अघिले कि लाकडि़ जलि पछिनैं उंछि

aghile Aलोककथा : अघिले कि लाकडि़ जलि पछिनैं उंछि

हिंदी अनुवाद : सास अब बूढ़ी हो चली थी। घर में बहू का ही आदेश
चलता रहा। सास के हाथ-पांवों की शक्ति क्षीण हो गई तो बहू बुढि़या
की कुछ भी परवाह न करती। बुढि़या के अपने न तो हाथ चल पाते,
न पांव ही। कोई बुढि़या की सेवा करने वाला नहीं, उसकी देख-रेख
करने वाला नहीं। कोई उसे नहला-धुला तक न देता। बुढि़या की पीठ
में खुजली गयी तो बुढि़या बार-बार कहती रहे ”बहू, ओ बहू, जरा इधर
आकर मेरी पीठ तो खुजला दो।“

पहले तो बहू सास की कोई परवाह नहीं करती। बुढि़या ने जब शोर मचाना
बन्द ही न किया तो बहू आई। ”क्या हुआ, सास जी, तुम्हारा मुँह तो
बोलने के लिए खुजलाता है।“ ”नहीं बहू, मैं परेशान हो गई हूँ इस खुजली
से। जरा मेरी पीठ तो खुजला दो।“बहू अपने घमंड में ऐसी ऐंठी रहती जैसे
दुलारने पर घोड़ा घास पर तिनका भी नहीं उठाता। घमंडी बहू को सास की
पीठ पर हाथ लगाते तो घिन लगती। हाँ, अपने पांव से वह बुढि़या की पीठ
खुजला देती, वह नकचढ़ी। बुढि़या कुछ बोले तो कलह हो। सबसे अच्छा
अपना ही मुँह बंद रखा।

दिन बीतते क्या देर लगती है? बहू के अपने बेटे हुए। पाल-पोस, पढ़ा-लिखा
कर उनका विवाह किया और अब बहू की बहू आ गई। अब बहू अपनी बहू की
सास बन गई।एक दिन उसने अपनी बहू से कहा-”बहू, जरा मेरी पीठ खुजला
दो। अब तो कुछ भी काम नहीं होता। हाथ पांव जवाब दे चुके हैं। बहू आकर
सास के आगे खड़ी हो गई। सास ने फिर पीठ खुजलाने के लिए कहा तो बहू
बोलीः ”सास जी, मैं तो जमीन पर कैसे बैठूँ। खड़ी रहकर मेरे हाथ तुम्हारी पीठ
तक पहुँचते नहीं। हाँ पांव अवश्य पहुँच जाते हैं। इस ओर पीठ कर लो, पांव से
खुजला दूँंगी।“ सास को स्मरण हो आया-जब मैं बहू थी तो अपनी सास की पीठ
मैंने भी पांव से खुजलाई थी। मेरी बहू आज मेरे लिए वैसा ही कर रही है। लकड़ी
आगे जल चुकी तो आँच पीछे की ही ओर बढ़ती है।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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