गीत: तोता मैना:

 

 

tota mainaगीत: तोता मैना:

तोते से मैना ने पूछा
क्या ऐसे भी दिन आएंगे
जब षहरों में रहने वाले
जंगल के ख़्वाब सजाएंगे

खाली बंजर स्थानों पर
जब पेड़ लगाए जाएंगे
चिमनी के धुएं की टक्कर में
पत्ते हुड़दंग मचाएंगे

ऊपर चिड़ियां रह जाएंगी
नीचे बंदर बस जाएंगे
जीने का सहारा पाएंगे
पषु पक्षी चारा पाएंगे

लंबे चैड़े और हरे भरे
वन उपवन जब लहराएंगे
वे पर्यावरण बनाएंगे
दूषण से हमें बचाएंगे

गीत: पेड़:

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गीत: पेड़:

दस के बदले सौ का घाटा करते हैं

जो अपने पेड़ों को काटा करते हैं

जिनके पत्ते सांसों को सरसाते हैं
जिनके बौर हवाओं को महकाते हैं
जिनके फूल हर एक नज़र को भाते हैं
जिनके फल सब बड़े चाव से खाते हैं

जिनकी शाखों पर छोटे छोटे पंछी
सुबह शाम हेल्लो या टाटा करते हैं

जिनकी फुनगी पर कोयलिया गाती है
जिनकी टहनी गिलहरियों की थाती है
जिनकी माया मधुमक्खियां बुलाती है
जिनकी छाया सबकी थकन मिटाती है

जिनके पर उपकारवाद के उदाहरण
भेदभाव की खाई पाटा करते हैं

गीत: नमन:

 

 

namanगीत: नमन:

नानछन है लीबेर हमूं खन
भलिकैं प्यारै ले पाल्न्य इजा !
सौ बार नमन छ

कच्च माट्ट खन धीरे धीरे
अस्सल सांच मैं ढाल्न्य इजा !
सौ बार नमन छ

जब मुख है के नै कै संक्छ्यां
मन मैं रुंछ्यां वांईं गै संक्छ्यां
तेरि मीठि ममता वाल आंचल मैं
खै पी सक्छ्यां औ से संक्छ्यां

तोत्ल बचन बोल्छ्यां त उनूंको
मतलब सही निकाल्न्य इजा !
सौ बार नमन छ

कभैं रोवैबेर कभैं हंसैबेर
डांट डपट या प्यार जतैबेर
लोरी गैबेर काथ सुनैबेर
आदर्शाैं का दीप जलैबेर

कस्सी लै हो हर जिज्ञासा
साम्न रोशनी डाल्न्य इजा !
सौ बार नमन छ

 

गीत: पेड़ लगाएं:

 

ped lagayenगीत: पेड़ लगाएं:

आओ मिलकर पेड़ लगाएं
इस धरती को हरा बनाएं

हरा महज एक रंग नहीं है
हरा ढंग भी है जीने का
हरा फड़कना है आंखों का
हरा धड़कना है सीने का

उसी हरेपन को अपनाएं
इस धरती को हरा बनाएं

बदला वातावरण हर तरफ
कण कण में जहरीलापन है
जड़ में भी और चेतन में भी
मुरझाया सा पीलापन है

पीलेपन को दूर भगाएं
इस धरती को हरा बनाएं

तुम :

tumगीत: तुम :

तुम्हारे रूप का दर्पण
बना आदर्ष छबियों का
तुम्हारे प्यार का सागर
बना आष्चर्य कवियों का

तुम्हारे गीत सुनकर
कोयलों ने बोलना सीखा
तुम्हारी दृष्टि पाकर
मधुकरों ने डोलना सीखा

तूम्हारे केष छूकर ही
घुमड़ते हैं घने बादल
तुम्हारे नूपुरों को सुन
हुई हैं बिजलियां चंचल

तुम्हारी गुनगुनाहट से
नदी कलकल मचलती है
तुम्हारी धड़कनों से क्या
हवा की गति बदलती है ?

क्या :

3500गीत: क्या:

यह कैसा संकोच सांस लेने में
तुम्हें हवा ये रास नहीं आती क्या

कोई कारखाना है शायद आगे
तुम्हें अजब सी बास नहीं आती क्या

क्या बतलाऊँ पेड़ काट डाले हैं
सारे बड़े बड़े पैसे वालों ने
बरबादी के जाल बिछा रक्खे हैं
तन के उजलों ने मन के कालों ने

हमारी तरह इधर घूमने फिरने
कोई हस्ती खास नहीं आती क्या

दया धर्म की भली भावना कोई
इनके दिल के पास नहीं आती क्या

सुबह की हवा :

subahगीत : सुबह की हवा :

चाहे गर्मी हो या सर्दी का मौसम
हवा सुबह की बड़ी सुहानी लगती है

अपनी बीन बजाती जब उषा आती
अंधियारे की बंद पिटारी खुल जाती
सूरज के फन के लहराकर उठते ही
मस्त पवन तन छूकर मन खुश कर जाती

सदा एक सी चाहे सुख हो या दुख हो
समदर्शी संतों की बानी लगती है

किरनें कलियों के घूंघट में झांक रहीं
कलियां उजियारे में निज छबि आंक रहीं
उजियारा छोड़े रंगों की फुलझडि़यां
फुलझडि़यां जग में सुंदरता टांक रहीं

सुंदरता पशुओं की हो या मानव की
आंखों को जानी पहचानी लगती है