उच्चारण :

uchcharan

मानव अपने स्वर यन्त्र, मुख, जिह्वा तथा नासिका आदि भाषण अवयवों की सहायता से विभिन्न
ध्वनियों का उच्चारण करता है। उच्चारण एवं श्रवण की दृष्टि से स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाली भाषा
की लघुतम अर्थभेदक ध्वनि को स्वनिम कहते हैं। स्वनिमों के अंतर्गत स्वर और व्यंजन आते हैं।

स्मरणीय है कि स्वनिम का सम्बन्ध भाषा के लिखित रूप से नहीं, वरन् उच्चरित रूप से होता है।
प्रत्येक भाषा के अपने स्वनिम होते हैं, जो दूसरी भाषा के स्वनिमों से भिन्न और स्वतन्त्र होते हैं।

यदि किन्हीं दो भाषाओं के स्वनिमों में समानता मिलती है, तो उसे आकस्मिक संयोग ही समझना
चाहिए। अपनी भाषा से भिन्न भाषा के स्वनिमों का उच्चारण करने में कठिनाई होने के कारण वक्ता
दूसरी भाषा के स्वनिमों को अपनी भाषा के निकटस्थ स्वनिमों के अनुरूप ढालकर बोलता है।

एक ही ध्वन्यात्मक परिवेश में दो स्वनिमों के आने से अर्थ परिवर्तित हो जाता है, जैसे: इज तथा
उज में अथवा चीड़ एवं पीड़ में क्रमश: इ के स्थान पर उ और च् के स्थान पर प् आने से अर्थ
बदल गया है। इस प्रकार ई, उ, च्, प् लघुतम अर्थ भेदक इकाई के रूप में स्वतंत्र सत्ता रखने वाले
स्वनिम कहे जा सकते हैं।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s