लोकभाषा: उच्चारण:

uchcharanलोकभाषा: उच्चारण:

किसी समाज के लोगों द्वारा पारस्परिक भाव विनिमय हेतु प्रयुक्त उच्चारण अवयवों के निश्चित प्रयत्नों से उत्पन्न सार्थक ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था को भाषा कहा जाता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी के उच्चारण अवयवों के ढलान पर नदी की तरह प्रवाहित होती हैऋ अतः यह ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है, त्यों-त्यों इसके प्रवाह में सरलता और सहजता बढ़ जाती है। इस परिवर्तन को विकार कहा जाए या विकास, पर यह भाषा की प्रकृति है। वह जिस समाज से सम्बन्ध रखती है, उसमें उत्पन्न, पोषित, परिवर्धित या उनसे सम्बद्ध लोग उसे सहज ही सीख लेतेे हैं।

यदि किसी समाज के नवजात शिशु को किसी अन्य भाषा भाषी समाज में रख दिया जाए तो अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए वह वहीं की भाषा सीख लेगा और अपने मूल समाज में लौटने पर अपने लोगों से बोलने या उनकी बात समझने के लिए उसे पुनः उनकी भाषा सीखनी पड़ेगी। इससे स्पष्ट है कि भाषा संस्कार की अपेक्षा वातावरण के अधिक निकट होती है। संभवतः इसीलिए उसे सामाजिक सम्पत्ति भी कहा जाता है।

भाषिक अध्ययन की प्रचलित परम्परा में बोली को अभिव्यक्ति की संरचना मानकर उसके स्वनिमों, रूपिमों, शब्दों और वाक्यों पर विचार किया जाता है ; जो उसे सीखने समझने की दृष्टि से उपयोगी है। बोली की आन्तरिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उसके भाषिक तत्वों की विवेचना से उसकी प्रयोगात्मक प्रवृत्तियाँ स्पष्ट होती हैं, जिनसे बोली की संस्कृति का परिचय प्राप्त होता है। क्रमशः

लोकगाथा: हरू सैम 6

haru m 6लोकगाथा: हरू सैम 6

हुूमा धुरा बटी गयो पाँच पौड़ी मँजा हो।
ढाणी की उकाल काटी, छिपूला चैरड़ी हो।
छिपुला कोट का छन, बार भाई छिपुला हो।
बार चेला छन तिनार, अठार रे नाती हो।

दौच त चाकर छना स्यूँर-प्यूँर पैगा हो।
धुरी का शिकार, ऊँनी बार भाई छिपुला हो।
नेड़ा-भेड़ा पुजी नमो-भै नारेंण हो।
बार भाई छिपुला कूनन हो, जोगी कथ बटी आया?

काँ हिन ही जाला हो?
”तीरथ बासी जोगी हुँलो कैलास ही जूलो हो।
तीरथ-बरत जागा मैं भोजन खूँलो हो।“
बार भाई छिपुला कूनन हो।

बार बरस की तीर्थवासी हमरि पिंगला हो।
हमीं शिकार जान रयाँ-सताँ दिन ऊला हो।
ज्यून मिरगन की नाक डोर हालँला हो।
मरी मिरगन की पीठ भारी लगूँला हो। क्रमशः

लोकगीत : अंतर :

antarलोकगीत : अंतर :

कुमाऊं की लोक गाथाओं में कवि की कल्पना की उड़ान और अतिशयोक्ति का बोलबाला
है पर इनके द्वारा कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आते हैं; जो लिखित इतिहास में उपलब्ध नहीं
होते।इनके वर्णनों की नाटकीयता अगर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती है तो इनके गायन की
शैली उन्हेंप्रभावित भी करती है। इनमें वर्णित पुराने गढ़ाें और हाटों के नाम अपने अतीत के
प्रति जिज्ञासाही नहीं जगाते, बल्कि इनके पात्रों के आचरण तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक
जीवन कीझलक भी प्रस्तुत करते हैं।

एक बात और, कुमाऊं में कहीं हिमाच्छादित पर्वतश्रंखलाएं हैं तो कहीं शस्य-श्यामला
उपत्यकाएं भी हैं। कहीं पहाड़ाें के इधर-उधर फैले घने जंगलों की भरमार है तो कहीं
नदियों के आर-पार फैले समतल खेतों की बहार है। इस तरह की विषम परिस्थितियों
का प्रभाव सीढ़ीनुमा खेतों के आस-पास दूर-दूर बसे गांवों की जिन्दगी पर पडऩा ही था।
आवागमन की कठिनाइयों के कारण विभिन्न घाटियों के निवासियों के बीच संपर्क का
अभाव रहा, जिससे एक नदी या एक पर्वत के इधर-उधर रहने वालों के रहन-सहन
तथा बोलचाल में अंतर आ गया।

आज कुमाउनी भाषा की तीन उपभाषाएं मानी जा रही हैं – पूर्वी, मध्यवर्ती तथा पश्चिमी।
पूर्वी के अंतर्गत कुमैयां, सोर्याली, सीराली व अस्कोटी; मध्यवर्ती के अंतर्गत खसपर्जिया
औरचौगर्खिया तथा पश्चिमी के अंतर्गत गंगोली, दनपुरिया, पछाईं व रौचौभैंसी नामक बोलियां
अस्तित्वमें आई हैं।स्वरूप की दृष्टि से जिस तरह अलग-अलग स्थानों पर बोली का स्वरूप
बदला हुआमिलता है, उसी तरह जगह-जगह पर लोकगीतों की धुनों में भी परिवर्तन परिलक्षित
होता है।प्रसिद्ध लोकगाथा मालूसाही बारामंडल की ओर जिस धुन में गाई जाती है,
वह राग दुर्गा के निकट है। कौसानी बागेश्वर की ओर प्रचलित इसके रूपांतरों में
राग सोहनी की विशेषताएं लक्षित होती हैं। — ( डॉ० त्रिलोचन पाण्डे : कुमाउनी भाषा
और उसका साहित्य : पृष्ठ 229)

विशेष: संभावना:

sambhavnaविशेष: संभावना:

अब वह समय आ गया है कि जब जीवन के हर क्षेत्र में समान माने जाने वाले नर नारी अपने समाज के समस्त दुखद आडंबरों का मिलकर और खुलकर विरोध करें। आत्मविश्वास से भरपूर जागरूक युवक दहेज लेने की बात करना छोड़ दें और शिक्षित युवतियां विशेष साहस का प्रदर्शन करते हुए दहेज लोभियों को ठुकराना शुरू कर दें। जो युवक और युवतियां ऐसा करने की हिम्मत दिखाएं, समाज न केवल उन्हें प्रोत्साहित करे वरन् अपने आश्रितों को भी एतदर्थ प्रेरित करे।

सामाजिक आडंबरों से छुटकारा पाने के लिए सरल विवाह विधियों का प्रचलन प्रारंभ हो, जिनमें अनावश्यक तथा दिखावटी खर्चों से बचा जा सके। अदालत में होने वाले प्रेम विवाह वाले दम्पतियों को भी अन्य विधियों से विवाहित लोगों के समान मान्यता दी जाए। भलीभांति पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़े युवक युवतियां अंतर्जातीय विवाह करने लगें तो समाज राष्ट्रीयता एवं मनुष्यता की दृष्टि से उन्हें भी समुचित सम्मान प्रदान करे।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के अनुसार ‘मनुष्यता इसीलिए प्रणम्य है, वह इसीलिए देवत्व को पराजित करती है; क्योंकि देवताओं के स्वर्ग जैसी एकरसता मनुष्य ने धरती पर नहीं रहने दी। स्वर्ग जैसी एकरसता और मोक्ष जैसा निर्जन मौन सच्चा मनुष्य कभी नहीं चाहेगा, क्योंकि स्वर्ग और मोक्ष की भूमि सुजन के लिए बंजर है। इसलिए यदि मौलिकता भ्रम भी है तो ऐसा भ्रम इस सृष्टि का सौभाग्य है।’ 1

कुल मिलाकर इस अभिशाप को मिटाने के लिए सामाजिक चेतना में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। यही परिवर्तन दहेज की समस्या को मिटाकर भारतीय नारी को उस आदर्श स्थिति में प्रतिष्ठित कर सकेगा, जिसकी वह प्राचीन काल में अधिकारिणी थी। ऐसे अभिनव विचार किसी एक की सोच को बेचैन न करते हुए भी समाज की चेतना को झकझोरते रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा, प्रशासन, व्यापार और उद्योग के क्षेत्रों में आधुनिक युगीन नारी नर के कदमों के साथ अपने कदम मिलाते हुए प्रगति की ओर अग्रसर है, लेकिन यह बात अभी एक विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित है। यद्यपि तथाकथित विकास के बावजूद दूरस्थ कस्बों और ग्रामों की नारी की स्थिति अभी विचारणीय बनी हुई है, तथापि भारतीय संविधान में उल्लिखित नारी की स्थिति और अधिकारों के आलोक में एक ऐसी दिशा की संभावना स्पष्ट है; जहां भारतीय नारी अपना अपेक्षित मंतव्य अवश्य प्राप्त कर लेगी।
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1 ‘साहित्य अमृत’ नामक मासिक पत्रिका के नवंबर 2018 के पृष्ठ 36 में प्रकाशित – नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के लेख ‘ मनुष्य नहीं हुआ पुराना’ से उद्धृत।

नई सदी की प्रेमकथाएं:

nai sadiनई सदी की प्रेमकथाएं:

जहां तक नई सदी की प्रेम प्रधान फिल्मों की बात है 2001 में बरसात, रहना है तेरे दिल में, चोरी चोरी चुपके चुपके, कभी खुशी कभी गम, गदर, तुम बिन, स्टाइल, 2002 में देवदास, साथिया, मैंने दिल तुझको दिया, कर्ज, 2003में तेरे नाम, मैं प्रेम की दिवानी हूं, कुछ ना कहो, कल हो न हो 2003 में मुन्ना भाई एम बी बी एस, रन, 2004 में हम तुम, वीर जारा, 2005 में क्यों कि, पहेली, आशिक बनाया आपने, बेवफा, 2006 में विवाह, हमको दिवाना कर गए, मेरे जीवन साथी, बस एक पल, 2007 में जब वी मेट, नमस्ते लंदन, ओम शांति ओम, सलाम ए इश्क, 2008 में रब ने बना दी जोड़ी, एक विवाह ऐसा भी, किस्मत कनेक्शन, 2009 में लव आजकल, अजब प्रेम की गजब कहानी, डेल्ही 6, तुम मिले,2010 में बैण्ड बाजा बारात और अनजाना अनजानी का बहुत बोलबाला रहा।

श्री ललित जोशी ने अपनी पुस्तक ‘हाउस फुल’ में लिखा है कि ‘ महानगरीय संस्कृति को पृष्ठभूमि में रखकर बनाई गई इन फिल्मों का हीरो कसरती बदन वाला ‘माचो’ युवक है तथा देह प्रदर्शन से न चूकने वाली ‘हेप’ युवतियां। विदेशी लोकेशन्स पर फिल्माए गए गानों की लय पर थिरकते हीरो हीरोइन की सबसे बड़ी कद्रदान उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में पली बढी नई पीढ़ी है। उसकी भाषा वही है, जो उसके चहेते सितारों की है – यानि कि हिंदी और अंग्रेजी के फूहड़ सम्मिश्रण से बनी हिंगलिश। वह पुराने गीतों के शौकीन हैं। भले ही उन्हें ‘रीमिक्स’ करके प्रस्तुत किया जाए।’

2011 में तनु वेड्स मनु, रेडी, बाॅडी गाॅर्ड, मौसम, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, 2012 में जब तक है जान, एक था टाइगर, काॅकटेल, 2013 में आशिकी 2, राम लीला, रांझना, ये जवानी है दिवानी, लुटेरा, 2014 में टू स्टेट्स, हंसी तो फंसी, हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया, 2015 में तमाशा, दिलवाले, तनु वेड्स मन रिटन्र्स, शानदार, बाजी राव मस्तानी, 2016 में डियर जिंदगी, रुस्तम, की एण्ड का, ए दिल है मुश्किल, 2017 में जब हैरी मेट सैजल, टाॅयलेट – एक प्रेम कथा, बद्रीनाथ की दुल्हनिया, मुबारकां, 2018 में पद्मावत, धड़क, लवयात्री, अंधाधुन, केदारनाथ, बत्ती गुल मीटर चालू, मनमर्जियां, नवाबजादे, बरेली की बरफी 2019 में राजी, मलाल, ड्रीमगर्ल, लुकाछिपी, दे दे प्यार दे, स्टूडेण्ट आॅफ द इयर 2 आदि प्रेम प्रधान फिल्में दर्शकों को देखने को मिलीं।

आजकल कंेवल पुराने गीतों का ही नहीं, अब तो पुरानी फिल्मों का भी पुनर्सजन किया जा रहा है। एन. आनंदी ने 25 जनवरी 2003 के ‘अमर उजाला’ के रंगायन स्तंभ में लिखा कि ‘‘बात गलत नहीं है, नया नौ दिन और पुराना सौ दिन। नए दौर की फिल्में देखिए तो कितने दिन याद रहती हैं। वहीं पुरानी फिल्मों की बात करें , तो दीवाने दर्श्रकों पर जैसी मदहोशी छाने लगती है। बाॅलीवुड पर भी इन दिनों पुरानी फिल्मों का ऐसा ही कुछ नशा तारी है। भंसाली की ‘देवदास’ का एक मात्र मन्त्र था ‘भव्यता’। तो पुरानी क्लासिकों को फिल्माते वक्त भी इसी का ध्यान रखा जाएगा। पिछले दिनों तीन बड़ी फिल्मों ‘साहब बीवी और गुलाम’ 1962, ‘काबुली वाला’ 1961 और ‘मुगल ए आजम’ 1069 को रिमेक करने की बात सामने आई है।’’ क्रमशः

गीत: पूछो मत:

 

poochho matगीत: पूछो मत:

सचमुच था या ख्वाब
कि पूछो मत
गायब हुए जवाब
कि पूछो मत

भाव कल्पनाओं से
मिलने को
थे कितने बेताब
कि पूछो मत

आंखों ने आंखों को
घेर लिया
पकड़ी गई शराब
कि पूछो मत

एकाकार क्षितिज पर
अधर धरा
रक्तिम हुए गुलाब
कि पूछो मत

गीत: रोजगार – 2

rozgar 2गीत: रोजगार – 2

सुनो लीबेर सुनार
तारौ लीबेर सितार
पढ़ै लीबेर नौकरी
रुपैं लीबेर बजार

बिन गुरु बाट नहां
बिन ढेपु हाट
बिन मेहनत करि
कसिकैं हुं ठाट

ठाट क दगड़ यरौ
कार जरूरी
कारा लिजी जाण पड़ौं
बैंका दुआर

करोड़ लाख हजार
हैस्यत लीबेर उधार
पढ़ै लीबेर नौकरी
रुपैं लीबेर बजार

सैणिक खसम मरद
मरदौक रीन
जैक ख्वर रीन वीकि
हरै जांछि नीन

रीना क दगड़ यरौ
ब्याज जरूरी
ब्याजा लिजी चाण पणौ
नई ब्योपार

जां चा पड़ी रौ तुसार
पानी लीबेर कच्यार
पढ़ै लीबेर नौकरी
रुपैं लीबेर बजार