पश्चिमीकुमाउनी

 

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6- रौचौबैंसी –

नैनीताल जनपद की दो पटि्टयों रौ और चौबैंसी के नामों को मिलाकर
इस बोली का नामकरण किया गया है। रौ और चौबैंसी के अतिरिक्त
रामगढ. तथा छखाता के पर्वतीय भाग – नैनीताल , भीमताल , सातताल ,
नौकुचियाताल ,मलुवाताल आदि – इस बोली के प्रमुख केन्द्र हैं।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

ध्वनि –
ए – य : जेठ – ज्यठ
ह – स : हुणि – सुणि

प्रवृत्ति –
महाप्राणत्व : लिन – ल्हिन
अघोषीकरण : सबन – सपन

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

परसर्ग –
कर्म/सम्प्रदान : कन , हुणि , सुणि
करण/अपादान : थै , है

क्रिया –
वर्तमान : चाहता हूँं – चॉंछ
भूत : थे – छि

पश्चिमी कुमाउनी

 

 

 

 

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5 – पछाईं – काली कुमाऊं की तर्ज पर काली कुमाऊं का पश्चिमी भाग पाली नामक
कस्बे के आधार पर पाली पछाऊं कहलाया। पाली पछाऊं के निवासियों की बोली
पछाईं के नाम से प्रसिद्ध है। इस बोली के प्रमुख केन्द्र जनपद अल्मोडा में फल्दाकोट ,
रानीखेत , द्वाराहाट , मासी , चौखुटिया आदि हैं।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

ध्वनि –
ल – व : जंगल – जंगव
य/भ – ह : यस भय – हस हय

प्रवृत्ति –
अघोषीकरण : बैठण – फैटण
ह्रस्वीकरण : आपुण – अपुण

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

परसर्ग –
कर्म/सम्प्रदान : कण , हणि , हातणि
करण/अपादान : हॉंति , है

क्रिया –
वर्तमान : चाहता हूँं – चॉंछ
भूत : थे – हाय

पश्चिमी कुमाउनी

 

 

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4 – दनपुरिया –

बागेश्वर जनपद के दानपुर परगने में प्रचलित होने के कारण यह
दनपुरिया कहलाती है। इस बोली के प्रमुख केन्द्र मल्ला दानपुर ,
तल्ला दानपुर , बिचला दानपुर , मल्ला कत्यूर , तल्ला कत्यूर ,
बिचला कत्यूर , पल्ला कमस्यार , वल्ला कमस्यार , नाकुरी ,
तथा मल्ला रीठागाड. नामक पटि्टयॉं हैं। इस बोली पर भोटिया ,
गंगोली और सीराली बोलियों का प्रभाव भी दिखाई देता है।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

ध्वनि –
र – ड. : छ्योर – छ्योड.
स – ह : साग – हाग

प्रवृत्ति –
अल्पप्राणत्व : दूध – दूद
अनुनासिकता : उथ – उथॉं

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

परसर्ग –
कर्म/सम्प्रदान : कन , हुणि
करण/अपादान : थैं , हैं

क्रिया –
वर्तमान : चाहता हूँं – चॉंछि
भूत : थे – हुवॉं

पश्चिमी कुमाउनी

chaugar2 – चौगर्खिया –

अल्मोडा जनपद के चौगर्खा क्षेत्र में बोली जाने के कारण इसे चौगर्खिया
नाम से सम्बोधित किया जाता है। इस बोली के प्रमुख क्षेत्र रीठागाड.,
दारूण, सालम, लखनपुर आदि हैं। इस बोली पर खसपर्जिया का अधिक
प्रभाव होने के कारण कुछ विद्वान इसे खसपर्जिया का पूर्वी विस्तार ही
मानते हैं।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएं –

ध्वनि –
न – ण : स्यैनि – श्येणि
ए – य : केला – क्याव

प्रवृत्ति –

ओकारान्त : कय – कयो
आगम : छि – छिया

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताएं –

परसर्ग –
कर्म/सम्प्रदान : कन , हुणि
करण/अपादान : है, बटि

किया –
वर्तमान : चाहता हूँ – चांछु
भूत : थे – छिया

पश्चिमी कुमाउनी

 

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1 – खसपर्जिया – पश्चिमी कुमाउनी की प्रतिनिधि बोली .खसपर्जिया अल्मोडा़ के
बारामण्डल परगने में बोली जाती है ।इस परगने में स्यूनरा, महरूडी , तिखून,
कालीगाड़, बौरारौ, कैडा़रौ ,अठागुली ,रिउणी, द्वारसौ, खासपर्जा, उच्यूर तथा बिसौत
पटि्टयों की गणना होती है ।इस बोली का प्रमुख केन्द्र खासप्रजा पट्टी में आने वाला
क्षेत्र है, जहॉ राजा के खास कर्मचारी रहते थे, जब चन्द राजाओं ने अपनी राजधानी
अल्मोडा़ स्थानान्तरित की ।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएॅ –

ध्वनि –
न – ण : पानि – पाणी
स – श : भैंस – भैंश

प्रवृत्ति –
व्यंजनान्त : च्यल – च्या्ल्
लोप : चेलि – चेइ्

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताएॅ-

परसर्ग –
कर्म/सम्प्रदान : कै, कणि, हूँ , हुणि, लिजी
करण/अपादान : लै, हाति, है, बटि,बेर, थैं

क्रिया –
वर्तमान : चाहता हॅूं > चॉंछ
भूत : था/थे – छि

पूर्वी कुमाउनी

 

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4 – अस्कोटी –
पिथौरागढ. जनपद के अस्कोट क्षेत्र में बोली जाने के कारण इसे अस्कोटी कहते हैं ।
अस्कोट तथा उसके चारों तरफ के गांव ही इस बोली का प्रमुख क्षे़त्र हैं। इस बोली पर
जोहारी, नेपाली, राजी, सौका व सीराली बोलियों का प्रभाव दिखाई पड.ता है।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

ध्वनि –
ग – ड़. : नांगड़ – नाड.ड़
म – प : खन्मरिछा – खन्परिछा

प्रवृत्ति –
उकारत्त्व : खान – खानु
महाप्राणत्व : जन – झन

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताएॅं –

परसर्ग –
कर्म/सम्प्रदान : स , खिन
करण /अपदान : थै, है, भटि

क्रिया –
भूत एक वचन : था – थ्यो
भूत बहु वचन : थे – थ्या

पूर्वी कुमाउनी

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1 – कुमैयां – चम्पावत जनपद के काली कुमाऊँ परगने को कुमूँ कहा जाता है ।
यहाँ की बोली कुमैयां के प्रमुख केन्द्र चम्पावत, लोहाघाट, देवीधुरा, सूखीढांग आदि हैं।
कुमाऊँ की प्राचीन राजधानी चम्पावत की बोली होने के कारण कुमय्यॉं को
कुमाउनी की मूल बोली होने का गौरव प्राप्त है।

उच्चारण सम्बन्धी विशेषताएं –

ध्वनि –
ल – न : लूण – नून
ण – न : बैणि – बैनि

प्रवृत्ति –
ओकारान्त : घोड़ – घोड़ो
द्वित्त्व : खुट – खुट्ट

व्याकरण सम्बन्धी विशेषताए ¡-

परसर्ग –
कर्म /सम्प्रदान : खन ,हन
करण /अपादान : सित, थैं, है, बटे

क्रिया –
भूत काल एक वचन : था – छ्यो
भूत काल बहुवचन : थे – छ्या्