मायूस :

mayus

दहशत से मायूस हो गए सारे जंगल पेड़ों के
किसने देखे जख़्म ए जिगर इन गम से बोझिल पेड़ों के

देश निकाला भोग रहे हैं पेड़ाें पर रहने वाले
कुर्सी-सोफों पर बैठे हैं असली कातिल पेड़ाें के

भटक रहीं हैं गर्म हवाएँ अनचाहे वीरानों में
दूर-दूर तक नजर नहीं आते हैं साहिल पेड़ाें के

जिनके आने पर वह पहले झूम-झूम लहराते थे
उनकी आहट से अब काँपा करते हैं दिल पेड़ाें के

Published by

Dr. Harishchandra Pathak

Retired Hindi Professor / Researcher / Author / Writer / Lyricist

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