सहिष्णुता :

 

sahishnu

छल किया ढहते कगारों ने
खुश्क रेतीले किनारों ने

जिंदगी में जब लगी ठोकर
आदमी ने क्या किया अक्सर
मान करके बात किस्मत की
अपने दिल को खुद तसल्ली दी

कुछ मदद की ऐतबारों ने
सब्र सिखलाया सहारों ने

बन गई हर आग चिंगारी
खो गई क्योंकर अकड़ सारी
तैश में आकर भड़कने से
रोक रक्खा है पड़ाेसी के

टूटते घर की दरारों ने
या कि कुदरत के इशारों ने