लोकगाथा: हरू सैम 10

haru m 10लोकगाथा: हरू सैम 10

भै जब दुर्सौत् गाड़ ओड़ो हालनूँ हो।
तिरिया को दुसायो हुँलो काँ मुख दूखँलो हो?
मैंने आब जानू होलो वी छेपुला कोट हो।
म्योरा भै दयाली सैंम बंदी पड़ीं र्यान हो।

खोलुँलो जब भै कि बन्दी हंसुलागढ़,
तब मूख देखूँलो हो।
थी बखत काईनारा ढलढल रुँछि हो।

बोलाँछी हरु, इजा! तु एकल्वे न जाए हो।
त्यर भाणिज गोरिबो धौली धुमाकोट हो।
घुड़साल बादीकि होली ऊ हँसुला घोड़ी हो।
करोली कट्याल होली, डोर्याली चाबुक हो।

धूरिमुड़ी धरीकि होली तैकी जीन जीत हो।
बोंनाला का ढुंङा होली भनार की चाबी हो।
जमू का रे द्वउाार लुवा की आगली हो।
कुबेर भनार लड़न कि आलो हो। क्रमशः

लोकसाहित्य: अन्य विषयक लोकोक्तियां:

anyलोकसाहित्य: अन्य विषयक लोकोक्तियां:

अन्य विषयक लोकोक्तियों के कई प्रकार हैं; जैसे –
भाग्य संबंधी:

तू जालै वां
भाग जालो कां
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क्वे कूं के खूं
क्वे कूं के में खूं

कर्म संबंधी:

जैलि करि सकि, वीकि खेति
जैलि पढ़ि सकि, वीकि पोथि

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आपुणि आपुणि कै गे
चार दिन रै, ल्है गे

स्थान संबंधी:

द्याप्त देखण जागसर
गंगा नाणी बागसर

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पार गाड़ा रौत
खाण बखत खुष हुणि
दिण बखत मौत

राज संबंधी:

बांजा घट की भाग उघौनी
बांजी गौ को दूद छीनी
उल्टी नाली भरी दीनी
सुल्टी बतै बेर लीनी

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गोरु मरौ त मर
बाछ मरौ त मर
सेर भरि दूद
दि जाइ कर

कृषि संबंधी:

खेती मल लिबेर
राजा बल लिबेर

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मडुवा राज
जब द्यख ताज

वर्षा संबंधी:

बरखा लिबेर घस्यार
आग लिबेर रस्यार

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द्यो पड़ल कै सबनैले जाणि
बज्जर पड़ल कै कैले नि जाणि

ऋतु संबंधी:

चैमास को जर
राजा को कर

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दस दसैं बीस बग्वाल
कुमूं बिसंग फुलि भंग्वाल

विशेष: साम्प्रदायिकतावाद:

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विशेष: साम्प्रदायिकतावाद:

सांप्रदायिकतावाद में समाहित पाशविकता के कारण कभी कभी हमारे देश में ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जिन पर किसी भी सभ्यता का सर लज्जा से झुक जाना चाहिए। अतः सांप्रदायिकता को राष्ट्रीयता के नाम पर कलंक कहा जाना अनुपयुक्त नहीं। यह कलंक जितना संकीर्ण है, उतना ही हिंसात्मक भी है; जो कभी लांछित करता है तो कभी दिग्भ्रमित कर देता है।

‘‘मुल्क का मौसम बदलता रहता है। यों अपने देश का एक अन्य खुशनुमा मौसम भी है। यह हमारे प्रजातंत्र की पहचान है। किसी राज्य में चुनाव होते हैं, तो कहीं उपचुनाव। पूरे वर्ष , कहीं न कहीं चुनावी मौसम चलता ही रहता है। जो दल या नेता जनता को भाषण, वादे, प्रलोभन, आश्वासन आदि से ठगने में जितना सफल है, वह इस प्रजातंत्र के उत्सव में उतना ही कामयाब है। बात सब जनहित की करते हैं, जोर अपनी जात पर रहता है।’’ 1

‘‘हर दल की मान्यता है कि उसका विरोधी सांप्रदायिक है। दलित उत्पीड़न का सबसे अधिक शोर वह मचाते है, जिन्होंने उनके सुधार के लिए अपने शासन काल में; उस पर आज भी प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। उनकी परंपरा राजसी है, नजरिया सामन्ती। परिवार के बाहर का कोई प्रधानमंत्री उन्हें बर्दाश्त नहीं है। नही ंतो स्वर्गीय राव के आर्थिक सुधारों को भुलाने के लिए सक्रिय प्रयास क्यों करते ?’’ 2

साम्प्रदायिकतावाद में धार्मिक रूढ़िवाद को कारण मानने वालों को यह जान लेना चाहिए कि धर्म जितना रूढ़ होता है, उतना ही राजनीति से दूर होता है। संाप्रदायिकतावाद को विदेशियों की चाल बताने वालों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती, अर्थात् संाप्रदायिकतावाद को रूढ़िवादिता या विदेशी प्रयासों से जोड़ने वाले राजनीति की आड़ में वास्तविकता को छिपाना चाहते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शीघ््राातिशीघ््रा ऐसे कदम उठाए जाएं, जो वोटों की रातनीति में पनप रही संाप्रदायिकता को नेस्तनाबूद कर सकें। मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, अकालीदल जैसी संाप्रदायिक संस्थाओं को भी अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की बजाय सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्थान में जुटना चाहिए। देश के समस्त संाप्रदायिक दलों के लोगों को राष्ट्र को अपने दल से बड़ा मानकर संाप्रदायिकतावाद को राजनीतिक दुरुपयोग से बचाने का संकल्प लेना चाहिए।
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1 और 2 – ‘साहित्य अमृत’ नामक मासिक पत्रिका के नवंबर 2018 के पृष्ठ 48 में प्रकाशित – गोपाल चतुर्वेदी के लेख ‘मौसम के रंग’ से उद्धृत।

सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – दो:

rahasya 2सिनेमा: रहस्य रोमांच प्रधान – दो:

रहस्य और रोमांच से भरी हिंदी की सवाक् फिल्मों के तारतम्य में 1961 में जादू नगरी, बगदाद,, व अनारबाला, 1962 में बगदाद की रातें, हवा महल, जादू महल, जादूगर डाकू, बात एक रात की व बीस साल बाद, 1963 में वह कौन थी, पारसमणि, खुफिया महल, 1964 में कोहरा व जुआरी, 1965 में भूत बंगला, गुमनाम व पूनम की रात, 1966 में मेरा साया, ये रात फिर न आएगी व तीसरी मंजिल, 1967 में मुजरिम कौन, अनीता व ज्वैल थीफ, 1969 में इत्तफाक व थीफ आॅफ बगदाद तथा 1970 में कब क्यों और कहां आदि के नाम प्रमुख हैं।

‘‘ बीस साल बाद – 1962 – एक रहस्यमय कथा है और आरंभ से अंत तक दर्शकों को और फिल्म के नायक को घने जंगल में उभरती हुई घुंघरुओं व गाने की आवाज की खोज के भयानक रूप में बांधे रखती है। इसमें खूनी पंजे से की जाने वाली हत्या के दृश्यों से दर्शकों में भयंकर खौफ उत्पन्न हो जाता है। अंत में जाकर खूनी पंजे और डरावनी हवेली का रहस्य खुलता है। इस प्रकार इस फिल्म ने रहस्यपूर्ण हिंदी चित्रों की एक नई शैली को जन्म दिया।’’ 1

1971 में परवाना, 1973 में धुंध व अनामिका, 1974 में बंनाम, 1975 में फरार व खेल खेल में, मजबूर, 1980 में सबूत, 1982 में सुराग, 1985 में खामोश, 1989 में नागिन, 1990 में मोर्चा, 1991 में जादूगर, 1993 में डर व इंद्रजीत, 1994 में खिलाड़ी, 1995 में हथकड़ी, 1997 में गुप्त व जहरीला, 1998 में बिच्छू व दुश्मन, 1999 में कौन नामक फिल्में काफी लोकप्रिय हुईं।

2001 में अजनबी व दीवानगी, 2002 में गायब व हमराज, 2003 में भूत व समय, 2004 में ऐतराज व एक हसीना थी, 2005 में काल व शिकार, 2006 में गैंग्स्टर व चायना टाउन, 2007 में द ट्रेन, 2008 में आमिर, अ वेडनस डे व रेस, 2011 में मर्डर 2, 2012 में तलाश, 2013 में स्पेशल 26 व उंगली, 2014 में एक विलन, 2015 में दृश्यम्, 2016 में रुस्तम व एयर लिफ्ट, 2017 में खोज आदि फिल्में इसी परंपरा में बनती रही हैं। क्रमशः

गीत: लगती है:

 

lagtiगीत: लगती है:

दिल को दुनिया की हर इक चीज
भली लगती है
मगर दिमाग को चीजों में
कमी लगती है

दिल से देखो तो हर इक चीज
पास है अपने
मगर दिमाग से वो दूर
कहीं लगती है

दिल से सोचो तो हर इक बात
ठीक होती है
मगर दिमाग से वो ठीक
नहीं लगती है

दिल से चाहो तो हर इक
शख्सियत बराबर है
मगर दिमाग से वो
छोटी बड़ी लगती है

भजन: हे परमेसर:

he parmesvarभजन: हे परमेसर:

हे परमेसर ! हे भुवनेसर !
आज कृपा कर हमूं सक्ति दी

दी प्रेरक सद्बुद्धि कि सब्बौ
निज हित है परहित भल लागौ
फैलै दी एस भाव कि भट्क्या
भक्तौं को अंतर्मन जागौ

आप्न चरण मैं शुद्ध भक्ति दी
हे परमेसर हमूं सक्ति दी

सहज भावना सरल आचरण
भौसागर तरनै कि युक्ति दी
काम भस्म कर दी कस्सी कैं
क्रोध लोभ मोह है मुक्ति दी

ठगनी माया है बिरक्ति दी
हे परमेसर हमूं सक्ति दी

लोकभाषा: परिवर्तन 1

parivartan 1लोकभाषा: परिवर्तन 1

हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोग हिन्दी के अतिरिक्त अपनी मातृबोलियों का भी सम्यक् रूप से प्रयोग करते हैं, जिनसे प्रभावित हिन्दी के विभिन्न रूपों को हिन्दी की क्षेत्रीय शैलियाँ माना जाता है। इन शैलियों में पाये जाने वाले अन्तर को परिवर्त कहते हैं। उदाहरण के तौर पर कुमैयाँ के गणनावाचक शब्दों में उनचास को उन पचास और उनसठ के बाद साठ के स्थान पर सटी कहकर गणना की जाती है ; यथाः उनसटी, साटी, इकसटी, बासटी, तिरसटी आदि। ग्यारह से अठारह तक अन्त्य ‘ह’ का उच्चारण नहीं किया जाता, जैसेः ग्यार, बार, तेर, चैद, पन्द्र, सोल, सत्र, अठार। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित परिवर्तन भी दृष्टव्य हैंः

1. ओष्ठीकरणः

विवृत ‘व’ का संवृत ‘ब’ के रूप में ओष्ठ्य उच्चारणः
वानर > बानर
दूर्वा > दुब
जवाब > जुबाब
विवाह > ब्या

2. अनुनासिकीकरणः

निरनुनासिक ध्वनियों का सानुनासिक उच्चारणः
भेजता है > भेंच्छ
लड़ाई > लंड़ै
पैसा > पैंस
जेवर > जिंवर क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 9

haru m 9 (2)लोकगाथा: हरू सैम 9

एक ट्याल छोड़िछ जब गैछ इनर का द्वार हो।
इनरासन होकिल तैकि जिया काईनारा हो।
इतरानी का कान पड़यो बाँसूली शबद हो।
बैस बैंनी परीन ऐंन आँछरी खेचरी हो।
भूचन हरुस जब बाटा लागी छिया,

वी बखत काईनारा स इसो आयो ग्यान हो।
कभै-कभै मेरो हरु बाँसूली बजूँछ्यो हो।
स्वनीका सपन आई इजू काईनारा हौ।
पीपली चैंरड़ी बाला हरीचन नींनौड़ी ऐ रैठ हो।

सपन में देखी तैले इजू काईनारा हो।
हरुस समूँछि जब गोदी में धरँछि।
पाँणी ले नऊँछी नौनि ले पोछँछि हो।
खीर भोजन दिछि हरु नीनै न टूटनि हो।

तू कैसे दुसाछे इजा, एकला जंगल हो?
ल्वीले क्यलेख बजैछ इजा उदासी बाँसुली हो?
थी बखत हरु बोलया दुश्मन दुर्सोनूँ इजा सिर काटी लिनूँ।
सोरे जै दुर्सोनूँ फोड़ी बाँट लिनूँ। क्रमशः

लोकसाहित्य: सामाजिक लोकोक्तियां:

samajikलोकसाहित्य: सामाजिक लोकोक्तियां:

सामाजिक: सामाजिक लोकोक्तियों के कई प्रकार हैं; जैसे –

जाति संबंधी:

बामण च्यलक उजणन ऐ रस्यार बण
जिमदारक च्यलक उजणन ऐ घस्यार बण

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जिमदार हुणि विचार नै
भैंस हुणि कच्यार नै

नारी संबंधी:

सैणि हुणि चूनै कि सौत
चोर हुणि खखारै भौत

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मुरुलि बजूंछै मैं त्यार नि औनी
बिणाई बजूंछी मैं त्यार नि औनी

धर्म संबंधी:

जो द्यल तन हुणि
ऊ द्यल कफन हुणि

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बिन गुरु बाट नै
बिना कोड़ी हाट नै

आचार संबंधी:

स्वा्र हुणि मरि गो नि कौन
आ्ग हुणि निमै गो नि कौन

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च्यल सुदरौं बबा का हात
च्येलि सुदरैं मै का हात

व्यक्तित्व संबंधी:

जां जां रघू पौण
वां नि रौ कुटी कौण

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सिरू सिर धार
बिरू बिर धार
टुकन्या बिचै धार

भोजन संबंधी:

गूड़ खै गुलैनी नै
लूण खै लुणैनी नै

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खा्ण हूं नि भै गेठी
कमर बांधि पेटी

नीति संबंधी:

राज करण आपुण देस
भीख मांगण परदेस

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मैंसक उजणन ऐ ग्वाल बण
लुवक उजणन ऐ फाल बण

विशेष: धर्म निरपेक्ष:

dharm-1विशेष: धर्म निरपेक्ष:

प्रजातांत्रिक प्रणाली में एक ही राजनीतिक दल का लंबे अरसे तक सत्ता में बने रहना अगा कुछ मामलों में सौभाग्यपूर्ण लगता है, तो कुछ संदर्भों में दुर्भाग्यपूर्ण भी अनुभव होता है। लंबे अरसे तक सत्ता में रहने वाले किसी राजनीतिक दल के हित और सरकार के हित एकाकार होने लगते ह, तो सरकार ऐसे निर्णय लेने लगती है जो उसके अपने परंपरागत मतदाताओं के पक्ष में होते हैं।

धार्मिक स्थलों की पवित्रता के नाम पर एक वर्ग के पूजागृह में पुलिस के प्रवेश को निषिद्ध करना, देश की अखण्डता के नाम पर कियी भाषा विशेष को आवश्यकता से अधिक महत्व देना, श्रीराममंदिर के स्थान पर बाबरी मस्जिद बनाने के मसले को राजनीतिक बनाना सरकार द्वारा अपनाई गई उस तुष्टीकरण की नीति के प्रमाण हैं, जो वोट की राजनीति को देश की राजनीति से अधिक महत्व देती हैं।

यही कारण है कि धर्म निरपेक्ष भारत में धर्मों के आधार पर कई आचार संहिताएं चल रही हैं। किसी धर्म के मानने वाले अपनी वेशभूषा में अस्त्र शस्त्र भी धारण कर सकते हैं, किसी धर्म के मानने वाले एक से अधिक विवाह कर सकते हैं, किसी धर्म के मानने वाले अपनी शिक्षण संस्थाओं को अपनी नीतियों के हिसाब से चला सकते हैं। इन परिस्थितियों में एक देश में समस्त नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होने वाली संहिता का प्रश्न ही नहीं उठता।

समानता के अभाव में एकता की कल्पना करना बेबुनियाद है। अनेकता का सिद्धान्त सांप्रदायिकता को बढ़ावा देता है और सांप्रदायिकतावाद सरकार को परोक्ष रूप से लाभदायक प्रतीत होता है। नतीजतन कई निर्णय भारत के समस्त नागरिकों और सम्पूर्ण राष्ट्र को ध्यान में पखकर नहीं लिए जाते, जिनके परिणाम वर्षों से भयंकर समस्याओं के रूप में हमारे सामने मुंह बाए खड़े हैं ओर इनका प्रभाव दिन प्रतिदिन अधिक विकराल होता चला जा रहा है।

कुल मिलाकर इस सांप्रदायिकतावाद ने हमारे देश की एकता और उन्नति पर बहुत बुरा असर डाला है। सांप्रदायिकतावाद का विष भारतीयता के लिए काफी घातक सिद्ध हो रहा है। यदा कदा यही विष भारतीयों को अजनबी, नागरिकों को सांप्रदायिक और मनुष्य को पशु बना देता है। क्रमशः