तृतीय चरण :

tritiy

विशेष : तृतीय चरण (1800 ई0 से प्रारंभ)

उन्नीसवीं शती के प्रारंभिक दशकों में पद्य रचना के लिए ब्रजभाषा ही प्रयुक्त होती
रही, पर गद्य रचना के लिए खड़ीबोली का प्रयोग होने लगा था। धीरे-धीरे जब
कविता के क्षेत्र में भी खड़ीबोली ने पदार्पण किया तो ब्रज और अवधी की गणना
हिंदी की बोलियों में की जाने लगी और खड़ीबोली के विकास के साथ-साथ हिंदी
साहित्य का विकास भी जुड़ गया।

ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज प्रतिनिधि प्रारंभ में बंगाल के जिन सामंतों के संपर्क
में आए, उनके दरबारों की भाषा खड़ीबोली थी। मुसलमानों द्वारा प्रयुक्त होने के
कारण इसमें अरबी-फारसी शब्दों का प्राचुर्य था। इसके अतिरिक्त खड़ीबोली का एक
अन्य रूप जनसामान्य की दैनंदिन बोलचाल में प्रचलित था, जो अंग्रेज शासकों को
अपना राजकाज चलाने के लिए उपयोगी लगा।

कालांतर में जब अंग्रेज सरकार ने मुद्रण कार्य के लिए छापेखानों की स्थापना की,
तब खड़ीबोली हिंदी के मुद्रण के लिए देवनागरी लिपि के टाइप भी तैयार किए गए।
हिंदी प्रेस की व्यवस्था हो जाने के बाद अंग्रेजी की बहुविध सामग्री के साथ-साथ
बाइबिल के उपदेशों का भी हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ, जिसके माध्यम से
खड़ीबोली गद्य के प्रसार की संभावनाएं बढ़ीं।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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