अघिले कि लाकडि़ जलि पछिनैं उंछि :

aghile M05 – नीति परक कथाएं : ये कथाएं जन साधारण का मनोरंजन करने के
साथ साथ आदर्श जीवन के लिए कोई न कोई उपदेश भी प्रदान करती हैं।
इनमें विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से जीवन सत्य का उद्घाटन करते हुए नैतिकता
की स्थापना की जाती है। अपने पूर्वजों की अनुभवजन्य सामाजिक मान्यताओं
से अनुप्रेरित होने के कारण ये हर वर्ग के श्रोताओं को खूब भाती हैं। उदाहरण –

लोककथा : अघिले कि लाकडि़ जलि पछिनैं उंछि :

मूल कथा : सासु अब बुडि़ है गेछि। घर में हात हतिक व्वारि कै भै। सासुक
हस्त रै ऐ गया व्वारि बुडि़ कै मुख निं लगूनेर भै। बुडि़या का आपुण हात पुर
न खुट पुर। क्वे बुडि़यै कि टहल-टोकार करनेर नैं, उकैं नउंनेर ध्वेउनेर नैंं। बुडि़या
का पुठन खाजि लागी त बुडि़ कहड़ै रुनेर भैः ‘‘व्वारी, ओ व्वारि, जरा एथकै ऐ
बेर म्यार पुठै कि खाजि कन्यै दिनि कन वे।’’ पैंलिया त व्वारि सासुक कईं कैं के
गिणखी नि दिनेर भै। बुडि़यैल हकाहाकै लगई त व्वारि अइ। ‘‘कि हरौ ज्यू, तुमरी
त अत्ती खाज खजै।’’ ‘‘नें व्वारी, मैं त यो खाजि लै बौई गयंुॅ। मणि मेरि पुठै
कि खाजि कन्यै दे त।’’

व्वारिक मिजाजाक आगतिर घोड़ घाई निं खानेर भै। मिजाज वालि व्वारि कैैैं सासुक
पुठन हात लगुंण त घींण लागि। हां खुटैल बुडि़यौ क पुठ कन्यै दि उ नखउचैड़ैल। बुडि़
के बुलो त और धुन्दादारी हो, सबन है भल आपणौं मुख में हांणि राखि।
कि देर लागैं दिन जांण में। व्वारिक आपण च्याल भै। पालि पोसि बेर पढ़ै लेखै, बेवै रेवै,
और आब व्वारि की व्वारि ऐ। सासु त कबै की मरि गेछी, आब व्वारि आपुंई सासु भै
आपणि व्वारि कि।

एक दिन वील आपणि व्वारि थैं के ‘‘व्वारी, मणी, मेरि पुठै कि खाजि कन्यै दे वे।
आब के निं हुंॅन। हात खुट रे ऐ गयीं।’’ व्वारि ऐ बेर सासुक मुखथैं ठाडि़ है गे।
सासुल फिरि खाजि कन्यूंण हुं क्यो त व्वारि बुलाणि ‘‘ज्यू, मैं भिं में त कां बैठूं।
ठाड़ है बेर तुमार पुठ तक म्योर हात पुजन नैं, खुट पुुजि जानीं। ल्याऔ, पुठ एथकैं
करो। खुटैलै कन्यै द्यूंल।’’ सासु कें ख्याल ऐ गे-जब मैं व्वारि छिं त आपणि सासुक पुठै
कि खाजि लै खुटै लै कनैंछीं। आज उंस मेरि व्वारि मैंहुं करणैंछ। अघिनै कि लाकडि़ जलि
पछिनैं ऊंछि।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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