सिनेमा: नव निर्माता:

सिनेमा: नव निर्माता:
महबूब ने अपना फिल्मी कैरियर इंपीरियल कंपनी से आरंभ किया था। 1942 में उन्होंने अपने महबूब प्रोडक्शन की नींव रखी। इससे पहले उनकी जागीरदार-1937, वतन-1938, औरत-1940 व रोटी-1942 नामक फिल्मों में पूर्व पूंजीवादी मूल्यों और औद्यौगिक पूंजीवादी व्यवस्था की टकराहट से उत्पन्न हालात का यथार्थ अंकन परिलक्षित हुआ था।

अंदाज-1949 प्रेम त्रिकोण के प्लाॅट पर बनी महबूब की पहली भारतीय फिल्म मानी जाती है, जिसने ‘आधुनिक’ के प्रति मध्यम वर्ग के नजरिए पर प्रकाश डाला। उनकी सबसे ज्यादा लोकप्रिय फिल्म मदर इंडिया- 1957 की राधा यानी नरगिस सिर्फ राम यानी राजेंद्र कुमार और बिरजू यानी सुनील दत्त की मां नहीं है, बल्कि सारे ग्राम समाज की मां है। वह धन से भले ही गरीब है, पर आत्मसम्मान की धनी है। अपने उसूलों की खातिर अपने बेटे को गोली मारकर वह सही मायने में भारत माता बन जाती है। इस फिल्म ने तकनीकी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कथाधारा प्रवाह की दृष्टि से भी पर्याप्त प्रशंसा बटोरी।

विमल राय शुरू में कलकत्ता के न्यू थियेटर्स से जुड़े थे। 1952 में उन्होंने विमल राय प्रोडक्शन्स की स्थापना की। इस बैनर के तले बनी फिल्मों में बंगाली शैली तथा इतालवी यथार्थवाद का कलात्मक समन्वय नजर आता है। विमल राय ने 11 वर्षों में 13 फिल्में निर्देशित कीं, जिनमें दो बीघा जमीन व परिणीता-1953, विराज बहू-1954, देवदास-1955, मधुमती-1958, सुजाता-1960 और बंदिनी-1964 काफी मशहूर हुईं। उनकी फिल्मों में दो बातें खास थीं – पहली: भाव की दृष्टि से सशक्त कथानक के लिए साहित्यिक कृतियों का उपयोग और दूसरी कला की दृष्टि से अभिनव दृश्य विधान हेतु संपादन में असरदार प्रयोग।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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