रास्ता :

 

rastaकविता: रास्ता :

बचपन में
जिस रास्ते को हम
बहुत लंबा समझते थे

जवानी में
हमने उसे
बाएं हाथ का खेल
साबित कर दिया

और बुढ़ापे में
उसे हमने
कई हिस्सों में
बांट लिया है

जिस पर धीरे धीरे
हांफते हुए चलते हैं
जब कि

रास्ते की लंबाई
हमेषा वही
रही है

जो बचपन में
अकल्पित थी
जवानी में नगण्य रही
बुढ़ापे में अत्यधिक
लगती है

क़त्ल :

katlकविता : क़त्ल :

घर के खिड़की और दरवाज़े
या फर्नीचर कभी पेड़ थे
चिड़ियों का प्रिय रैन बसेरा
कीड़ों का संसार सुहाना

बिजली के तारों से ऊपर
गिलहरियों के ऊँचे घर का
खुल-ए-आम जब क़त्ल हुआ था
परेशान हो गयीं हवाएं

सख्त जड़ों का रोना सुनकर
मिटटी के भीतर का पानी
सारा दिन बेचैन रहा था
कुदरत को गुस्सा आया था

करूं :

karunकविता: करूं:

अधरों से अव्यक्त भाव को
लेखन में स्वीकार करूं
आषा की नाव से समय का
सागर कैसे पार करूं

जब से देखा तुमको तब से
लोग देखने लगे मुझे
किससे अपनी नजर चुराउं
किससे आंखें चार करूं

मन की आंखों से तो तुमको
रोज निहारा है लेकिन
आओ आज तुम्हें षब्दों की
आंखों से साकार करूं

वर्णन करूं यथार्थ तुम्हारे
तन का अंतर्मन का भी
नूतन अभिनव उपमाओं से
वर्णन का श्रंगार करूं

धीरे धीरे :

dhire dhireकविता : धीरे धीरे :

खुशनुमा पत्ते ही आगे बढ़कर
फूल बन जाते हैं धीरे धीरे
और वो फूल ही पूरे खिलकर
बाग महकाते हैं धीरे धीरे

क्यों ये पतझड़ सा लगे है सावन
वही गुल’ान है वही पौधे हैं
जाने क्या बात है कि कलियों में
यूद्ध ठन जाते हैं धीरे धीरे

आज कांटों के सख्त चेहरों पर
हर तरफ फूल के मुखौटे हैं
इसलिए बाग में हवाओं के
कारवां आते हैं धीरे धीरे

यू तो कांटे न सिर्फ फूलों के
बल्कि गुलशन के भी रखवाले हैं
जिसका जो काम उसी पर साजे
लोग समझाते हैं धीरे धीरे

बाढ़ :

baadhकविता : बाढ़ :

जब जब चुक जाता है
माता का लाड़
धरती के आंचल में
आती है बाढ़

सर्प सी निकलती है
दर्द सी उबलती है
गर्द सी मचलती है
लेकर झंखाड़

शहर गांव फंसते हैं
पंचतत्व हंसते हैं
टूट टूट धंसते हैं
कष्ट के पहाड़

बच्चे रोए घर के
गुस्सा ठंडा करके
सीने में सागर के
खाती पछाड़

भ्रष्टाचार :

bhrishta.jpgकविता : भ्रष्टाचार :

है कोई सच्चा माई का लाल ?
जिसके पास हर्षद मेहता के अलावा
बोफोर्स घोटाले या चारा घोटाले
पर जाया करने के लिए वक्त हो

ललित मोदी या सुरेश कलमाड़ी,
सत्यम या आदर्श घोटाले को
नंबर वन कहने की हिम्मत हो
गोल्ड मेडल देने की कूवत हो ?

मैं जानता हूं कि नहीं,
और यह भी कि
ये भ्रष्टाचार इतनी आसानी से
कहीं जाने वाला नहीं

क्योंकि वह अपने शिष्टाचार
का जुड़वा भाई ही नहीं
एक फिजूलखर्च रईसजादा है
बिगड़ा हुआ नवाब है

घोटाला :

ghotalaकविता : घोटाला :

कहा जाता है कि
भारत एक कृषि प्रधान देश है
लेकिन मुझे लगता है कि यहां
कृषि कम होती है और घोटाले ज्यादा होते हैं

पुराने जमाने में पुरानी कविताओं की तरह
पुराने घोटाले भी बरसों याद रहते थे
अब नए जमाने में फिल्मी गानों की तरह
नए घोटाले भी कुछ हफ्तों तक ही याद रहते हैं

मीडिया में बार बार लगातार
धरना प्रदर्शनों की झलक देखकर
जब तक पब्लिक के दिल में तथाकथित
आरोपित को गोली मारने का आइडिया पुख्ता होता है,

तब तक कोई नया घोटाला
पुराने घोटाले के आगे आकर खड़ा हो जाता है कि –
इस गरीब को क्यों घूर रहे हो,
हिम्मत है तो मुझे गोली मार के दिखाओ !