पर्व: प्रतीक्षा:

पर्व: प्रतीक्षा:

भक्तिकालीन सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी विख्यात कृति पद्मावत के नागमती वियोग खण्ड में लिखा है ेिक – अबहूं निठुर आउ एहि बारा? परब देवारी होइ संसारा। दीवाली के जगमगाते त्योहार का सिलसिला धनतेरस व नरक चैदस से होता हुआ अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचता है, जिसकी निरंतरता गोधन पूजन व भैयादूज तक बनी रहती हैे।

अमावस की रात के लिए तरह तरह से जुटाया गया सायास प्रकाष उषा की नैसर्गिक रष्मियों में अनायास विलीन हो जाता है। दीवाली का दिया कभी हवा के हल्के से झोंके से बुझ भी सकता है, पर दिल में जलने वाला मोहब्बत का दिया विषम परिस्थितियों में भी लगातार जलता रहता है। सिनेजगत के मषहूर षायर साहिर लुधियानवी के अनुसार –

सांसों की आंच पाके भड़कता रहेगा ये
सीने के साथ दिल में घड़कता रहेगा ये
वह दर्द क्या हुआ जो दबाए से दब गया
वह नक्ष क्या हुआ जो मिटाए से मिट गया
दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया
दुनिया की आंधियों से भला ये बुझेगा क्या
फिल्म – एक महल हो सपनों का

पर्व: परिणति:

प्रतीक्षा 

पर्व: परिणति:

कहते हैं कि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। त्योहार की तैयारियों में बीत गया दिन। इंतजार करते करते षाम भी गुजर गई। दीपक से दीपक जल गए, लो आज अंधेरे ढल गए। घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा। यह अंधेरा तभी छंट पाएगा, जब प्रेम का दीप जलाने वाला आएगा।

उसकी राह में नजरें बिछाकर बैठी हुई प्रतीक्षा के लिए एक एक पल भारी है। उसके मन की लगन उसे और कुछ सोचने भी नहीं देती। सारा समाज उजालों से खेल रहा है और वह अपने दिल के दिये के प्रकाष में अपने प्रिय की बाट जोह रही है –

एक वो भी दिवाली थी
एक ये भी दिवाली है
फिल्म – नजराना

दीवाली की जो रात खुले हाथों से जो अपार आनंद लुटाती है, अमित प्रकाष बरसाती है, उसकी परिणति अगली सुबह के उजाले में झलकती है। छतों की मुंडेरों पर लुढ़के हुए दियों, छज्जों की रेलिंग पर गली हुई मोमबत्तियों, सडकों के किनारों पर छितरे हुए पटाखों के खोखों, गलियों के छोरों पर पड़े भस्मीभूत फुलझड़ियों के तारों, आंगनें के कोनों में बिखरे हुए खील बताषों में प्रतिबिंबित होती है।

ताष के बावन पत्ते
पंजे छक्के सत्ते
सब के सब हरजाई
मैं लुट गया राम दुहाई
फिल्म – तमन्ना

दीप जला जा :

 

deep jala jaपर्व: दीप जला जा:

दीवाली की रात बच्चों को बड़ी प्यारी लगती है, लेकिन जो
बचपन की परिधियों व किषोरावस्था की मर्यादाओं को लांघ
चुके हैं, उनका ध्यान खाने पीने की चीजों या आतिषबाजी
के तमाषों तक ही सीमित नहीं होता; बल्कि अपने उस प्रिय
पर भी केन्द्रित होता है, जो तनहाई में उनके दिल का दिया
जलाकर चला गया है। जो उनका मंदिर उनकी पूजा उनका
देवता है। जिसके अभाव में उनका त्योहार सूना है। जिसकी
उन्हें महालक्ष्मी से अधिक प्रतीक्षा है। जिसके बिना दीवाली के
दीप जलाना नहीं भाता –

आई दिवाली
दीप जला जा
ओ मतवाले साजना !
फिल्म – पगड़ी

दीपावली में प्रवासी प्रियतम की प्रतीक्षा परम प्रबल हो जाती है।
जरा सी आहट होती है तो दिल सोचता है कहीं ये वो तो नहीं ?
अगर वो नहीं तो षायद उनका संदेषवाहक ही हो ! यदि वो
नहीं तब तो वो आते ही होंगे, जरूर आते होंगे, आज दीवाली
है ना ? उसकी आषा की किरण किसी भी कीमत पर धूमिल नहीं
होना चाहती। उसके मनोभाव की उसके अलावा और किसी को
खबर नहीं होती, पर दीवाली के दिये उसके मन की बात को
महसूस करते हैं –

झूमझूम कर दिये की बाती
मुझको करे इषारा
जान गई आने वाला है
तेरा साजन प्यारा
दीवली की रात
सजन घर आने वाले हैं
बलम घर आने वाले हैं

फिल्म – कंचन

दिवाली की रात:

divalee

पर्व: दिवाली की रात:

बच्चों को मालूम होता है कि दीपावली की तैयारियां सिर्फ
उन्हीं के घर में नहीं हो रही हैं। लक्ष्मीजी के स्वागत के
लिए प्रत्येक घर के मुख्य द्वार से लेकर पूजाघर तक
उनके पदचिह्न अंकित किए जा रहे हैं। तरह तरह की
अल्पनाएं बनाई जा रही हैं। इस अवसर पर अपनी छोटी
सी खुषी का इजहार करने के लिए वे षाम होते ही दीप
और फुलझड़ी वगैरह जलाने के लिए मचलने लगते हैं।

मस्ती करने के लिए अपने घर की छत पर जाने पर उन्हें
पता चलता है कि सारी छतों पर वही सब हो रहा है। सारा
का सारा मोहल्ला जगमगाने लगा है। जहां तक नजर जाती
है रंगबिरंगी रोषनियां दिखाई देती हैं। चारों दिषाओं से लगातार
छूटते तरह तरह के पटाखों की गूंज सुनकर ऐसा प्रतीत होता
है कि –

धरती पर आए तारे गगन के
खुषियों से भर लो झोलियां
दीप जले घर घर में आई दिवाली
फिल्म – घर घर में दिवाली

आई दीवाली आई, कैसे उजाले लाई, घर घर खुषियों के दीप
जले। कोई पूजन की तैयारी में जुटा है, कोई दिये जला रहा है,
कोई खाने पीने में व्यस्त है, कोई खेलने कमाने में लगा है
और कोई जमीन पर उभरी आसमान की छबि निहार कर खुष
हो रहा है।

रोज आकाष पर चांद दिखाई देता था, चांदनी इठलाती थी,
तारे टिमटिमाते थे, मगर आज षायद चांद कहीं खो गया है,
जिसके बिना मायूस चांदनी कहीं गुम हो गई है, और तारे
उनकी तलाष करते करते कहीं दूर जाकर भटक गए हैं।

दीपमाला की धरती पे सुनके खबर
चांद निकला नहीं आज आकाष पर
आज धरती ही आकाष पर छा गई
जगमगाती दिवाली की रात आ गई

फिल्म : स्टेज

दीपावली:

 

dipavaliपर्व: दीपावली:

दीपावली के आनंदवर्धक अवसर पर केवल घर द्वार का
ही प्रदूषण दूर नहीं किया जाता, वरन् मन मंदिर को भी
समस्त विरोधी मनोविकारों से मुक्त किया जाता है। हर
तरह के गिले षिकवे मिटाकर कोमल और मधुर भावनाओं
के गुलदस्ते सजाए जाते हैं। नफरत के अंधेरे के खिलाफ
प्यार के उजाले का माहौल पैदा किया जाता है, जिसमें
सभी के हृदय प्रेम की ज्योति से आलोकित हों। एक ज्योति
से कई ज्योतियां जलें तथा समस्त भेदभाव मिटाकर सारा
जग प्रेम भाव से प्रकाशित हो उठे। दीवाली का संदेष ही
यही है कि –

जोत से जोत जलाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो

दीपावली के अवसर पर श्रीगणेष और महालक्ष्मी के पूजन
अर्चन के लिए हर परिवार में हर्षोल्लास पूर्वक तैयारियां की
जाती हैं। इन तैयारियों में बड़ी बड़ी कंदीलें, छोटी छोटी मोम
बत्तियां, नए नए चित्र, पुराने पुराने सिक्के, नन्हे नन्हे दिये,
लंबी लंबी फुलझड़ियां, उपर जाने वाले पटाखे, देर तक जलने
वाले अनार, रंग बिरंगी दियासलाइयां, टिमटिमाने वाली बिजली
की झालरें, तरह तरह के पकवान, भांति भांति की मिठाइयां,
तमाम खील खिलौने, और ढेर सारे बताषे देखकर सभी का मन
विशेष रूप से प्रसन्न हो जाता है। वे जानते हैं कि महालक्ष्मी के
स्वागत में आज –

दीप जलेंगे दीप
दिवाली आई हो
(फिल्म – पैसा)

सहिष्णुता :

 

sahishnutaपर्व : सहिष्णुता :

कृषि प्रधान देश की यज्ञ संस्कृति के अनुरूप
नई फसल से पूजित गीतों और रंगों का यह
उत्सव जन-गण-मन में ऐसा उन्माद भरता है,
जिसके ताप से सारे द्वेश होलिका की भांति
भस्म हो जाते हैं और प्रेम जल से सभी भेद
-भाव प्रक्षालित हो जाते हैं।

मन को प्रफुल्लित कर देने वाली सद्भावनाओं
से अनुरंजित इस पर्व के मूल में अवस्थित
सहिष्णुता हमारी संस्कृति की ऐसी खासियत
है, जो जिंदगी में आपसी मुहब्बत की वकालत
करते हुए ज्यादा से ज्यादा खुशी की सिफारिश
करती है –

हिलि मिलि आवैं लोग लुगाई
भई महलन मैं भीरा अवध मैं
होरी खेलैं रघुवीरा । बागवान।

टोली :

 

toliपर्व : टोली :

वो होली खेलने के लिए सामने नहीं आती,
अगर उसका अपना छूटा होता है
या कोई सपना टूटा होता है।
कौन जाने, उसके दिल पर क्या गुजरती है?

जब उसका अतीत उसके वर्तमान को
हंसने-खेलने से रोकता है तो वह हालात
से समझौता भी कर लेती है। अपनी-अपनी
किस्मत है ये कोई हंसे कोई रोए,
रंग से कोई अंग भिगोए कोई अंसुवन से नैन भिगोए।
लेकिन होली के मस्तानों की टोली खुशी के इस सालाना
मौके पर किसी को मायूस नहीं देखना चाहती,
उदास नहीं रहने देना चाहती –

रहने दो यह बहाना
क्या करेगा जमाना
तुम हो कितनी भोली
खेलेंगे हम होली । कटी पतंग।

मौसम :

rang-de

पर्व : मौसम :

इसमें कोई संदेह नहीं कि वियोग की अनुभूतियां
गीतों के बोलोंको अधिक मर्मस्पर्शी बना देती हैं।

गीतों के माध्यम से सामाजिक जीवन में सामूहिक
आह्लाद का संचार करने वाली होली के मौसम में
एक ओर सारी वनस्पतियां धरती से अपना रूप-रंग
लेकर खुली हवा में इठलाने का स्वांग या लहराने का
प्रयास करती नजर आती हैं और दूसरी ओर रूप-रस
के लोभी भंवरे अलग-अलग टोलियां बनाकर गाते-
गुनगुनाते झूमते-फिरते दिखाई देते हैं।

होली रे होली रंगों की झोली
आई तेरे घर पे मस्तों की टोली
मुख न छुपा ओ रानी सामने आ
(पराया धन)

वल्लभ :

vallabhपर्व : वल्लभ :

इस मौसम में न अधिक ठण्ड होती है, न अधिक गर्मी। बाहर ॠतु
अंगडाई ले रही होती है, तो भीतर किसी की याद। अब तक याद है
भूली नहीं वो पिछले बरस की होली, धोते-धोते धोबी थक गया साफ
हुई ना चोली।

संस्कृत में कहते हैं कि – दुखदातापि सुखं जनयति यो यस्य वल्लभो
भवति। अर्थात् जो जिसका प्रिय होता है, वह उसे दुख देते हुए भी सुख
की सृष्टि करता है। ऐसे वल्लभ के बिना होली की रंग-बिरंगी तकरार की
कल्पना नहीं की जा सकती –

आई होली आई सब रंग लाई
बिना तेरे होली भी ना भाए
भर पिचकारी सखियों ने मारी
भीगी मोरी सारी हाए हाए
तन बदन मोरा कांपे थर-थर
धिनक धिन-धिन तिनक तिन-तिन
पिया तोसे नैना लागे रे (गाइड)

होली :

holiपर्व : होली

यह मन की उदारता का मनोरंजक पर्व है। संस्कृत का शब्द पर्व हिंदी तक
आते-आते पोर कहलाने लगा, जिसका मतलब होता है गांठ या जोड़।
सामाजिक पर्व समाज रूपी काया के जोड़ ही होते हैं, जो उसे सांस्कृतिक
रूप से मजबूत और टिकाऊ बनाते हैं।

परिवर्तनशील ॠतुओं के अभिनव सौंदर्य से अनुप्राणित पर्वों की आवृत्तियां
जब सामाजिक जीवन की दैनंदिन एकरसता में नए रंग भरती हैं, तब
अंतर्मन में नवस्फूर्ति का संचार होता है यानी रंगों का त्योहार होता है।
तन रंग लो जी आज मन रंग लो –

लाई है हजारों रंग होली
कोई तन के लिए कोई मन के लिए
कोई तो मारे है भर पिचकारी
कोई रंग डारे नजर मतवारी
खाए भीगा बदन हिचकोले
किसी का मन डोले
कहीं मचले जिया साजन के लिए
(फूल और पत्थर)