गजल :: न रहने पाए ::

rahneगजल :: न रहने पाए ::

उनकी चाहत है कि ये बाग न रहने पाए
मेरी हसरत है कोई आग न रहने पाए

बाद मुद्दत के तेरी याद के अँकुए फूटे
इनके होंठों पे कोई माँग न रहने पाए

तेरे ख़्वाबों की नई शाखें अभी छोटी हैं
इनपे हँसिए का कोई दाग न रहने पाए

पेड़ बढ़ने लगे हैं अब तेरे ख़्यालों के
इनकी सरहद में कोई नाग न रहने पाए

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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