यथार्थ :

 

yathaarthकबीर वाणी

यथार्थ

जो लै एैरौ जाल उ
राजा रंक फकीर
एक सिंहासन बैठिबेर
दुसर बांधी जंजीर

धीरे धीरे यार मन
धीरे सब तिर हूं
सौ घा्ड़ पानि खित मालि
सिंचूं , मौसम उं फल हूं

गोधन गजधन बाजिधन
और रतन धन खान
जब ऐजां संतोस धन
सब धन माट्ट समान

अद्वैत :

advaitकबीर वाणी:

अद्वैत:

तेरो स्वामी त्वेइ मैं
जसिक फूल मैं गंध
कस्तूरी मृग जस किलै
झाड़म हैंरछै अंध

जसिकैं तिल मैं तेल हूं
जसिकैं डांसि मैं आग
त्यर स्वामी लै त्वेइ मैं
जा्गि संक्छै त जाग

तालम रूणीं कुमुदिनी
चंदरमा अग्गास
जो छू जैको प्राणप्रिय
उ छ वीकै पास

दीप:

deepकबीर वाणी:

दीप:

चलण चाक हूं देखिबेर
दिंछ कबीरा रवे
द्वी पाटूं का बीच मैं
साबुत नि बचण क्वे

घिन्न हेरण हूं बा्ट लाग्यूं
घिन्नो नै मिल क्वे
आपण भितर जब चाछ त
मी है घिन्न न क्वे

जब मी छ्यूं तब हरि नि छ्या
अब हरि छन मि नै
सकल अंध्यार समाप्त जब
दीप जलौ मन मैं

राम:

raam

कबीर वाणी:

राम:

भौत दिनान है चाणईं
बाट तुमा्र हे राम
हृदय मिलण हूं तरसणौ
मन कै न्हां बिस्राम

यो लाली म्यर लाल की
जां लै चां वा लाल
लाली द्यखन हुं मी गयूं
मि लै है गयूं लाल

कबिरा मन निर्मल भयो
जस्यैं गंगा नीर
पछिल पछिल हरि लागि रईं
कूण कबीर कबीर

neeti
कबीर वाणी:

नीति:

जां छ दया वां धर्म छू
जां छ लोभ वां पाप
जां छ क्रोध वां काल छू
जां छ छिमा वां आप

ठुल है गौ छ त फैद की
जस्यैं लंब खजूर
बा्ट हिटन्या खिन सेल नै
फल लै अत्ती दूर

करण बखत गल्ती करी
आज किलै पछतां
ब्वैबेर पेड़ बबूल अब
आम कां बटी खां

स्वामी :

swami

कबीर वाणी :

दोहानुवाद : स्वामी :

स्वामी एत्ती दी कि यो
घर पर्वार चलौ
मी लै नै रौं भुख कभैं
साधू भुख नी जौ

म्यर मीथैं के लै नाहन
जीलै छू उ त्यार
त्या्र त्वे ई कै सौंपणा
के लागणौ छ म्यार

सुख मैं सब संसार छू
खाणौ और सिणौ
दुख मैं दास कबीर छू
जागणौ और रुणौ

उपदेश :

updeshकबीर वाणी

दोहानुवाद : उपदेश :

कबिरा एस धन जोड़न चैं
अघिल अऔ जो काम
खोरि मैं राखि बेर पुंतरी
क्वे लै नै ल्ही जान

भोल करण जो आज कर
आजौ करणो अब
पल मैं परलय होलि त
फिर करले तू कब

निंदक दगड़ै राखण चैं
आंगन छा्न छैबेर
बिन सापणा स्वभाव हूं
निर्मल करी दिनेर

सीख :

seekhकबीर वाणी

सीख

निरमल बूंद अगास है
भैं मैं पडि़ बेकार
हरि है बिछड़्यो आदमी
सत्संगति बिन छार

यो तन त बिसबेल छू
गुरु अमृतै की खान
सीस दि बेर जो गुरु मिलौं
तब लै सस्तो जान

मांगण मरण समान छू
झन क्वे मांग्या भीख
मांगण है त मरण असल
सतगुरु की यो सीख

गर्व :

garv

कबीर वाणी

दोहानुवाद : गर्व

कबिरा ढाड़ बजार मैं
लीबेर जली लकाड़
जैल घर फुकण आपणो
हिटौ हमार दगाड़

कबिरा गर्व झिनै कर्या
कभैं न हंसिया क्वे
अब लै नाव समुद्र मैं
के पत है जौ के

कबिरा गर्व नि करण चैं
देखिबेर उच्च मकान
भोव पोर भैं मैं लेटण
मली झाड़ मैदान

मा्ल :

mala

कबीर वाणी

अनुवाद : मा्ल :

कबिरा यो मा्ल काठ की
त्वे सतझूणै छी

घुमै नि सकनै आपण मन
किलै घुमूंछै मी

माल घुमणै छू हाथ मैं
जिबाड़ घुमण मुख मैं
मन घुमणौं चारों दिसा
यो त पाठ पुज नैं

दुख मैं करणी याद सब
सुख मैं नि करण क्वे
सुख मैं वी खन याद रा्ख
दुख नि होल कभै