गए :

gayeग़ज़ल : गए :

जब भी जज़्बात की ऊंचाइयों के पार गए
गर्दिश-ए-वक्त के एहसास हमें मार गए

हमको उम्मीद थी हम आसमाँ को जीतेंगे
अपनी किस्मत के सितारों से मगर हार गए

चन्द सिक्कों के लिए पेड़ का सौदा न करो
उनको समझाने गए पर लगा बेकार गए

कुदरती हुस्न की तारीफ सभी करते हैं
वह कहीं जाता नहीं सब वहाँ सौ बार गए

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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