मान्यता :

maanyta

कुमाउनी भाषा की वर्तमान स्थिति पर विचार करते हुए उसकी व्याकरणिक विशेषताएँ जानने से पूर्व ये स्मरण रखना चाहिए कि मात्र उच्चारण भेद किसी भाषा का भेदक लक्षण नहीं होता। शब्द भण्डार के अतिरिक्त ध्वनि तत्व, पद विचार एवं व्याकरण रचना के आधार पर ही उसके निकटवर्ती सम्बन्धों का ज्ञान होता है। भाषाभेद बोधगम्यता के तारतम्य के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं, जिसके लिए उनकी रूपतात्विक समानता-असमानता उत्तरदायी होती है।

हिन्दूकुश से नेपाल के मध्य व्यवहृत पहाड़ी बोलियों में शब्द गत एवं अन्य भाषिक समानताओं के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि अधिकांश लघुहिमालयी भाषा बोलियों की भाषिक संरचना मूलतः खसों की भाषा से समानता रखती है ; क्योंकि न केवल शब्द समूह अपितु रूपात्मक दृष्टि से भी कुमाउनी आदि पहाड़ी बोलियों में दरद-खस विशेषताएँ हैं।

कुछ लोगों की यह भी मान्यता है कि पैशाची प्राकृत अथवा दरद प्राकृत के समान ही खसों की बोली- खसप्राकृत- भी ईरानी और प्राचीन भारतीय आर्यभाषा के बीच की कड़ी रही होगी, जो बाद में भारतीय आर्यभाषाओं के प्रभाव से आमूल परिवर्तित हो गई। किन्तु शब्दावली एवं रूपात्मक संरचना विषयक कतिपय विशेषताएँ अक्षुण्ण रही हैं।

Published by

drhcpathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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