दक्खिनी :

dakkhiniविशेष : दक्खिनी :

दक्षिण भारत में दक्खिनी में पद्य साहित्य भी लिखा गया और गद्य साहित्य भी।
गद्य में लिखित अब्दुस्समद की पुस्तक ‘तफसीरे बहावी’ ; 1555 ई0 द्ध को
दक्खिनी गद्य साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मुल्ला वजही की ‘सबरस’ ;
1620 ई0 द्ध में आधुनिक हिंदी की झलक देखने को मिलती है।

इस काल में अवधी में पद्य नहीं लिखा गया, पर खड़ीबोली में गद्य लेखन का
श्रीगणेश अवश्य हुआ। 1500 ई0 के प्रारंभ में किसी अज्ञात कवि द्वारा रचित
सूफीकाव्य ‘कुतुब शतक’ के वार्तिक तिलक की भाषा के उदाहरण सबसे पुराने
माने जाते हैं; यथा -‘तब ग्यारह सौ आदमी कुतुबुद्दीन नवल पास रखे तिसमें
पंच सौ बूढ़ी। तिन्हौं के हाथ पंच सौ सोवन लठी। छिह सै छड़ीदार सोने की
छड़ी लिये रहौ। तिन्हौं को पातिस्याह हुकुम कीया

स्वामी प्राणनाथ लिखित ‘शेख मीरां जी का किस्सा’ (1678 ई0) में प्रयुक्त
खडी़बोली का उदाहरण – ‘तब उलमाहों ने जबाब दिया कि आखिरी जमाने में
यानि क्यामत के दोरे में जाहिर होयेंगे। तब हम मुसलमानों ने पूछा कि आखेर
कब होयेगी ? तब उन उलमाहों ने कहा के आखेर के दिन आए….’

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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