बोली और भाषा

boliboli

 बोली –

बोली किसी भाषा का एक ऐसा विशिष्ट रूप होता हैं, जो अपनी भाषा के एक निश्चित भू भाग में व्यवहृत होता है।

उच्चारण, व्याकरण या मुहावरों की दृष्टि से अपनी भाषा से आंशिक भिन्नता रखने के कारण बोली का स्वतंत्र रूप प्रकट होता है,

लेकिन यह अन्तर भाषा या उसकी अन्य बोलियों से इतना अधिक भी नहींं होता कि उसे अलग भाषा माना जा सके।

भाषा –

कोई बोली तभी तक बोली मानी जाती है, जब तक वह सामान्य जन की बोलचाल का माध्यम होने के साथ-साथ

अन्य सार्वजनिक कार्यों का माध्यम नहीं बनती। जब सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक या राजनीतिक कारणों से

कोई बोली अपने विस्तृत भू भाग के साहित्य एवम् शिक्षा जगत के साथ.-साथ शासन के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हो जाती है,

तो वह भाषा का दर्जा पाती है।

उपादेयता –

बोली जीवन का अंग होती है।

बोली परिवेश से अर्जित की जाती है।

बोली आत्मीयता की द्योतक होती है।

बोली व्यक्ति के समाजीकरण का माध्यम होती है।

बोली का प्रयोग अनौपचारिक सन्दर्भों में समाज का प्रत्येक व्यक्ति करता है।

बोली के माध्यम से विभिन्न वर्गों के लोग परस्पर विचार विनिमय कर लेते हैं।

बोली भाषासमाज को जोड़ती है ।

बोली से ही भाषा जन्म लेती है।

भाषा

pahadi

पहाड़ी भाषा

‘भारत का भाषा सर्वेक्षण’ के लेखक ग्रियर्सन ने

भारतीय आर्य भाषाओँ को तीन उपशाखाओं में विभाजित किया –

बहिरंग, अन्तरंग और मध्यवर्ती. इन तीनों उपशाखाओं में

६ भाषा समुदायों तथा १७ भाषाओँ की गणना की गयी है.

इस वर्गीकरण में कुमाउनी/गढ़वाली को अर्थात मध्य पहाड़ी को

मध्यवर्ती उपशाखा के पहाड़ी भाषा समुदाय में स्थान दिया गया है.

पहाड़ी भाषा समुदाय हिमाचल प्रदेश के भद्रवाह के उत्तर-पश्चिम

से लेकर नेपाल के पूर्वी भाग तक विस्तृत है.

इसके तीन प्रमुख रूप हैं – पूर्वी, पश्चिमी व मध्य.

पूर्वी पहाड़ी नेपाल में बोली जाती है.

पश्चिमी पहाड़ी हिमाचल प्रदेश में प्रयुक्त होती है

और मध्य पहाड़ी उत्तराखंड में व्यवहृत होती है.

मध्य पहाड़ी के अंतर्गत गढ़वाल में गढ़वाली

तथा कुमाऊँ में कुमाउनी का प्रचलन है.