मालूसाही – 1

maxresdefaultलोकगाथा : क – मालूसाही – 1

‘मालूशाही’ कत्यूरी वंश के राजा ‘मालू’ तथा सुनपति शौका की पुत्री
‘राजुली’ की प्रेमगाथा है। कुमाऊं में यह प्रेमगाथा सर्वत्र बड़े चाव से सुनी
व गाई जाती है। इसकी कथा जोहार, पिथौरागढ़, बारामंडल,पाली पछाऊं
और नैनीताल भीमताल क्षेत्र में अलग अलग रूपों में मिलती है, परंतु सब
क्षेत्रों में मुख्य कथा एक जैसी है।

आ ……. सुणि लिया भाई बंदो !
जिया जागी रया।
दैंण है जाया दैंण, हो महादेव !
दैंण है जाया हो गौरा पारवती !
काम सुफल करिए सिद्धि का गणेश !
तै बखता पंचनामा देवा रौंनी पंचचूली मांजा,

पंचा देवो नाम, दैण है जाया भगवाना !
अट्ठासी सै गंगा भुलू ! नवासी सै तीरथा,
दैण है जाया दैण यो भूमि को भूम्याला !
हो…..! स्ंासार में सबन है ठुल दुख,
पुतर को शोक

पाली पछौं धरमा राणी,
तेरो च्यालो नि छियो,
सेड़ी सौक्याण गांगुलि सौक्याण,
भुलू ! त्योरो च्यालो नि छियो,
तेरो रे पति छियो सुनपति सौका, – (क्रमशः)

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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