सौतेलि इज :

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हिंदी अनुवाद:

बहुत पहले की बात है एक घनी व्यक्ति रहता था कहीं। बड़ा दानी धर्मात्मा था वह और
उसकी धर्मपत्नी भी वैसे ही स्वभाव की थी, अतिथि को सादर भोजन, भिखारी को भीख
देने वाली। पति-पत्नी दोनों ही इतने अच्छे स्वभाव के थे कि सब लोग उनकी भूरि-भूरि
प्रशंसा करते थे। किन्तु उनकी कोई सन्तान न थी। अनेक वर्षों बाद उनके घर में भी जन्म
लिया तो एक लड़की ने। लोग कहा करते थे कि ईश्वर जिसे नाक देता है उसे नथ नहीं,
जहाँ नथ होती है वहाँ नाक नहीं। इतनी धन संपदा है इनके पास किन्तु उसका उपभोग
करने वाला कोई नहीं।

पति-पत्नी दोनों ही उस बच्ची को बहुत प्यार करते थे। जब वह बच्ची सात-आठ साल की थी
तो उसकी माँ गम्भीर रूप से बीमार पड़ी और उसके जीवित रहने की कोई भी आशा न रही।
अपने अंतिम समय उसने अपने स्वामी से कहा: ”मैं तो अब जीवित न रहूँगी। मेरी यह अन्तिम
बात तुम निभा देना कि दूसरा विवाह न करना। बच्ची के लिए सौतेली माँ मत लाना।“

उस समय तो आदमी ने वचन दे दिया किन्तु पत्नी की मृत्यु के छः माह बाद ही, अपने परायों
द्वारा समझाने-बुझाने के फलस्वरूप उसने दूसरा विवाह कर लिया। सौतेली माँ ने घर में प्रवेश करते
ही अपनी सौतेली बेटी से चाल प्रपंच करना आरम्भ कर दिया और दो वर्ष के बाद, जब उसकी अपनी
भी बेटी हो गई, तो वह न तो अपनी सौतेली बेटी को भरपेट भोजन देती न अच्छा पहनने के लिए।
पिता सभी कुछ देखता था, समझता था, पर अब पछतावा करने से होता भी क्या। वह लड़की
अपना दुःख अपने पिता को भी न बताती। चुपचाप अपने दुःखों में स्वयं ही घुलती रहती। (क्रमशः)

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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