लोकगाथा: लक्ष्यबेध: 4

लोकगाथा: लक्ष्यबेध: 4

ए सोल जोजन, कटिक-खामू रोपि राख्यो।
ए खामा तलि घरीं होली तेल की चासनी।
ए खामा की मँथि में होलो धरम चक्कर।
ए सुनहली माँछी कि होली हीरामणि आँखि

दुरपद राजा ले परणू करि राख्यो-
जो राजा झाड़ि देलो मछुली कि आँखि,
ए जो राजा घुमै देलो धरम चक्कर;
तेलकि भज्याली देखी बाण जो मारलो-

वी ला राजा का मैं चेलि बेवै द्यूँलो।
पाँचाल देष कौतिक हयूँ भयो।
ए दुरोपदी लली ने तपस्या करि राखि।
महादेवज्यू ले बर दियूँ भयो।

तीनलोक मालिक-स्वामी को बर दीई राख्यो।
सिरीकृष्ण देवज्यू मन समजला-
बिना अर्जुन आब को रो-वेद लगा लो?
पाण्डव राठन को के-पत्तोले नहाती। क्रमशः

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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