स्वरसंधि :

swarsandhiसंध्यक्षर में जीभ एक स्वर के उच्चारण स्थान से दूसरे स्वर के उच्चारण स्थान की ओर
अग्रसर होती है, तो कभी-कभी दोनों स्वरों में से किसी एक स्वर का अथवा दोनों ही
स्वरों का अस्तित्व प्रकट नहीं हो पाता, जैसे: मिठै। मिठाई का उच्चारण करने के लिए
आ के बाद ई की तरफ बढ़ती हुई जिह्वा दोनों मेें से किसी को भी मुखरित नहीं कर पाई।
कमाई > कमै, भलाई > भलै, पढ़ाई > पढ़ै, लिखाई > लिखै।

मनिहारी

स्वर संधि में एकाधिक स्वर अलग-अलग अक्षर होते हैं। कभी कभी उनका अलग-अलग
अस्तित्व प्रकट होता है, जैसे – बइल। बैल का उच्चारण करते समय ब के अ तथा परवर्ती
इ को स्पष्ट रूप से मुखरित किया गया है। कुमैंयाँ की उपबोली मनिहारी में यह प्रवृत्ति अधिक
पाई जाती है। जैसे- भैंस > भइँस, मैल > मइल, फौंल > फउंल, सौ > सउ।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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