
की दिन बती सदाबर्त छना हो।
सदावर्त अस्नान करँछु हो।
देखनक नों देवतै न देख्यो हो। क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 2

haru m 2लोकगाथा: हरू सैम 2

अस्सी सौ मसाण होला नौ सौ नारसिंह हो।
निलाट का ताड़ा होला आकाष का गोला हो।
छिनै की बयाल होली राणीज्यू की गाल हो।
कणधुँआँ की आग होली भभूति का गोला हो।

बिन्द्राबन मेंजा होली सैमज्यू की सभा हो।
बिन्द्रावन का राजा होला, हरी हरूसैंम हो।
सात राणी नागणी छना अठूँमसाणी कैंजा हो।
गै-भैंसो गोठाण छना नागा-भाग भैंसी हो।

चनुवाँ हेलाण छना रौंली-कौंली गाई हो।
बिन्दबाँ बहड़ छना गै-भैंसी गोठाणी हो।
सुतरौटी खाट होली रतनौटी कामलि हो।
पैनाण धरीको होलो पैसालो रमटा हो।

सिनाण घरीकि होली रंग-बादी बाँसुरी हो।
बिन्द्राबन-क सिंहासन सीती पणीं ह्वाला हो।
अधराती मँजा हरुसैंम, बरदाई देवता हो।
माँगता वर देला हो जीव सरस्वती हो। क्रमशः

लोकगीत : अवतार संबंधी :

avtaarलोकगीत : अवतार संबंधी :

कुमाऊं में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों से संबंधित
लोक गाथाएं भी गाई जाती हैं। इन गाथाओं में वाराह
अवतार, वामन अवतार, नृसिंह अवतार आदि की गाथाएं
अधिक प्रचलित हैं –

हिरणकसिपु बर लै मांगछ
अजर है जाऊं अमर है जाऊं
मिरता का लोक अमर नै हुना
दुव्या हात बटी कबै जन मरूं
आकास नी मरूं पैताल नी मरूं
जल मैं नैं मरूं थल मैं नैं मरूं
भैर ले नी मरूं भार ले नी मरूं
रात ले नी मरूं दीन ले नी मरूं
हत्यार की चोट भेल ले नी मरूं

नागवंश संबंधी

कुमाऊं में नागवंश की वंशावली से संबंधित एक विशेष
लोकगाथा भी प्रचलित है, जिसके अनुसार श्रीकृष्ण नागवंशी थे।
उनकी माता देवकी का विवाह वासुकि नाग के साथ हुआ था।
नागों की उत्पत्ति के संबंध में यह वर्णित है कि राजा औख की
चार रानियां थीं। दिति से देवता, अदिति से असुर, कद्रू से गीध
और वनिता से नाग उत्पन्न हुए थे।

असुरों का राजा कंस देवताओं तथा मनुष्यों पर अत्याचार करता था।
ब्रह्माजी के परामर्श से देवताओं ने अपनी जांघें चीरकर रक्त भरा
घड़ा उसके पास भेजा, कंस ने वह घड़ा अपनी वृद्धा मां पवनरेखा
को दिया। घड़े को सूंघने पर उसकी हवा मां की नाक में चली गई
जो उसकेे पेट में जाकर गर्भ बन गई। उसी गर्भ ने आगे चलकर
देवकी के रूप में जन्म लिया।

लोकगाथा: हरू सैम 1

 

haru m 1लोकगाथा: हरू सैम 1

बरमा विष्णु बैठीं छना बैकुँठे का राज।
पँचकोटि देवा छना कछरी का लोग।
धूनी जागी रैछ कैलास, शिव भोलानाथ की।
हरज्यू की सभा बैठीं छना विष्णु लोक मँजा जो।

देवलोक बैठीं छना देबतन की सभा हो।
गोकुल में बैठीं छना कृष्णज्यू की सभा हो।
द्वारिका में बैठी छना रामज्यू की सभा हो।
हस्तिनागढ़ बैठीं छना पाण्डवों की सभा हो।

हरि-हरिद्वार में बैठीं छना हसुलागढ़ै की सभा हो।
हरि-हरिद्वार में होलो भागीरथी किनार हो।
हरिज्यू की धूनी होली हरद्वार मँजा हो।
हँसुलागढ़ै में होला बारनाम बैरागी हो।

नवै नाथ बैठीं होला सोल नाम संन्यासी हो।
चैखट जोगणी होला बावन बीर हो।
छत्तीस रौतान होला बत्तीस पैरूणी हो। क्रमशः

लोकगाथा: धार्मिक:

dharmik (2)लोकगाथा: धार्मिक:

लोक प्रचलित विश्वासों से अभिप्रेरित ‘जागर’ कुमाऊं
में धार्मिक लोकगाथा के नाम से जाने जाते हैं। तंत्र
मंत्र एवं देवावतरण से संबंधित इन गाथाओं के गायक
जगरिया कहलाते हैं।

जगरिया अभीष्ट की प्राप्ति के लिए अपने गायन से
किसी देवी या देवता को जगा ने का विधिवत् प्रयास
करते हैं। नृत्य इन गाथाओं का अविच्छिन्न अंग है।

नाचने वाला व्यक्ति ‘डंगरिया’ कहलंतं है। वह स्त्री
या पुरुष कोई भीहो सकता है। थाली, डमरू, ढोल,
नगाड़ा वाद्यों के बीच देवता को उद्बुद्ध करने पर
एक विशिष्ट वातावरण उत्पन्न होता है।

जिसका प्रभाव पड़ने के कारण ‘डंगरिया’ उठ कर
नाचने लगता है। वह हुंकार करके जोर जोर से घूमने
लगता है। इसे देवता विशेष का ‘अवतरण’ कहते हैं।

तब वहां एकत्र लोग इष्ट आगमन से प्रसन्न होकर उसे
आस्था के साथ नमन करके उससे प्रश्न पूछने लगते हैं।
उत्तर पाते हैं। समस्याएं बताते हैं। समाधान पाते हैं।